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✭﷽✭

                .   *✿_سیرت النبی ﷺ_✿*

      *✭ SEERATUN NABI S.A.✭*

          *✿_सीरतुन नबी स. अ. _✿*

        *🌹صلى الله على محمدﷺ🌹*

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*┱✿_ ज़मज़म की खुदाई -_,*

★__ हजरत इब्राहीम अलेहिस्सलाम के बेटे हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम के 12 बेटे थे उनकी नस्ल इस कदर हुई मक्का मुकर्रमा में ना समा सकी और पूरे हिजाज़ में फ़ैल गई , इनके एक बेटे क़ैयदर की औलाद में अदनान हुए ,अदनान के बेटे मा'द और पोते का नाम नज़ार था, नज़ार के चार बेटे थे ,उनमें से एक का नाम था मुज़िर था , मुज़िर की नस्ल से क़ुरेश बिन मालिक पैदा हुए , ये फहर मालिक भी कहलाये ,

★_क़ुरेश की औलाद बहुत हुई उनकी औलाद मुख्तलिफ कबीलों में बंट गई , उनकी औलाद से कुसयी ने इक्तदार हासिल किया । कुसयी के आगे तीन बैटे हुए उनमें से एक अब्दे मुनाफ थे  जिनकी अगली नस्ल में हासिम पैदा हुए , हासिम ने मदीना के एक सरदार की लड़की से शादी की ,उनके यहां एक लड़का पैदा हुआ, उसका नाम शीबा रखा गया, यह पैदा ही हुआ था कि हाशिम का इंतकाल हो गया , उनके भाई मुत्तलिब  मक्का के हाकिम हुए , हाशिम का बेटा मदीना मुनव्वरा में परवरिश पाता रहा।

★_ जब मुत्तलिब को मालूम हो गया कि वह जवान हो गया है तो भतीजे को लेने के लिए खुद मदीना गए ,उसे लेकर मक्का मुकर्रमा पहुंचे तो लोगों ने ख्याल किया यह नौजवान उनका गुलाम है , मुत्तलिब ने लोगों को बताया - यह हाशिम का बेटा और मेरा भतीजा है , इसके बावजूद लोगों ने उसे मुत्तलिब का गुलाम ही कहना शुरू कर दिया । इस तरह शीबा को अब्दुल मुत्तलिब कहा जाने लगा , इन्हें अब्दुल मुत्तलिब के यहां अबू तालिब हमज़ा अब्बास अब्दुल्लाह अबु लहब हारीस ज़ैद ज़िरार और अब्दुल रहमान पैदा हुए । उनके बेटे अब्दुल्लाह से हमारे नबी हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम पैदा हुए ।

★__ अब्दुल मुत्तलिब के तमाम बेटों में हजरत अब्दुल्लाह सबसे ज्यादा खूबसूरत और सबसे ज्यादा पाक दामन थे , अब्दुल मतलब को ख्वाब में ज़मज़म का कुआं खोदने का हुक्म दिया गया यानी हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम के कुएं को । उस कुएं को क़बीला जरहम ‌के सरदार मिजा़ज़ ने पाट दिया था । क़बीला  जरहम के लोग उस जमाने में मक्का के सरदार थे, बैतुल्लाह के निगरां थे , उन्होंने बैतुल्लाह की बेहुरमती शुरू कर दी ।

★_उनका सरदार मिज़ाज बिन अमरु था। वह अच्छा आदमी था। उसने अपने क़बीले को समझाया कि बैतुल्लाह की बेहुरमती ना करो मगर उन पर असर ना हुआ। जब मिजा़ज़ ने देखा कि उन पर कोई असर ना होता तो कौम को उसके हाल पर छोड़ कर वहां से जाने का फैसला किया। उसने तमाम माल व दौलत तलवारें और जिरें वगैरा खाना काबा से निकाल कर ज़मज़म के कुएं में डाल दिए और मिट्टी से उसको पाट दिया । कुआं इससे पहले ही खुश हो चुका था ,अब उसका नामोनिशान मिट गया ।

★__  मुद्दतों यह कुआं बंद पड़ा रहा ,उसके बाद बनु खुज़ा'अ ने बनु जरहम को वहां से मार भगाया । बनु खुजा़आ और क़ुसई के सरदारी का जमाना इसी हालत में गुजरा । कुआं बंद रहा यहां तक कि क़ुसई के बाद अब्दुल मुत्तलिब का जमाना आ गया । उन्होंने ख्वाब देखा । ख्वाब में उन्हें जमजम के कुएं की जगह दिखाई गई और उसके खोदने का हुक्म दिया गया।

★_ हजरत अली रजियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि अब्दुल मुत्तलिब ने बताया :- मैं हजरे अस्वद के मुकाम पर सो रहा था, मेरे पास एक आने वाला आया उसने मुझसे कहा -तैबा को खोदो। मैंने उससे पूछा- तैबा क्या है ? मगर वह कुछ बताए बगैर चला गया ।

दूसरी तरफ रात फिर ख्वाब में वही शख्स आया -कहने लगा बराह को खोदो,  मैंने पूछा बराह क्या है ? वह कुछ बताए बगैर चला गया ।

तीसरी रात में अपने बिस्तर पर सो रहा था कि फिर वह शख्स ख्वाब में आया उसने कहा- मजनूना खोदो । मैंने पूछा- मजनूना क्या है ? वह बताएं बगैर चला गया।

इससे अगली रात में फिर बिस्तर पर सो रहा था कि वही शख्स फिर आया और बोला ज़मज़म खोदो।  मैंने उससे पूछा- ज़मज़म क्या है ?

इस बार उसने कहा ज़मज़म वह है जिसका पानी कभी खत्म नहीं होता जो हाजियों के बड़े-बड़े मजमुओं को सैराब करता है ।

अब्दुल मुत्तलिब कहते हैं मैंने उससे पूछा- यह कुआं किस जगह है ? उसने बताया जहां गंदगी और खून पड़ा है और कौवा ठौंगे मार रहा है ।

★__ दूसरे दिन अब्दुल मुत्तलिब अपने बेटे हारिस के साथ वहां गये , उस वक्त उनके यहां यही एक लड़का था । उन्होंने देखा वहां गंदगी और खून पड़ा था और एक कौवा ठौंगे मार रहा था , उस जगह के दोनों तरफ बुत मौजूद थे और यह गंदगी और खून दरअसल उन बुतों पर कुर्बान किए जाने वाले जानवरों का था। पूरी निशानी मिल गई तो अब्दुल मुत्तलिब कुदाल ले आए और खुदाई के लिए तैयार हो गए लेकिन उस वक्त कुरैश वहां आ पहुंचे।

★__  उन्होंने कहा - अल्लाह की कसम हम तुम्हें यहां खुदाई नहीं करने देंगे , तुम हमारे इन बुतों के दरमियान कुआं खोदना चाहते हो जहां हम इनके लिए कुर्बानियां करते हैं ।

अब्दुल मुत्तलिब ने उनकी बात सुन कर अपने बेटे हारिस से कहा- तुम इन लोगों को मेरे करीब ना आने दो ,मैं खुदाई का काम करता हूं इसलिए कि मुझे जिस काम का हुक्म दिया गया है मैं उसको जरूर पूरा करूंगा ।

★_क़ुरेश ने जब देखा कि वह बाज़ आने वाले नहीं हैं तो रुक गए , आखिर उन्होंने खुदाई शुरू कर दी,  जल्दी ही कुंवे के आसार नजर आने लगे । यह देखकर उन्होंने अल्लाहु अकबर का नारा लगाया और पुकार उठे -"_यह देखो यह इस्माईल अलैहिस्सलाम की तामीर है _।"

★__ जब कुरैश ने यह देखा कि उन्होंने कुआं तलाश कर लिया तो उनके पास आए और कहने लगे अब्दुल मुत्तलिब अल्लाह की कसम यह हमारे बाप इस्माइल अलैहिस्सलाम  का कुआं है और इस पर हमारा भी हक है इसलिए हम इसमें तुम्हारे शरीक होंगे ।

यह सुनकर अब्दुल मुत्तलिब ने कहा- मैं तुम्हें इसमें शरीक नहीं कर सकता यह मुझे अकेले का काम है।

इस पर कुरेश ने कहा-  तब फिर इस मामले में हम तुमसे झगड़ा करेंगे । अब्दुल मुत्तलिब बोले किसी से फैसला करवा लो ।

उन्होंने बनी साद इब्ने हुज़ैम की काहिना से फैसला कराना मंजूर किया ।यह काहिना मुल्के शाम के बालाई इलाके में रहती थी । आखिर अब्दुल मुत्तलिब और दूसरे कुरेश उसकी तरफ रवाना हुए ।

★_अब्दुल मुत्तलिब के साथ अब्दे मुनाफ के लोगों की एक जमात थी जबकि दीगर क़बाइल कुरेश की भी एक एक जमात साथ थी । इस जमाने में मुल्क हिजाज़ और शाम के दरमियान बियावान मैदान था वहां कहीं पानी नहीं था उस मैदान में उनका पानी खत्म हो गया । सब लोग प्यास से बेहाल हो गए यहां तक कि उन्हें अपनी मौत का यकीन हो गया उन्होंने कुरेश के दूसरे लोगों से पानी मांगा लेकिन उन्होंने पानी देने से इनकार कर दिया उन्होंने इधर-उधर पानी तलाश करने का इरादा किया ।

★__अब्दुल मुत्तलिब उठकर अपनी सवारी के पास आए ज्यूं ही उनकी सवारी उठी उसके पांव के नीचे से पानी का चश्मा उबल पड़ा उन्होंने पानी को देखकर अल्लाहु अकबर का नारा लगाया। फिर अब्दुल मुत्तलिब सवारी से उतर आए सब ने खूब सैर हो कर पानी पिया और अपने मशकीजे  भर लिए । अब उन्होंने कुरेश की दूसरी जमात से कहा- आओ तुम भी सैर हो कर पानी पी लो ।अब वह भी आगे आए और खूब पानी पिया। पानी पीने के बाद वह बोले- अल्लाह की कसम ए अब्दुल मुत्तलिब ! यह तो तुम्हारे हक़ में फैसला हो गया ,अब हम ज़मज़म के बारे में तुमसे कभी झगड़ा नहीं करेंगे ,जिस जात ने तुम्हें इस बियाबान में सैराब कर दिया वही जात तुम्हें ज़मज़म से भी सैराब करेगा, इसलिए यहीं से वापस चलो।

★_ इस तरह क़ुरेश ने जान लिया कि अल्लाह ताला अब्दुल मुत्तलिब पर मेहरबान है लिहाजा उनसे झगड़ा बेसूद है और काहिना के पास जाने का कोई फायदा नहीं । चुनांचे सब लोग वापस लौटे । वापस आकर अब्दुल मुत्तलिब  ने फिर कुएं की खुदाई शुरू की । अभी थोड़ी सी खुदाई की होगी कि माल दौलत तलवारे और जिरें निकल आईं । उस में सोना और चांदी वगैरह भी थे । यह माल व दौलत  देखकर क़ुरेश के लोगों को लालच ने आ घेरारा ।

उन्होंने कहा -इसमें हमारा भी हिस्सा है ।

उनकी बात सुनकर अब्दुल मुत्तलिब ने कहा -नहीं इसमें तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं ,तुम्हें इंसाफ का तरीक़ा अख्तियार करना चाहिए ,आओ पांसों के तीरों से कु़रआ डालें।

★_उन्होंने ऐसा करना मंजूर कर लिया , 2 तीर काबे के नाम से रखे गए , 2 अब्दुल मुत्तलिब के और 2 कुरेश के बाकी लोगों के नाम के ...।

पांसा फैका गया तो माल व दौलत काबा के नाम निकला, तलवारे और जिरें अब्दुल मुत्तलिब  के नाम और कु़रेश के नाम के जो तीर थे वह किसी चीज़ को ना निकले । इस तरह फैसला हो गया। अब्दुल मुत्तलिब  ने काबा के दरवाजे को सोने से सजा दिया।

★_ज़मज़म की खुदाई से पहले अब्दुल मुत्तलिब ने दुआ मांगी थी कि ए अल्लाह इसकी खुदाई को मुझ पर आसान कर दे, मैं अपना एक बेटा तेरे रास्ते में क़ुर्बान करूंगा । अब जबकि कुआं निकल आया तो उन्हें ख्वाब में हुक्म दिया गया - "_अपनी मन्नत पूरी करो यानी एक बेटे को जिबह करो ।

*📕_सीरतुन नबी ﷺ _,*

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*┱✿_ सौ ऊंटों की कुर्बानी -*

★__ अब्दुल मुत्तलिब  को यह हुक्म उस वक्त दिया गया जब वह अपनी मन्नत भूल चुके थे पहले ख्वाब में उनसे कहा गया-" मन्नत पूरी करो " , उन्होंने एक मेंढा जिबह करके गरीबों को खिला दिया। फिर ख्वाब आया-" इससे बड़ी पेश करो",  इस मर्तबा उन्होंने एक बेल जिबह कर दिया। ख्वाब में फिर यही कहा गया-" इससे भी बड़ी पेश करो",  अब उन्होंने ऊंट जिबह किया , फिर ख्वाब आया इससे भी बड़ी चीज़ पेश करो । उन्होंने पूछा इससे भी बड़ी चीज़ क्या है ?  तब कहा गया अपने बेटों में से किसी को जिबह करो जैसा कि तुमने मन्नत मानी थी ।

★__ अब उन्हें अपनी मन्नत याद आई अपने बेटों को जमा किया उनसे मन्नत का जिक्र किया सबके सर झुक गए कौन खुद को जिबह करवाता । आखिर अब्दुल्लाह बोले- अब्बा जान आप मुझे जिबह कर दें ।

ये सबसे छोटे और सबसे खूबसूरत थे , सबसे ज्यादा मुहब्बत भी अब्दुल मुत्तलिब को इन्ही से थी । लिहाजा उन्होंने कु़रा अंदाजी करने का इरादा किया तमाम बेटों के नाम लिखकर क़ुरा डाला गया। अब्दुल्लाह का नाम निकला । अब उन्होंने छुरी ली, अब्दुल्लाह को बाजू़ से पकड़ा और उन्हें जिबह करने के लिए नीचे लिटा दिया , ज्यूंही बाप ने बेटे को लिटाया अब्बास से ज़ब्त ना हो सका । फौरन आगे बढ़े और भाई को खींच लिया ,उस वक्त खुद भी छोटे से थे । इधर बाप ने अब्दुल्लाह को खींचा ।इस खींचातानी में अब्दुल्लाह के चेहरे पर खराशें भी आई उन खराशों के निशाना मरते दम तक बाकी रहे।

★_ इस दौरान बनु मखज़ूम के लोग आ गए उन्होंने कहा आप इस तरह बेटे को जिबह ना करें इसकी मां की जिंदगी खराब हो जाएगी अपने रब को राजी करने के लिए बेटे का फिदिया दे दें ।

★__ अब सवाल यह था कि फिदया क्या दिया जाए ? इस की तरकीब यह बताई गई एक कागज पर 10 ऊंट लिखे जाएं दूसरे पर अब्दुल्लाह का नाम लिखा जाए अगर द ऊंट वाली पर्ची निकले तो 10 ऊंट कुर्बान कर दिए जाएं अगर अब्दुल्लाह वाली पर्ची निकले तो 10 ऊंट का इज़ाफा कर दिया जाए,  फिर बीस ऊंट वाली पर्ची और अब्दुल्लाह वाली पर्ची डाली जाए अब अगर 20 ऊंट वाली पर्ची निकले तो 20 ऊंट कुर्बान कर दिए जाएं वरना दस ऊंट और बढ़ा दिए जाए इस तरह 10-10 करके ऊंट बढ़ाते जाएं।

★_ अब्दुल  मुत्तलिब ने ऐसा ही किया है 10-10 ऊंट बढ़ाते चले गए हर बार अब्दुल्लाह का नाम निकलता चला गया यहां तक कि ऊंटों की तादाद 100 तक पहुंच गई तब कहीं जाकर ऊंटों वाली पर्ची निकली। इस तरह उनकी जान के बदले 100 ऊंट कुर्बान किए गए । अब्दुल मुत्तलिब को अब यकीन हो गया कि अल्लाह ताला ने अब्दुल्लाह के बदले 100 ऊंटों की कुर्बानी मंजूर कर ली है। उन्होंने काबा के पास सो ऊंट कुर्बान किए और किसी को खाने से ना रोका,  सब इंसान और जानवरों और परिंदों ने उनको खाया ।

★_इमाम ज़हरी कहते हैं कि अब्दुल मुत्तलिब पहले आदमी हैं जिन्होंने आदमी की जान की कीमत 100 ऊंट देने का तरीक़ा शुरू किया इससे पहले 10 ऊंट दिए जाते थे । इसके बाद यह तरीक़ा सारे अरब में जारी हो गया गोया क़ानून बन गया कि आदमी का फिदया १०० ऊंट है।

★_  नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के सामने जब यह जिक्र आया तो आपने इस फिदिये की तस्दीक फरमाई यानी फरमाया कि यह दुरुस्त है और इसी बुनियाद पर नबी करीमﷺ_  फरमाते हैं - मैं दो ज़बीहो यानी हजरत इस्माइल अलेहिस्सलाम और हजरत अब्दुल्लाह की औलाद हूं ।

★__ हजरत अब्दुल्लाह क़ुरेश में सबसे ज्यादा हसीन थे उनका चेहरा रोशन सितारे की मानिंद था कुरेश की बहुत सी लड़कियां इनसे शादी करना चाहती थी मगर हजरत अब्दुल्लाह की हजरत आमना से शादी हुई। हजरत आमना वहब बिन अब्दे मुनाफ बिन ज़ुहरा की बेटी थी शादी के वक्त हजरत अब्दुल्लाह की उम्र 18 साल थी ।

★_यह शादी के लिए अपने  वालिद के साथ जा रहे थे रास्ते में एक औरत काबे के पास बैठी नजर आई यह औरत वर्क़ा बिन नौफल की बहन थी । वर्क़ा बिन नौफल कुरेश के एक बड़े आलिम थे । वर्क़ा बिन नौफल से इनकी बहन ने सुन रखा था कि वक्त के आखिरी नबी का ज़हूर होने वाला है और उनकी निशानियों में से एक निशानी यह होगी कि उनके वालिद के चेहरे में नबूवत का नूर चमकता होगा। जूंही इसने अब्दुल्लाह को देखा फौरन इसके ज़हन में यह बात आई । इसने सोचा हो ना हो यह वह शख्स है जो पैदा होने वाले नबी के बाप होंगे।

चुनांचे इसने कहा- अगर तुम मुझसे शादी कर लो तो मैं बदले में तुम्हें उतने ही ऊंट दूंगी जितने तुम्हारी जान के बदले में जिबह किए गए थे।

इस पर उन्होंने जवाब दिया -मैं अपने बाप के साथ हूं उनकी मर्जी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता ना उनसे अलग हो सकता हूं और मेरे वालिद बा इज्जत आदमी है अपनी कौम के सरदार है ।

★_ बहरहाल इनकी शादी हजरत आमना से हो गई ।आप कुरेश की औरतों में नसब और मुका़म के एतबार से अफज़ल थी ।

★__ हजरत आमना हजरत अब्दुल्लाह के घर आ गई ।आप फर्माती है -जब मैं मां बनने वाली हुई तो मेरे पास एक शख्स आया यानी एक फरिश्ता इंसानी शक्ल में आया उस वक्त में जागने और सोने की दरमियानी हालत में थी उसने मुझसे कहा -क्या तुम्हें मालूम है ? तुम इस उम्मत के सरदार और नबी की मां बनने वाली हो ।

इसके बाद वह फिर उस वक्त आया जब नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम पैदा होने वाले थे इस मर्तबा उसने कहा - जब तुम्हारे यहां पैदाइश हो तो कहना मैं इस बच्चे के लिए अल्लाह की पनाह चाहती हूं हर हसद करने वाले के शर और बुराई से ,फिर तुम इस बच्चे का नाम मोहम्मद रखना क्योंकि इनका नाम तौरात में अहमद है और ज़मीन और आसमान वाले इनकी तारीफ़ करते हैं जबकि क़ुरान में इनका नाम मोहम्मद है और क़ुरान इनकी किताब है । *(अल बिदाया व अन निहाया )*

★_ एक रिवायत के मुताबिक फरिश्ते ने इनसे यह कहा :- तुम वक्त के सरदार की मां बनने वाली हो , इस बच्चे की निशानी यह होगी कि इसके साथ एक नूर ज़ाहिर होगा जिससे मुल्के शाम और बसरा के महल्लात भर जाएंगे जब वह बच्चा पैदा हो जाएगा तो उसका नाम मोहम्मद रखना क्योंकि तौरात में उनका नाम अहमद है कि आसमान और ज़मीन वाले उनकी तारीफ़ करते हैं और इंजील में उनका नाम अहमद है कि आसमान और ज़मीन वाले उनकी तारीफ करते हैं और क़ुरान में उनका नाम मोहम्मद है । *( अल बिदाया व अन निहाया)*

★_ अब्दुल्लाह के चेहरे में जो नूर चमकता था शादी के बाद वह हजरत आमना के चेहरे में आ गया । इमाम ज़हरी फरमाते हैं हकीम ने यह रिवायत बयान की है और इसको सहीह क़रार दिया है । सहाबा रजियल्लाहु अन्हुम  ने हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से अर्ज किया:-  अल्लाह के रसूल ! हमें अपने बारे में कुछ बताएं ।

आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- मैं अपने बाप इब्राहिम अलैहिस्सलाम की दुआ ,अपने भाई ईशा अलैहिस्सलाम की बशारत हूं और खुशखबरी हूं , जब मैं अपनी वाल्दा के शिकम में आया तो उन्होंने देखा गोया उनसे एक नूर ज़ाहिर हुआ है जिससे मुल्के शाम में बसरा के महल्लात रोशन हो गए ।

★_ हज़रत आमना ने हज़रत हलीमा सादिया से फरमाया था:-  मेरे इस बच्चे की शान निराली है यह मेरे पेट में थे तो मुझे कोई बोझ और थकन महसूस नहीं हुई ।

★__ हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम वह आखरी पैगंबर है जिन्होंने आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की आमद की खुशखबरी सुनाई है इस बशारत का जिक्र कुरान में भी है । सुरह सफ मे अल्लाह ताला फरमाते हैं :-

"__ और इसी तरह वह वक्त भी काबिले जिक्र है जबकि ईसा इब्ने मरियम अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि- ए बनी इस्राईल ! मैं तुम्हारे पास अल्लाह का भेजा हुआ आया हूं कि मुझसे पहले जो तौरात आ चुकी है मैं उसकी तस्दीक करने वाला हूं और मेरे बाद जो एक रसूल आने वाला है उनका नाम मुबारक अहमद होगा मैं उनकी बशारत देने वाला हूं ।"

★_  अब चूंकि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम बशारत सुना चुके थे इसलिए हर दौर के लोग आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की आमद का बेचैनी से इंतजार कर रहे थे । इधर आप की पैदाइश से पहले ही हजरत अब्दुल्लाह इंतकाल कर गए । साबका़ कुतुब में आपकी नबूवत की एक अलामत यह भी बताई गई है कि आपके वालिद का इंतकाल आप की विलादत से पहले हो जाएगा।  हजरत अब्दुल्लाह एक तिजारती काफिले के साथ तिजारत के लिए गए थे इस दौरान बीमार हो गए और कमजोर होकर वापस लौटे काफिला मदीना मुनव्वरा से गुजरा तो हज़रत अब्दुल्लाह अपनी ननिहाल यानी बनु नजार के यहां ठहरे । इनकी वालिदा बनु नजार से थी । एक माह तक बीमार रहे और इंतकाल कर गए इन्हें यही दफन कर दिया गया ।

★_  तिजारती काफला जब हज़रत अब्दुल्लाह के बगैर मक्का मुकर्रमा पहुंचा और अब्दुल मुत्तलिब को पता चला कि उनके बेटे अब्दुल्लाह बीमार हो गए हैं और मदीना मुनव्वरा में अपने ननिहाल में हैं तो उन्हें लाने के लिए अब्दुल मुत्तलिब ने अपने बेटे ज़ुबैर को भेजा । जब यह वहां पहुंचे अब्दुल्लाह का इंतकाल हो चुका था । मतलब यह कि आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम इस दुनिया में अपने वालिद की वफात के चंद माह बाद तशरीफ लाए।

*📕_सीरतुन नबी ﷺ _,*

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   *┱✿_ माहे नबुवत तुलु हुवा -_,*

★__ हज़रत इब्ने अब्बास रजियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम इस दुनिया में तशरीफ़ लाएं तो आपकी आनोल नाल कटी हुई थी । (आनोल नाल को बच्चे पैदा होने के बाद दाया काटती है )

आप खतना सुदा पैदा हुए ।अब्दुल मुत्तलिब यह देख कर बेहद हैरान हुए और खुश भी । वह कहा करते थे- मेरा बेटा निराली शान का होगा।

*(अल हिदाया )*

★_  आप की पैदाइश से पहले मक्का के लोग खुश्क साली और क़हत का शिकार थे लेकिन ज्योंहि आपके दुनिया में तशरीफ लाने का वक्त करीब आया बारिश शुरू हो गई , खुश्कसाली दूर हो गई । दरख़्त हरे भरे हो गए और फलों से लद गए , ज़मीन पर सब्ज़ा ही सब्ज़ा नज़र आने लगा।

पैदाइश के वक्त आप अपने हाथों पर झुके हुए थे सर आसमान की तरफ था। एक रिवायत के अल्फाज़ यह हैं कि घुटनों के बल झुके हुए थे। मतलब यह कि सजदे की सी हालत में थे ।

*( तबक़ात )*

★__ आपकी मुट्ठी बंद थी और शहादत की उंगली उठी हुई थी जैसा कि हम नमाज में उठाते हैं । हुजूर अनवर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम फरमाते हैं :- मेरी वालिदा ने मुझे जन्म दिया तो उनसे एक नूर निकला उस नूर से शाम के महल्लात जगमगा उठे । *( तबका़त )*

★_ आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की वालिदा सैयदा आमना फरमाती है :-  मोहम्मद ( सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम) की पैदाइश के वक्त ज़ाहिर होने वाले नूर की रोशनी में मुझे बसरा में चलने वाले ऊंटो की गर्दनें तक नज़र आई ।

★_ अल्लामा सहली रहमतुल्लाह ने लिखा है कि जब आप पैदा हुए तो आपने अल्लाह की तारीफ की । एक रिवायत में यह अल्फाज़ आए हैं  :-

"_ अल्लाहु अकबर कबीरा वल हमदुलिल्लाहि कसीरा वा सुबहानल्लाहि बुकरतौव वा असीला _,"

(अल्लाह ताअला सबसे बड़ा है अल्लाह ताला की बेहद तारीफ है और मैं सुबह व शाम अल्लाह की पाकी बयान करता हूं )

★__ आप की विलादत किस दिन हुई ?  इस बात पर सबका इत्तेफाक है कि वह पीर का दिन था आप सुबह फज़र तुलु होने के वक्त दुनिया में तशरीफ़ लाएं ।

★_ तारीफ पैदाइश के सिलसिले में बहुत से कौ़ल हैं। एक रिवायत के मुताबिक 12 रबीउल अव्वल को पैदा हुए एक रिवायत आठ रबीउल अव्वल  की है,  एक रिवायत 12 रबीउल अव्वल को पैदा हुए । इस सिलसिले में और भी बहुत सी रिवायात है ज्यादातर मोरखीन का ख्याल है कि आप 8 रबीउल अव्वल को पैदा हुए । तक़वीम ( कैलेंडर ,जंत्री) के तरीक़े के हिसाब से जब तारीख निकाली गई तो नौ रबीउल अव्वल निकली । मतलब यह कि इस बारे में बिल्कुल सही बात किसी को मालूम नहीं। इस बात पर सब को इत्तेफाक है कि महीना रबीउल अव्वल का था और दिन पीर का ।

यह भी कहा जाता है कि आपको पीर के दिन ही नबुवत मिली, पीर के रोज़ ही आपने मदीना मुनव्वरा की तरफ हिजरत फरमाई और पीर के रोज़ ही आप की वफात हुई ।

★_ आप आमुल फील में पैदा हुए यानी हाथियों वाले साल में । इस साल को हाथी वाला साल इसलिए कहा जाता है कि अबरहा ने हाथियों के साथ मक्का मुकर्रमा पर चढ़ाई की थी ।आप की पैदाइश इस वाक्य के कुछ ही दिन बाद हुई थी ।

★__ वाकि़या कुछ इस तरह है कि अब्राहा ईसाई हकीम था । हज के दिनों में उसने देखा कि लोग बैतुल्लाह का हज करने जाते हैं ।उसने अपने लोगों से पूछा यह लोग कहां जाते हैं ? उसे जवाब मिला बैतुल्लाह का हज करने के लिए मक्का जाते हैं । उसने पूछा बैतुल्लाह किस चीज का बना हुआ है? उसे बताया गया पत्थरों का है। उसने पूछा उसका लिबास क्या है ? बताया गया हमारे यहां से जो धारीदार कपड़ा जाता है उससे उसकी पोशाक तैयार होती है।

अब्राहा ईसाई था ।सारी बात सुनकर उसने कहा- मसीह की क़सम मैं तुम लोगों के लिए इससे अच्छा घर तामीर करूंगा ।

★_ इस तरह उसने सुर्ख सफेद ज़र्द और सियाह पत्थरों से एक घर बनवाया सोने और चांदी से उसको सजाया उसमें कई दरवाजे रखवाये  उसमें सोने के पत्तर जडवाये उसके दरमियां में जवाहर लगवाए , उस मकान में एक बड़ा सा याकूत लगवाया पर्दे लगवाए । वहां खुशबुएं सुलगाने का इंतजाम किया । उसकी दीवारों पर इस कदर मुश्क मला जाता था कि वह सियाह रंग की हो गई यहां तक कि जवाहर भी नज़र नहीं आते थे । फिर लोगों से कहा अब तुम्हें बेतुल्लाह का हज करने के लिए मक्का जाने की जरूरत नहीं रही मैंने यहीं तुम्हारे लिए बैतुल्लाह बनवा दिया है, लिहाजा अब तुम इस का तवाफ करो ।

★_ इस तरह कुछ क़बाइल कई साल तक इसका हज करते रहे उसमें एतिकाफ करते रहे हज वाले मनासिक भी यहीं अदा करते रहे । अरब के एक शख्स नोफेल खश्मी से यह बात बर्दाश्त ना हो सकी ,वह इस नकली खाना काबा के खिलाफ दिल ही दिल में कुड़ता रहा। आखिर उसने दिल में ठान ली कि वह अबरहा की इस इमारत को गंदा करके छोड़ेगा । फिर एक रात उसने चोरी छिपे बहुत ही गंदगी उसमें डाल दी ।

★_ अब्राहा को मालूम हुआ तो सख्त गज़बनाक हुआ कहने लगा यह कार्यवाही किसी अरब ने अपने काबा के लिए की है मैं उसे ढ़हा दूंगा उसका एक एक पत्थर तोड दूंगा ।

★__उसने शाम व हबशा को यह तफसीलात लिख दी , उससे दरखास्त की कि वह अपना हाथी भेज दे । उस हाथी का नाम महमूद था, यह इस कदर बड़ा था कि इतना बड़ा हाथी रूए जमीन पर देखने में नहीं आया था। जब हाथी उसके पास पहुंच गया तो वह अपनी फौज लेकर निकला और मक्का का रूख किया । यह लश्कर जब मक्का के क़ुर्बो जवार में पहुंचा तो अबरहा ने फौज को हुक्म दिया कि इन लोगों के जानवर लूट लिये जाएं। उसके हुक्म पर फौजियों ने जानवर पकड़ लिए उनमें अब्दुल मुत्तलिब के ऊंट भी थे।

★_नुफैल भी इस लश्कर में अबरहा के साथ मौजूद था और यह अब्दुल मुत्तलिब का दोस्त था।  अब्दुल मुत्तलिब इससे मिले ऊंटों के सिलसिले में बात की । नुफैल ने अबरहा से कहा - कुरेश का सरदार अब्दुल मुत्तलिब मिलना चाहता है यह शख्स तमाम अरब का सरदार है सर्फ और बुजुर्गी इसे हासिल है लोगों में इसका बड़ा असर है लोगों को अच्छे अच्छे घोड़े देता है उन्हें अतियात देता है खाना खिलाता है।

★_ यह गोया अब्दुल मुत्तलिब का तार्रूफ था। अब रहा ने उन्हें मुलाकात के लिए बुलाया अबरहा ने इनसे पूछा -बताइए आप क्या चाहते हैं ? उन्होंने जवाब दिया मैं चाहता हूं मेरे ऊंट मुझे वापस मिल जाए।

★_ इनकी बात सुनकर अबरहा बहुत हैरान हुआ ।उसने कहा मुझे तो बताया गया था कि आप अरब के सरदार हैं बहुत इज्जत और बुजुर्गी के मालिक हैं लेकिन लगता है मुझसे गलत बयानी की गई है क्योंकि मेरा ख्याल था आप मुझसे बैतुल्लाह के बारे में बात करेंगे जिसको मैं गिराने आया हूं और जिसके साथ आप सबकी इज्जत वाबस्ता है लेकिन आपने तो सिरे से इसकी बात ही नहीं की और अपने ऊंटों का रोना लेकर बैठ गए ,यह क्या बात हुई ।

उसकी बात सुनकर अब्दुल मुत्तलिब बोले -आप मेरे ऊंठ मुझे वापस दे दे बेतुल्लाह के साथ जो चाहे करें इसलिए कि उस घर का एक परवरदिगार है वह खुद ही उसकी हिफाज़त करेगा मुझे उसके लिए फिक्र बंद होने की जरूरत नहीं।

★_ उनकी बात सुनकर अबरहा ने हुक्म दिया इनके ऊंट वापस दे दिए जाएं ।

जब इन्हें इनके ऊंट वापस मिल गए तो इन्होंने उनके समो पर चमड़े  चढ़ा दिए उन पर निशान लगा दिए उन्हें कुर्बानी के लिए वक्फ करके हरम में छोड़ दिया ताकि फिर कोई उन्हें पकड़ ले तो हरम का परवरदिगार उस पर गज़ब नाक हो।

★__ फिर अब्दुल मुत्तलिब हीरा पहाड़ पर चढ़ गए उनके साथ उनके कुछ दोस्त थे उन्होंने अल्लाह से दरखास्त की :- ऐ अल्लाह ! इंसान अपने सामान की हिफाज़त करता है तू अपने सामान की हिफाजत कर।

★_ उधर से अबरहा अपना लश्कर लेकर आगे बढ़ा वो खुद हाथी पर सवार लश्कर के दरमियान मौजूद था। ऐसे में उसके हाथी ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया वह जमीन पर बैठ गया हाथी बानों ने उसे उठाने की कोशिश की लेकिन वह ना उठा। उन्होंने उसके सर पर ज़िरे लगाई ,आक्स चुभोऐ  मगर वो खड़ा ना हुआ । कुछ सोच कर उन्होंने उसका रूख यमन की तरफ किया तो वह फौरन उस तरह चलने लगा ।

★_उसका रुख फिर मक्का की तरफ किया गया तो फिर रूक गया ।हाथी बानो ने यह तजुर्बा बार बार किया । आखिर अबरहा ने हुक्म दिया :-  हाथी को शराब पिलाई जाए ताकि नशे में उसे कुछ होश ना रह सके और हम उसे मक्का की तरफ आगे बढ़ा सकें ।

★_उसे शराब पिलाई गई लेकिन उस पर इसका भी असर ना हुआ ।

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*┱✿_ अबरहा का अंजाम -_,*

★__ अबरहा के हाथी को उठाने की मुसलसल कोशिश जारी थी कि अचानक समुंदर की तरफ से उनकी तरफ अल्लाह ताअला ने अबाबीलों को भेज दिया वह टिड्डियों के झुंड की तरह आई ।

★_ दूसरी तरफ अब्दुल मुत्तलिब मक्का में दाखिल हुए हरम में पहुंचे और काबा के दरवाजे की जंजीर पकड़ कर अबरहा और उसके लश्कर के खिलाफ फतेह की दुआ मांगी ,उनकी दुआ के अल्फाज यह थे :-

"_ ऐ अल्लाह ! यह बंदा अपने का़फिले और अपनी जमात की हिफाज़त कर रहा है तू अपने घर (यानी बैतुल्लाह) की हिफाजत फरमा ,अबरहा का लश्कर फतह ना हासिल कर सके , उनकी ताकत तेरी ताकत के आगे कुछ भी नहीं ,आज सलीब कामयाब ना हो _।"

★_ सलीब का लफ्ज़ इसलिए बोला कि अबरहा ईसाई था और सलीब को ईसाई अपने निशान के तौर पर साथ लेकर चलते हैं। अब उन्होंने अपनी क़ौम को साथ लिया और हीरा पहाड़ पर चढ़ गए क्योंकि उनका ख्याल था , वह अबरहा का मुक़ाबला नहीं कर सकेंगे ।

★__और फिर अल्लाह ताला ने परिंदों के झुंड के झुंड भेज दिए यह परिंदे चिड़िया से क़द से बड़े थे उनमें से हर परिंदे की चोंच में पत्थर के तीन तीन टुकड़े थे यह पत्थर परिंदों ने अब्राहा के लश्कर पर गिराने शुरू किए । जूंही यह पत्थर उन पर गिरे उनके टुकड़े टुकड़े हो गए बिल्कुल इस तरह जैसे आज किसी जगह ऊपर से बम गिराया जाए तो जिस्मों के टुकड़े उड़ जाते हैं । अबरहा का हाथी महमूद अलबत्ता उन कंकरिया से महफूज़ रहा बाक़ी सब हाथी तहस-नहस हो गए । यह हाथी 13 अदद थे  सब के सब खाए हुए नहूसत के मानिंद हो गए जैसा की सूरह फील में आता है ।

★__ अबरहा और उसके कुछ साथी तबाही का मंजर देख कर बुरी तरह भागे लेकिन परिंदों ने उसको भी ना छोड़ा । अब्राहा के बारे में तबका़त में लिखा है कि उसके जिस्म का एक एक उज्व अलग होकर गिरता चला गया यानी वह भाग रहा था और उसके जिस्म का एक एक हिस्सा अलग होकर गिर रहा था ।

★_दूसरी तरफ अब्दुल मुत्तलिब इस इंतजार में थे कि कब हमला होता है लेकिन हमलावर जब मक्का में दाखिल ना हुए तो यह हालात मालूम करने के लिए नीचे उतरे मक्का से बाहर निकले तब इन्होंने देखा सारा लश्कर तबाह हो चुका है खूब माले गनीमत उनके हाथ लगा बेशुमार सामान हाथ आया , माल में सोना चांदी भी बेतहाशा था ।

★_लश्कर में से कुछ लोग ऐसे भी थे जो वापस नहीं भागे थे यह मक्का में रह गए थे उनमें अब्राहा के हाथी का महावत भी था जो महमूद को आगे लाने में नाकाम रहा था ।

★_ हमारे नबी हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम इस वाक्य के चंद दिन बाद पैदा हुए। आप जिस मकान में पैदा हुए वह सफा पहाड़ के करीब था । हजरत का़'ब अहबार रजियल्लाहु अन्हु रिवायत करते हैं:- मैंने तौरात में पढ़ा था कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की पैदाइश मक्का में होगी । यह का़'ब पहले यहूदी थे इसलिए तौरात पढ़ा करते थे।

★__ दुनिया में आते ही हुजूर अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम रोए । हजरत अब्दुर्रहमान बिन औफ रजियल्लाहु अन्हु की वाल्दा कहती हैं कि जब हजरत आमना के यहां विलादत हुई तो मैं वहां मौजूद थी आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम मेरे हाथों में आए यह गालिबन दाया थी इनका नाम शिफा था । फरमाती हैं -जब आप मेरे हाथों में आए तो रोए ।

★_ आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब को विलादत की इत्तेला दी गई वह उस वक्त खाना काबा का तवाफ कर रहे थे । इत्तेला मिलने पर घर आए ,बच्चे को गोद में लिया । उस वक्त आपकी वाल्दा ने उनसे कहा :- यह बच्चा अजीब है सजदे की हालत में पैदा हुआ है यानी पैदा होते ही इसने पहले सजदा किया फिर सजदे से सर उठा कर उंगली आसमान की तरफ उठाई।

★_  अब्दुल मुत्तलिब ने आपको देखा उसके बाद आपको काबा में ले आए आपको गोद में लिए रहे और तवाफ करते रहे । फिर वापस लाकर हजरत आमना को दिया आपको और अरब के दस्तूर के मुताबिक एक बर्तन से ढांपा गया लेकिन वह बटन टूट कर आप के ऊपर से हट गया उस वक्त आप अपना अंगूठा चूस रहे थे ।

★_ इस मौके पर शैतान बुरी तरह चीखा। तफसीर में है कि शैतान सिर्फ 4 मर्तबा चीखा। पहली बार उस वक्त जब अल्लाह ताअला ने उसे मलऊन ठहराया, दूसरी बार उस वक्त जब उसे जमीन पर उतारा गया ,तीसरी बार उस वक्त चीखा जब आन हजरत सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की पैदाइश हुई और चौथी मर्तबा उस वक्त जब नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम पर सूरह फातिहा नाजिल हुई ।

★__ इस मौक़े पर हजरत हस्सान बिन साबित रजियल्लाहु अन्हु  कहते हैं :-  मैं 8 साल का था जो कुछ बोलता और सुनता था उसको समझता था एक सुबह मैंने यसरिब यानी मदीना मुनव्वरा में एक यहूदी को देखा वह एक ऊंचे टीले पर चढ़कर चिल्ला रहा था लोग उस यहूदी के गिर्द जमा हो गए और बोले क्या बात है क्यों चीख रहे हो ?  यहूदी ने जवाब दिया :- अहमद का  सितारा तुलू हो गया है और वह आज पैदा हो गये है।

★__ हजरत हस्सान बिन साबित रजियल्लाहु अन्हु बाद में 60 साल की उम्र में मुसलमान हो गए थे 120 साल की उम्र में इन्होंने वफात पाई, गोया  ईमान की हालत में 60 साल जिंदा रहे । बहुत अच्छे शायर थे। नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की अपने अशआर में तारीफ किया करते थे और दुश्मनों की बुराई अश'आर में बयान करते भे , गज़वात के मौके पर अशआर के जरिए मुसलमानों को जोश दिलाते थे। इसी बात पर इन्हें शायर ए रसूल का खिताब मिला था।

★__ हजरत काब अहबार रजियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं मैंने तोरात में पढ़ा है कि अल्लाह ताला ने हजरत मूसा अलैहिस्सलाम को आन हजरत सल्लल्लाहो वाले वसल्लम की विलादत के वक्त की खबर दे दी थी और हजरत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी कौम बनी इसराईल को इसकी इत्तला दे दी थी । इसी सिलसिले में उन्होंने फरमाया था :- तुम्हारे नज़दीक जो मशहूर चमकदार सितारा है जब वह हरकत में आए हैं तो वही वक्त रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की पैदाइश का होगा। यह खबर बनी इसराइल के उल्मा एक दूसरे को देते चले आए थे और इसी तरह बनी इसराईल को भी आन हजरत विलादत की विलादत का वक्त यानी उसकी अलामत मालूम थी।

★__हजरत आयशा रजियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि एक यहूदी आलिम मक्का में रहता था जब वह रात आई जिसमें आन हजरत सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम पैदा हुए तो वह कुरेश की एक मजलिस में बैठा था। उसने कहा:- क्या तुम्हारे यहां आज कोई बच्चा पैदा हुआ है ?

लोगों ने कहा:-  हमें तो मालूम नहीं ।

इस पर उस यहूदी ने कहा:-  मैं जो कुछ कहता हूं उसे अच्छी तरह सुन लो आज इस उम्मत का आखिरी नबी पैदा हो गया है और ऐ कुरेश के लोगों ! वह तुमने से है यानी वह कुरेशी है उसके कंधे के पास एक अलामत है (यानी मोहरे नबूवत ) उसमें बहुत ज्यादा बाल है यानी घने बाल और यह नबूवत का निशान है नबुवत की दलील है , उस बच्चे की अलामत है कि वह 2 रात तक दूध नहीं पिएगा , इन बातों का जिक्र उसकी नबुवत की अलामत के तौर पर पुरानी कुतुब में मौजूद है ।

अल्लामा इब्ने हजर ने लिखा है की यह बात दुरुस्त है आपने 2 दिन तक दूध नहीं पिया था।

★_ यहूदी आलिम ने जब यह बातें बताई तो लोग वहां से उठ गए उन्हें यहूदी की बातें सुनकर बहुत हैरत हुई थी जब यह लोग अपने घरों में पहुंचे तो उनमें से हर एक ने उसकी बातें अपने घर के अफराद को बताई, औरतों को चुंकि हजरत आमना के यहां बेटा पैदा होने की खबर हो चुकी थी इसलिए उन्होंने अपने मर्दों को बताया ।

ज़रा चलकर मुझे बच्चा दिखाओ । लोग उसे साथ लिए हजरत आमना के घर के बाहर आए उनसे बच्चा दिखाने की दरख्वास्त की ।आपने बच्चे को कपड़े से निकाल कर उन्हें दे दिया ।

लोगों ने आप के कंधे पर से कपड़ा हटाया, यहूदी की नज़र जोंही मोहरे नबुवत पर पड़ी वह फौरन बेहोश होकर गिर पड़ा । उसे होश आया तो लोगों ने उससे पूछा -तुम्हें क्या हो गया था ?

जवाब में उसने कहा- मैं इस गम से बेहोश हुआ था कि मेरी क़ौम में से नबुवत खत्म हो गई और ऐ क़ुरैश ! अल्लाह की कसम ! यह बच्चा तुम पर जबरदस्त गलबा हासिल करेगा और इसकी शोहरत मशरिक़ से मगरिब तक फैल जाएगी ।

*📕_सीरतुन नबी ﷺ _,*

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*┱✿_ मुहम्मद सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम का सितारा चमका -_,*

★__मुल्के शाम का एक यहूदी उयेस मक्का से कुछ फासले पर रहता था वह जब भी किसी काम से मक्का आता वहां के लोगों से मिलता तो उनसे कहता :- बहुत क़रीब के ज़माने में तुम्हारे दरमियान एक बच्चा पैदा होगा सारा आलम उसके रास्ते पर चलेगा उसके सामने ज़लील और पस्त हो जाएगा वह अजम और उसके शहरों का भी मालिक हो जाएगा यही उसका जमाना है । जो उसकी नबुवत के जमाने को पाएगा और उसकी पैरवी करेगा वह अपने मक़सद में कामयाब होगा , जिस खैर और भलाई की वह उम्मीद करता है वह उसको हासिल होगी और जो शख्स उसकी नबुवत का जमाना पाएगा मगर उसकी मुखालफत करेगा वह अपने मकसद और आरजूओं में नाकाम होगा।

★_मक्का मोअज़्ज़मा में जो भी बच्चा पैदा होता वह यहूदी उस बच्चे के बारे में तहकी़क़ करता और कहता ,अभी बच्चा पैदा नहीं हुआ । आखिर जब नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम इस दुनिया में तशरीफ़ लाएं तो अब्दुल मुत्तलिब अपने घर से निकल कर इसी यहूदी के पास पहुंचे । उसकी इबादतगाह के दरवाजे पर पहुंच कर उन्होंने आवाज दी , उयेस ने पूछा -कौन है ?

इन्होंने अपना नाम बताया ,फिर उससे पूछा -तुम इस बच्चे के बारे में क्या कहते हो ? उसने इन्हें देखा फिर बोला- हां तुम ही उसके बाप हो सकते हो । बेशक वह बच्चा पैदा हो गया है जिसके बारे में मैं तुम लोगों से कहा करता था वह सितारा आज तुलु हो गया हैं जो उस बच्चे की पैदाइश की अलामत है और उसकी अलामत यह है कि इस वक्त उस बच्चे को दर्द हो रहा है ,यह तकलीफ उसे तीन दिन रहेगी और उसके बाद यह ठीक हो जाएगा।

★_ राहिब ने जो यह कहा था बच्चा 3 दिन तक तकलीफ में रहेगा तो उसकी तफसील यह है कि आपने 3 दिन तक दूध नहीं पिया था और यहूदी ने जब यह कहा था कि हां आप ही उसके बाप हो सकते हैं, इससे यह मुराद है कि अरबों में दादा को भी बाप कह दिया जाता है और नबी करीम सल्लल्लाहो वसल्लम ने एक बार खुद फरमाया था- मैं अब्दुल मुत्तलिब का बेटा हूं ।

★_यहूदी ने अब्दुल मुत्तलिब से यह भी कहा था - इस बारे में अपनी जुबान बंद रखें यानी किसी को कुछ ना बताएं वरना लोग इस बच्चे से ज़बरदस्त हसद करेंगे इतना हसद करेंगे कि आज तक किसी ने नहीं किया और इसकी इस क़दर सख्त मुखालफत होगी कि दुनिया में किसी और की इतनी मुखालफत नहीं होगी ।

पोते के मुताल्लिक यह बातें सुनकर अब्दुल मुत्तलिब ने उयेस से पूछा :- इस बच्चे की उम्र कितनी होगी ?

यहूदी ने सवाल के जवाब में कहा:-  अगर इस बच्चे की उम्र तब'ई हुई तो भी 70 साल तक नहीं होगी बल्कि इससे पहले ही 61 या 63 साल की उम्र में वफात हो जाएगी और इसकी उम्मत की औसत उम्र भी इतनी होगी , इस की पैदाइश के वक्त दुनिया के बुत टूट कर गिर जाएंगे ।

★__ यह सारी अलामात उस यहूदी ने गुज़िस्ता अंबिया की पेशीन गोइयों से मालूम की थी और सब बिल्कुल सच साबित हुई कुरेश के कुछ लोग अमरू बिन नुफेल और अब्दुल्ला बिन जहश वगैरा एक बुत के पास जाया करते थे उस रात भी उसके पास गये जिस रात आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की पैदाइश हुई। इन्होंने देखा वह बुत उंधे मुंह गिरा पड़ा है इन लोगों को यह बात बुरी लगी इन्होंने उसको उठाया सीधा कर दिया मगर वह फिर गिर गया इन्होंने फिर उसको सीधा किया वह फिर उल्टा हो गया । इन लोगों को बहुत हैरत हुई, यह बात बहुत अजीब लगी । तब उस बुत से आवाज निकली :- यह एक ऐसे बच्चे की पैदाइश की खबर है जिसके नूर से मशरिक और मगरिब में जमीन के तमाम गोशे मुनव्वर हो गए हैं।

★_ बुत से निकलने वाली आवाज ने इन्हें और ज्यादा हैरतज़दा कर दिया । इसके अलावा एक वाक्या यह पेश आया कि ईरान के शहंशाह किसरा नौशेरवान का महल हिलने लगा और उसमें शगाफ पड़ गए । नोशेरवान का यह महल निहायत मजबूत था । बड़े-बड़े पत्थरों और चूने से तामीर किया गया था । इस वाक्य से पूरी सल्तनत में दहशत फैल गई ।सगाफ पडने से खौफनाक आवाज भी निकली थी। महल के 14 कंगूरे टूट कर नीचे आ गिरे थे।

★_ आप की पैदाइश पर एक वाक्या यह पेश आया कि फारस के तमाम आतिश क़दों की वह आग बुझ गई जिसकी वह लोग पूजा करते थे और उसको बुझने नहीं देते थे , लेकिन उस रात में एक ही वक्त में तमाम के तमाम आतिश क़दो की आग आनन-फानन बुझ गई । आग के पूजने वालों में रोना पीटना मच गया।

किसरा को ये तमाम इत्तेलात मिली तो उसने एक काहिन को बुलाया । उसने अपने महल में शगाफ पढ़ने और आतिश क़दो की आग बुझने के वाक़यात उसे सुना कर पूछा :- आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?

वह का़हिन खुद तो जवाब न दे सका , ताहम उसने कहा :- इन सवालात के जवाबात मेरा मामू दे सकता है । उसका नाम सतीह है।

नौशेरवान ने कहा :-  ठीक है तुम जाकर इन सवालात के जवाबात  लाओ।

वह गया ,सतीह से मिला, उसे यह वाक़यात सुनाएं, उसने सुन कर कहा :- एक असा वाले नबी ज़ाहिर होंगे जो अरब और शाम पर छा जाएंगे और जो कुछ होने वाला है होकर रहेगा ।

उसने यह जवाब कि़सरा को बताया । उस वक्त तक कि़सरा ने दूसरे काहिनो से भी मालूमात हासिल कर ली थी चुनांचे यह सुनकर उसने कहा :- तब फिर अभी वह वक्त आने में देर है ।( यानी उनका गलबा मेरे बाद होगा)

★__ पैदाइश के सातवें दिन अब्दुल मुत्तलिब ने आपका अकी़का़ किया और नाम " मोहम्मद " रखा। अरबों में इससे पहले यह नाम किसी का नहीं रखा गया था। कुरेश को यह नाम अजीब सा लगा ।चुनांचे कुछ लोगों ने अब्दुल मुत्तलिब से कहा :- ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! क्या वजह है कि तुमने इस बच्चे का नाम इसके बाप दादा के नाम पर नहीं रखा बल्कि मोहम्मद रखा है और यह नाम ना तुम्हारे बाप दादा में से किसी का है ना तुम्हारी कौम में से किसी का है ।

अब्दुल मुत्तलिब ने उन्हें जवाब दिया :-  मेरी तमन्ना है कि आसमानों में अल्लाह ताला इस बच्चे की तारीफ फरमाएं और जमीन पर लोग इसकी तारीफ करें। ( मोहम्मद के मा'अनी हैं जिसकी बहुत ज्यादा तारीफ की जाए)

★__ इसी तरह वाल्दा की तरफ से आपका नाम " अहमद " रखा गया । अहमद नाम भी इससे पहले किसी का नहीं रखा गया था। मतलब यह कि इन दोनों नामों की अल्लाह ताला ने हिफाज़त की और कोई भी यह नाम ना रख सका । अहमद का मतलब है सबसे ज्यादा तारीफ करने वाला।

अल्लाह सहली ने लिखा है आप अहमद पहले हैं और मोहम्मद बाद में । यानी आपकी तारीफ दूसरों ने बाद में की इससे पहले आप की शान यह हैं कि आप अल्लाह ताला की सबसे ज़्यादा हम्दो सना करने वाले हैं । पुरानी किताबों में आपका नाम अहमद जिक्र किया गया है।

★__ अपनी वाल्दा के बाद आप ने सबसे पहले सोबिया का दूध पिया, सौबिया नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के चाचा अबू लहब की बांदी थी। उनको अबु लहब ने आप की पैदाइश की खुशी में आज़ाद कर दिया था । सोबिया ने आपको चंद दिन तक दूध पिलाया । उन्हीं दिनों सोबिया के यहां अपना बेटा पैदा हुआ था । आपकी वाल्दा ने आपको सिर्फ 9 दिन तक दूध पिलाया ,उनके बाद सोनिया ने पिलाया । फिर दूध पिलाने की बारी हजरत हलीमा सादिया रजि़यल्लाहु अन्हा की आई।

★__ हजरत हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हा अपनी बस्ती से रवाना हुई , इनके साथ इनका दूध पीता बच्चा और शौहर भी थे । हज़रत हलीमा रज़ियल्लाहु अन्हा दूसरी औरतों के बाद मक्का में दाखिल हुई , इनका खच्चर बहुत कमजोर और मरियल था , इनके साथ इनकी कमज़ोर और बूढ़ी ऊंटनी थी । वह बहुत आहिस्ता चलती थी । इनकी वजह से हलीमा रज़ियल्लाहु अन्हा क़ाफिले से बहुत पीछे रह जाती थी । इस वक्त भी ऐसा ही हुआ, वह सबसे आखिर में मक्का में दाखिल हुई ।

*📕_सीरतुन नबी ﷺ _,*

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*┱✿_ हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हा की गोद में -_,*

★__ उस ज़माने में अरबों का दस्तूर यह था की जब उनके यहां कोई बच्चा होता तो वह देहात से आने वाली दाइयों के हवाले कर देते थे ताकि देहात में बच्चे की नशो नुमां बेहतर हो और वह खालिस अरबी जुबान सीख सकें ।

दाइयों का काफिला मक्का में दाखिल हुआ उन्होंने उन घरों की तलाश शुरू की जिनमें बच्चे पैदा हुए थे । इस तरह बहुत सी दाइयां जनाब अब्दुल मुत्तलिब के घर भी आई । नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा , जब उन्हें मालूम हुआ कि बच्चा तो यतीम पैदा हुआ है तो इस खयाल से छोड़ कर आगे बढ़ गई कि यतीम बच्चे के घराने से उन्हें क्या मिलेगा। इस तरह दाइयां आती रही जाती रही। किसी ने आप को दूध पिलाना मंजूर ना किया और करती भी कैसे यह स'आदत तो हजरत हलीमा रजियल्लाहु अन्हा के हिस्से में आना थी।

★_जब हलीमा रजियल्लाहु अन्हा मक्का पहुंची तो उन्हें मालूम हुआ सब औरतों को कोई ना कोई बच्चा मिल गया है और आप सिर्फ वह बगैर बच्चे के रह गई हैं और अब कोई बच्चा बाक़ी नहीं बचा । हां ! एक यतीम बच्चा जरूर बाक़ी है जिसे दूसरी औरतें छोड़ गई हैं। हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हा ने अपने शौहर अब्दुल्लाह इब्ने हारिस से कहा- खुदा की कसम ! मुझे यह बात बहुत नागवार गुज़र रही है कि मैं बच्चे के बगैर जाऊं, दूसरी सब औरतें बच्चे लेकर जाएं । यह मुझे ताने देंगे, इसलिए क्यों ना हम इसी यतीम बच्चे को ले लें ।

अब्दुल्लाह बोले - कोई हर्ज नहीं । हो सकता है अल्लाह इस बच्चे के ज़रिए हमें खैरों बरकत अता फरमा दें ।

★_ चुनांचे हजरत हलीमा सादिया रजियल्लाहु अन्हा अब्दुल मुत्तलिब के घर गई ।जनाब अब्दुल मुत्तलिब और हजरत आमना ने उन्हें खुश आमदीद कहा , फिर उन्हें बच्चे के पास ले आई , आप उस वक्त एक ऊनी चादर में लेटे हुए थे वह चादर सफेद रंग की थी आप के नीचे एक सब्ज़ रंग का रेशमी कपड़ा था ।आप सीधे लेटे हुए थे आप के सांस की आवाज के साथ मुश्क की सी खुशबू निकल कर फैल रही थी। हलीमा सादिया रजियल्लाहु अन्हा आपके हुस्नो जमाल को देख कर हैरत ज़दा रह गई ।आप उस वक्त सोए हुए थे, उन्होंने जगाना मुनासिब न समझा लेकिन जोंही उन्होंने प्यार से अपना हाथ आपके सीने पर रखा आप मुस्कुराए और आंखें खोल कर उनकी तरफ देखने लगे ।

★__ हजरत हलीमा सादिया रजियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं :- मैंने देखा आपकी आंखों से एक नूर निकला जो आसमान तक पहुंच गया मैंने आपको गोद में उठाकर आपकी दोनों आंखों के दरमियां जगह पर प्यार किया फिर मैंने आपकी वाल्दा और अब्दुल मुत्तलिब से इजाज़त चाही , बच्चे को लिए काफ़िले में आई । मैंने आप को दूध पिलाने के लिए गोद में लिटाया तो आप दाईं तरफ से दूध पीने लगे ,पहले मैंने बाई तरफ से दूध पिलाना चाहा लेकिन आपने उस तरफ से दूध ना पिया दाईं तरफ से आप फौरन दूध पीने लगे । बाद में भी आप की यही आदत रही ,आप सिर्फ दाईं तरफ से दूध पीते रहे बाई तरफ से मेरा बच्चा दूध पीता रहा।

★_फिर काफ़िला रवाना हुआ ।  हलीमा सादिया रजियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं:-  मैं अपने खच्चर पर सवार हुई,  आप को साथ ले लिया । अब जो हमारा खच्चर चला तो इस कदर तेज़ चला कि उसने पूरे काफ़िले की सवारियों को पीछे छोड़ दिया । पहले वह मरियल होने की बिना पर सबसे पीछे रहता था । मेरी खवातीन साथी हैरानगी से मुखातिब हुई :-  ऐ हलीमा !  यह आज क्या हो रहा है तुम्हारा खच्चर इस कदर तेज़ कैसे चल रहा है क्या यह वही खच्चर है जिस पर तुम आई थी और जिसके लिए एक एक कदम उठाना मुश्किल था ?

जवाब में मैंने उनसे कहा बेशक यह वही खच्चर है अल्लाह की कसम ! इस का मामला अजीब है।

★_फिर यह लोग बनु सा'द बस्ती पहुंच गए । उन दिनों यह इलाका़ खुश्क और क़हत ज़दा था । हलीमा सादिया रजियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं :- उस शाम जब हमारी बकरियां चरकर वापस आईं तो उनके थन दूध से भरे थे जबकि इससे पहले ऐसा नहीं था। उनमें से दूध बहुत कम और बहुत मुश्किल से निकलता था । हमने उस दिन अपनी बकरियों का दूध दोहा तो हमारे सारे बर्तन भर गए और हमने जान लिया कि यह सारी बरकत इस बच्चे की वजह से है । आसपास की औरतों में भी यह बात फैल गई ।उनकी बकरियां बदस्तूर बहुत कम दूध दे रही थी।

★__ गर्ज़ हमारे घर में हर तरफ हर चीज में बरकत नजर आने लगी । दूसरे लोग ताज्जुब में रहे इस तरह 2 माह गुजर गए , 2 माह में आप चलने फिरने लगे,  आप 8 माह के हुए तो बातें करने लगे और आपकी बातें समझ में आती थी,  9 माह की उम्र में तो आप बहुत साफ गुफ्तगू करने लगे । इस दौरान आप की बहुत सी बरक़ात देखने में आई । हलीमा सादिया फरमाती हैं :- जब मैं आपको अपने घर ले आई तो बनु सा'द का कोई घराना ऐसा ना था जिससे मुश्क की खुशबू ना आती हो इस तरह सब लोग आपसे मोहब्बत करने लगे ।

★_जब हमने आपका दूध छुड़ाया तो आपकी जुबान मुबारक से यह अल्फाज़ निकले :-

*"_ अल्लाहु अकबर क़बीरा वलहमदुलिल्लाहि कसीरा व सुब्हानल्लाहि बुकरतंव व असीला _,"*

यानी अल्लाह ताला बहुत बड़ा है अल्लाह ताला के लिए बेहद तारीफ है और उसके लिए सुबह व शाम पाकी है।

★_फिर जब आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम 2 साल के हो गए तो हम आप को लेकर आपकी वाल्दा के पास आए ।इस उम्र को पहुंचने के बाद बच्चों को मां-बाप के हवाले कर दिया जाता था। इधर हम आपकी बरकात देख चुके थे और हमारी आरजू थी कि अभी आप कुछ और मुद्दत हमारे पास रहें । चुनांचे हमने इस बारे में आप की वाल्दा से बात की उनसे यूं कहा :-

आप हमें इजाजत दे दीजिए कि हम बच्चे को 1 साल और अपने पास रखें । मैं डरती हूं कहीं इस पर मक्का की बीमारियों और आबो  हवा का असर ना हो जाए ।


★__ जब हमने उनसे बार-बार कहा तो हजरत आमना मान गई और हम आपको फिर अपने घर ले आए। जब आप कुछ बड़े हो गए तो बाहर निकल कर बच्चों को देखते थे ,वह आपको खेलते नजर आते ,आप उनके नज़दीक ना जाते । एक रोज़ आपने मुझसे पूछा :- 

अम्मी जान ! क्या बात है दिन में मेरे भाई बहन नज़र नहीं आते ?  आप अपने दूध शरीक भाई अब्दुल्लाह और बहनों अनीसा और शीमा के बारे में पूछ रहे थे।

 हलीमा रजियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं मैंने आपको बताया :-  वह सुबह सवेरे बकरियां चराने जाते हैं शाम के बाद घर आते हैं।

 यह जानकर आप ने फरमाया:- तब मुझे भी उनके साथ भेज दिया करें।


★_ उसके बाद आप अपने भाई-बहनों के साथ जाने लगे ।आप खुशी-खुशी जाते और वापस आते । ऐसे में एक दिन मेरे बच्चे खौफ ज़दा अंदाज में दौड़ते हुए आए और घबरा कर बोले :- 

अम्मी जान ! जल्दी चलिए वरना भाई (मुहम्मद सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम )खत्म हो जाएंगे । 

यह सुनकर हमारे तो होश उड़ गए ,दौड़कर वहां पहुंचे। हमने आपको देखा आप खड़े हुए थे, रंग उड़ा हुआ था ,चेहरे पर ज़र्दी छाई हुई थी और यह इसलिए नहीं था कि आपको सीना चाक किए जाने से कोई तकलीफ हुई थी बल्कि उन फरिश्तों को देखकर आप की हालत हुई थी ।


★_हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं, हमने आपसे पूछा :- क्या हुआ था ? 

आपने बताया :- मेरे पास दो आदमी आए थे वह सफेद कपड़े पहने हुए थे (वह दोनों हजरत जिब्राइल और हजरत मिकाईल अलैहिस्सलाम थे )उन दोनों में से एक ने कहा :- क्या यह वही हैं?

 दूसरे ने जवाब दिया:-  हां यह वही हैं।

 फिर वह दोनों मेरे करीब आए मुझे पकड़ा और लिटा दिया। उसके बाद उन्होंने मेरा पेट चाक किया और उसमें से कोई चीज़ तलाश करने लगे, आखिर उन्हें वह चीज़ मिल गई और उन्होंने उसे बाहर निकाल कर फेंक दिया। मैं नहीं जानता वह क्या चीज थी ।

"_उस चीज़ के बारे में दूसरी रिवायात में यह वजाहत मिलती है कि वह स्याह रंग का एक दाना सा था , यह इंसान के जिस्म में शैतान का घर होता है और शैतान इंसान के बदन में यहीं से असरात डालता है।


★_ हलीमा सादिया रजियल्लाहु अन्हा फरमाती है फिर हम आपको घर ले आए ।उस वक्त  मेरे शौहर अब्दुल्लाह बिन हारिस ने मुझसे कहा :-  हलीमा मुझे डर है कहीं इस बच्चे को कोई नुकसान ना पहुंच जाए इसलिए इसे इसके घर वालों के पास पहुंचा दो ।

मैंने कहा:- ठीक है ।

फिर हम आपको लेकर मक्का की तरफ रवाना हो गए । जब मैं मक्का के बालाई इलाक़े में पहुंची तो आप अचानक गायब हो गए ।मैं हवास बाख्ता हो गई।


★__ हलीमा सादिया फरमाती हैं- मैं परेशानी की हालत में मक्का पहुंची आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब के पास पहुंचते ही मैंने कहा -मैं आज रात मोहम्मद को लेकर आ रही थी ,जब मैं बालाई इलाक़े में पहुंची तो वह अचानक कहीं गुम हो गए ,अब खुदा की कसम मैं नहीं जानती वह कहां है ?

अब्दुल मुत्तलिब यह सुनकर काबा के पास खड़े हो गए, उन्होंने आप के मिल जाने के लिए दुआ की ,फिर आप की तलाश में रवाना हुए। उनके साथ वर्क़ा बिन नोफल भी थे। गर्ज़ दोनों तलाश करते करते तहामा की वादी में पहुंचे एक दरख्त के नीचे उन्हें एक लड़का खड़ा नजर आया उस दरख्त की शाखें बहुत घनी थी,  अब्दुल मुत्तलिब ने पूछा -लड़के तुम कौन हो?


★_हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम उस वक्त तक क़द निकाल चुके थे इसलिए अब्दुल मुत्तलिब पहचान ना सके ।आपका क़द तेजी से बढ़ रहा था। जवाब में आप ने फरमाया -मैं मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब हूं ।

यह सुनकर अब्दुल मुत्तलिब बोले- तुम पर मेरी जान कुर्बान ! मैं हीं तुम्हारा दादा अब्दुल मुत्तलिब हूं । फिर उन्होंने आप को उठाकर सीने से लगाया और रोने लगे ,आपको घोड़े पर अपने आगे बैठाया और मक्का की तरफ चले। घर आकर उन्होंने बकरियां और गायें जिबह की और मक्का वालों की दावत की।


★__ आप के मिल जाने के बाद हजरत हलीमा सादिया हजरत आमना के पास आईं, तो उन्होंने पूछा- हलीमा! अब आप बच्चे को क्यों ले आई? आपकी तो ख्वाहिश थी कि यह अभी आपके पास ही रहे ।

उन्होंने जवाब दिया -यह अब बड़े हो गए हैं और अल्लाह की क़सम मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी कर चुकी हूं । मैं खौफ महसूस करती रहती हूं कहीं इन्हें कोई हादसा ना पेश आ जाए लिहाजा इन्हें आप के सुपुर्द करती हूं । 

हजरत आमना को यह जवाब सुनकर हैरत हुई बोली- मुझे सच सच बताओ माजरा क्या है ?


★__ तब उन्होंने सारा हाल कह सुनाया , हलीमा सादिया रजियल्लाहु अन्हा ने दरअसल कई अजीबो-गरीब वाक्यात देखे थे , उन वाक्यात की वजह से वह बहुत परेशान हो गई थी । फिर सीना मुबारक चाक किए जाने वाला वाक्या पेश आया तो वह आप को फौरी तौर पर वापस करने पर मजबूर हो गईं । वह चंद वाक्यात हजरत हलीमा रजियल्लाहु अन्हा इस तरह बयान करती है :- 


"_ एक मर्तबा यहूदी की एक जमात मेरे पास से गुजरी ,यह लोग आसमानी किताब तौरात को मानने का दावा करते थे। मैंने उनसे कहा -क्या आप लोग मेरे इस बेटे के बारे में कुछ बता सकते हैं ? साथ ही मैंने हुजूर अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की पैदाइश के बारे में उन्हें तफसिलात सुनाई । यहूदी तफसिलात सुनकर आपस में कहने लगे- इस बच्चे को क़त्ल कर देना चाहिए।

यह कहकर उन्होंने पूछा क्या यह बच्चा यतीम है ?

मैंने उनकी बात सुनी थी कि वे उनके क़त्ल करने का इरादा कर रहे हैं सौ मैने जल्दी से अपने शोहर की तरफ इशारा करते हुए कहा -नहीं ! यह रहे इस बच्चे के बाप ।

तब उन्होंने कहा अगर यह बच्चा यतीम होता तो हम जरूर इसे क़त्ल कर देते ।


★_यह बात उन्होंने इसलिए कहीं कि उन्होंने पुरानी किताबों में पढ़ रखा था कि एक आखरी नबी आने वाले हैं उनका दिन सारे आलम में फैल जाएगा हर तरफ उनका बोलबाला होगा उनकी पैदाइश और बचपन की यह यह अलामात होंगी और यह कि वो यतीम होंगे । अब क्योंकि उनसे हलीमा सादिया ने यह कह दिया कि यह बच्चा यतीम नहीं है, तो उन्होंने ख्याल कर लिया कि यह वह बच्चा नहीं है । इस तरह उन्होंने बच्चे को कत्ल करने का इरादा तर्क कर दिया।


★__ इसी तरह उनके साथ यह वाक़्या पेश आया । एक मर्तबा वह आपको उक़ाज़ के मेले मे ले आई , जिहालत के दौर में यहां बहुत मशहूर मेला लगता था यह मेला ताइफ और नखला के दरमियान में लगता था । अरब के लोग हज करने आते तो शव्वाल का महिला इस मेले में गुजारते, खेलते कूदते और अपनी बड़ाई बयान करते । हलीमा सादिया रजियल्लाहु अन्हा आपको लिए बाजार में घूम रही थी कि एक काहिन  की नज़र आप पर पड़ गई ,उसे आप में नबुवत की तमाम अलामात नज़र आ गई। उसने पुकार कर कहा -लोगों इस बच्चे को मार डालो । 

हलीमा उस काहिन की बात सुनकर घबरा गई और जल्दी से वहां से निकल गई , इस तरह अल्लाह ताला ने हुजूर सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की हिफाजत फरमाई।


★_ मैले में मौजूद लोगों ने काहिन की आवाज सुनकर इधर-उधर देखा कि किसी बच्चे को क़त्ल करने के लिए कहा गया है मगर उन्हें वहां कोई बच्चा नज़र नहीं आया अब लोगों ने काहिन से पूछा -क्या बात है आप किस बच्चे को मार डालने के लिए कह रहे हैं ? 

उसमें उन लोगों को बताया- मैंने अभी एक लड़के को देखा है माबूदों की क़सम वह तुम्हारे दीन के मानने वालों को क़त्ल करेगा, तुम्हारे बुतों को तोड़ेगा और वह तुम पर गालिब आएगा। 

यह सुनकर लोग आपकी तलाश में इधर उधर दौड़े लेकिन नाकाम रहे।


★_हलीमा सादिया आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम को लिए वापस आ रही थी कि ज़िल हिजाज़ से उनका गुज़र हुआ यहां भी मेला लगा हुआ था इसी बाजा़र में एक नजूमी था लोग उसके पास अपने बच्चों को लेकर आते थे वह बच्चों को देखकर उनकी किस्मत के बारे में अंदाजा लगाता था । हलीमा सादिया उस के नज़दीक से गुज़री तो नजूमी की नज़र आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम पर पड़ी , नजूमी को आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की मोहरे नबुवत नज़र आ गई, साथ ही आप सल्लल्लाहु वसल्लम की आंखें की खास सुर्खी उसने देख ली। वह चिल्ला उठा -

ए अरब के लोगों ,इस लड़के को क़त्ल कर दो यह यकी़नन तुम्हारे दीन के मानने वालों को क़त्ल करेगा तुम्हारे बुतों को तोड़ेगा और तुम पर गालिब आएगा । 

यह कहते हुए वह आपकी तरफ झपटा लेकिन उसी वक्त वह पागल हो गया और उसी पागलपन में मर गया।


★__ एक वाक्या और सीरत इब्ने हिशाम में है की हबशा के ईसाइयों की एक जमात हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के पास से गुज़री उस वक्त आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम हलीमा सादिया के साथ थे और वह आपको आपकी वाल्दा के हवाले करने जा रही थी । ईसाइयों ने आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के मोंढ़ों के दरमियान मोहरे नबूवत को देखा और आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की आंखों की सुर्खी को भी देखा उन्होंने हलीमा सादिया से पूछा -क्या इस बच्चे की आंखों में कोई तकलीफ है ?

उन्होंने जवाब में कहा- नहीं कोई तकलीफ नहीं यह सुर्खी तो इनकी आंखों में कुदरती है ।

उन ईसाइयों ने कहा- तब इस बच्चे को हमारे हवाले कर दो हम इसे अपने मुल्क ले जाएंगे यह बच्चा पैगंबर और बड़ी शान वाला है ,हम इसके बारे में सब कुछ जानते हैं।


★_हलीमा सादिया यह सुनते ही वहां से जल्दी से दूर चली गई यहां तक कि आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम को आपकी वालिदा के पास पहुंचा दिया ,इन वाक़यात में जो सबसे अहम वाक़्या है वह सीना मुबारक चाक करने वाला था।  रिवायात से यह बात साबित है कि आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के सीना मुबारक पर सिलाई के निशानात मौजूद थे जैसा कि आज कल डॉक्टर हजरात ऑपरेशन के बाद टांके लगाते हैं टांके खोल दिए जाने के बाद भी सिलाई के निशानात मौजूद रहते हैं। इस वाक्य़ के बाद हलीमा सादिया और उनके खाविंद ने फैसला किया कि अब बच्चे को अपने पास नहीं रखना चाहिए।


★_जब हजरत हलीमा सादिया ने आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को हजरत आमना के हवाले किया उस वक्त आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की उम्र 4 साल थी एक रिवायत यह मिलती है कि उस वक्त उमर शरीफ 5 साल थी , एक तीसरी रिवायत के मुताबिक उम्र मुबारक 6 साल हो चुकी थी, जब हलीमा सादिया ने आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम को हजरत आमना के हवाले किया तो उसके कुछ दिनों बाद हजरत आमना इंतकाल कर गई । वाल्दा का साया भी सर से उठ गया। हजरत आमना की वफात मक्का और मदीना के दरमियान अबवा के मुकाम पर हुई, आपको यही दफन किया गया ।


"_हुआ यह कि आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की वाल्दा आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम को ले को लेकर अपने मायके मदीना मुनव्वरा गई आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के साथ उम्मे ऐमन भी थी । उम्मे ऐमन कहती हैं कि - एक दिन मदीना के दो यहूदी मेरे पास आए और बोले- ज़रा मोहम्मद को हमारे सामने लाओ हम उन्हें देखना चाहते हैं। वह आप सल्लल्लाहो वसल्लम को उनके सामने ले आई, उन्होंने अच्छी तरह देखा फिर एक ने अपने साथी से कहा -

"_यह इस उम्मत का नबी है और यह शहर इनकी हिजरत गाह है यहां जबरदस्त जंग होगी कैदी पकड़े जाएंगे ।

आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की वाल्दा को यहूदियों की इस बात का पता चला तो आप डर गई और आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम को लेकर मक्का की तरफ रवाना हुई... मगर रास्ते ही में अबवा के मुका़म पर वफात पा गईं।

*📕_सीरतुन नबी ﷺ _,*

 ╨─────────────────────❥ 

❥_ निराली शान का मालिक -_,*


★__ हजरत आमना के इंतकाल के 5 दिन बाद उम्मे ऐमन आपको लेकर मक्का पहुंची, आपको अब्दुल मुत्तलिब के हवाले किया,  आपके यतीम हो जाने का उन्हें इतना सदमा था कि बेटे की वफात पर भी उतना नहीं हुआ था।


★__ अब्दुल मुत्तलिब के लिए काबा के साए में एक कालीन बिछाया जाता था वह उस पर बैठा करते थे उनका एहतराम इस क़दर था कि कोई और उस कालीन पर बैठता नहीं था उनके बेटे और कुरेश के सरदार उस कालीन के चारों तरफ बैठते थे, लेकिन रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम वहां तशरीफ लाते तो सीधे उस कालीन पर जा बैठते । उस वक्त आप एक तंदुरुस्त लड़के थे ,आपकी उम्र 9 साल के करीब हो चली थी । आपके चाचा अब्दुल मुत्तलिब के अदब की वजह से आपको उस कालीन से हटाना चाहते तो अब्दुल मुत्तलिब कहते-  मेरे बेटे को छोड़ दो अल्लाह की कसम यह बहुत शान वाला है ।

फिर वह आपको मोहब्बत से फर्श पर बिठाते आपकी कमर पर शफक़त से हाथ फैरते, आपकी बातें सुनकर हद दर्जे खुश होते रहते।


★_ कभी वह दूसरों से कहते :-  मेरे बेटे को यहीं बैठने दो , उसे खुद भी एहसास है कि इसकी बड़ी शान है और मेरी आरजू है यह इतना बुलंद रुतबा पाए जो किसी अरब को इससे पहले हासिल में हुआ हो और ना बाद में किसी को हासिल हो सके ।

एक बार उन्होंने यह अल्फाज़ कहे :- मेरे बेटे को छोड़ दो इसके मिज़ाज में तबई तौर पर बुलंदी है... इसकी शान निराली होगी ।"


"_ यहां तक की उम्र के आखिरी हिस्से में हजरत अब्दुल्ला की आंखें जवाब दे गई थी आप नाबीना हो गए थे ,ऐसी हालत में एक रोज़ वह उस कालीन पर बैठे थे कि आप तशरीफ ले आए और सीधे उस कालीन पर जा पहुंचे, एक शख्स ने आपको कालीन से खींच लिया। इस पर आप रोने लगे , आप के रोने की आवाज सुनकर अब्दुल मुत्तलिब बेचैन हुए और बोले - मेरा बेटा क्यों रो रहा है ?

आपके कालीन पर बैठना चाहता है ...हमने इसे कालीन से उतार दिया है ।

यह सुनकर अब्दुल मुत्तलिब ने कहा-  मेरे बेटे को कालीन पर ही बिठा दो , यह अपना रुतबा पहचानता है। मेरी दुआ है कि यह उस रुतबे को पहुंचे जो इससे पहले किसी और को ना मिला हो, इसके बाद किसी को ना मिले _,"


★_ इसके बाद फिर किसी ने आपको कालीन पर बैठने से नहीं रोका ।

   

★__ एक रोज़ बनू मुदलज के कुछ लोग अब्दुल मुत्तलिब से मिलने के लिए आए उनके पास उस वक्त आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम भी तशरीफ़ फरमा थे। बनू मुदलज के लोगों ने आपको देखा । यह लोग कि़याफा शनाश थे ,आदमी का चेहरा देखकर उसके मुस्तकबिल के बारे में अंदाजे बयान करते थे। उन्होंने अब्दुल मुत्तलिब से कहां - इस बच्चे की हिफाज़त करें इसलिए कि मक़ामें इब्राहिम पर जो हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम  के क़दम का निशान है इस बच्चे के पांव का निशान बिल्कुल उस निशान से मिलता जुलता है, इस कदर मुशाबहत हमने किसी और के पांव के निशान में नहीं देखी.. हमारा ख्याल है... यह बच्चा निराली शान का मालिक होगा... इसलिए इसकी हिफाज़त करें।


★_ मक़ामें इब्राहिम खाना काबा में वह पत्थर है जिस पर हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम काबे की तामीर के वक्त खड़े हुए थे । मौजज़े के तौर पर उस पत्थर पर इब्राहिम अलैहिस्सलाम के पैरों के निशान पड़ गए थे लोग इस पत्थर की जियारत करते हैं । यहीं मक़ामें इब्राहिम है । चूंकि आप हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की नस्ल से हैं इसलिए उनके पांव की मुशाबहत आप में होना कु़दरती बात थी।


★_ एक रोज़ हजरत अब्दुल मुत्तलिब खाना काबा में हजरे अस्वद के पास बैठे हुए थे ।ऐसे में उनके पास नजरान के ईसाई आ गए । उन्हें एक पादरी भी था ।उस पादरी ने अब्दुल मुत्तलिब से कहा-  हमारी किताबों में एक ऐसे नबी की अलामात है जो इस्माईल की औलाद में होना बाकी़ है ,यह शहर उसकी जाए पैदाइश होगा, उसकी यह यह निशानियां होगी।

 अभी बात हो रही थी कि कोई शख्स से आपको लेकर वहां आ पहुंचा । पादरी की नजर जोंही आप पर पड़ी वह चौक उठा आपकी आंखों, कमर और पैरों को देखकर वह चिल्ला उठा - वह नबी यही हैं यह तुम्हारे क्या लगते हैं ?

अब्दुल मुत्तलिब बोले - यह मेरे बेटे हैं ।

इस पर वह पादरी बोला- ओहो ! तब यह वह नहीं इसलिए कि हमारी किताबों में लिखा है कि उनके वालिद का इंतकाल उनकी पैदाइश से पहले हो जाएगा ।

यह सुनकर अब्दुल मुत्तलिब बोले- यह दरअसल मेरे पोते हैं , इनके बाप का इंतकाल हो गया था जब यह पैदा ही नहीं हुए थे।

इस पर पादरी बोला- हां ! यह बात हुई ना ...आप इनकी पूरी तरह हिफाजत करें।


★__ अब्दुल मुत्तलिब की आपसे मोहब्बत का यह आलम था कि खाना खाने बैठते तो कहते मेरे बेटे को ले आओ । आप तशरीफ लाते तो अब्दुल मुत्तलिब आपको अपने पास बिठाते आपको अपने साथ खिलाते ।

बहुत ज्यादा उम्र वाले एक सहाबी हैदह बिन मुआविया रजियल्लाहु अन्हु कहते हैं मैं एक मर्तबा इस्लाम से पहले जाहिलियत के ज़माने में हज के लिए मक्का मुअज्जमा गया वहां बेतुल्ला का तवाफ कर रहा था, मैंने एक ऐसे शख्स को देखा जो बहुत बूढ़ा और बहुत लंबे कद का था वह बैतुल्लाह का तवाफ कर रहा था और कह रहा था- ए मेरे परवरदिगार मेरी सवारी को मोहम्मद की तरफ फैर दे और उसे मेरा दस्त व बाजू़ बना दे ।

मैंने उस बूढ़े को जब यह शेर पढ़ते सुना तो लोगों से पूछा -यह कौन है ? 

लोगों ने बताया कि वे अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम है,  उन्होंने अपने पोते को अपने एक ऊंट की तलाश में भेजा है वह गुम हो गया है और वह पौता ऐसा है कि जब भी किसी गुमशुदा चीज़ की तलाश में उसे भेजा जाता है तो वह चीज़ लेकर ही आता है, पौते से पहले अपने बेटों को उस ऊंट की तलाश में भेज चुके हैं लेकिन वह नाकाम लौट आए हैं अब चुंकि पौते को गए हुए देर हो गई है ,इसलिए परेशान है और दुआ मांग रहे हैं।


"_ थौड़ी ही देर गुज़री थी कि मैंने देखा कि आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ऊंट को लिए तशरीफ ला रहे हैं ।अब्दुल मुत्तलिब ने आपको देखकर कहा- मेरे बेटे! मैं तुम्हारे लिए इस क़दर फिक्र बंद हो गया था कि शायद इसका असर कभी मेरे दिल से ना जाए।


★_ अब्दुल मुत्तलिब की बीवी का नाम रुकैया बिंते अबू सैफी था वह कहती हैं;-  क़ुरेश कई साल से सख्त क़हत साली का शिकार थे बारिशें बिल्कुल बंद थी सब लोग परेशान थे उस ज़माने में मैंने एक ख्वाब देखा कोई शख्स ख्वाब में कह रहा था :-

ऐ क़ुरेश के लोगों तुम में से एक नबी ज़ाहिर होने वाला है उसके ज़हूर का वक्त आ गया है उसके ज़रिए तुम्हें जिंदगी मिलेगी यानी खूब बारिशें होंगी सर सब्जी़ और शादाबी होगी तुम अपने लोगों में से एक ऐसा शख्स तलाश करो जो लंबे कद का हो गोरे रंग का हो उसकी पलके घनी हो ,भंवें और अबरो मिले हुए हो , वह शख्स अपनी तमाम औलाद के साथ निकले और तुम में से हर खानदान का एक आदमी निकले सब पाक साफ हों और खुशबू लगाएं ,वह हजरे अस्वद को बोसा दे फिर सब जबले अबु क़ैश पर चढ़ जाएं ,फिर वह शख्स जिसका हुलिया बताया गया है आगे बढ़े और बारिश की दुआ मांगें और तुम सब आमीन कहो तो बारिश हो जाएगी। 


★_ सुबह हुई तो रुकैया ने अपना यह ख्वाब कुरेश से बयान किया उन्होंने उन्होंने उन निशानियों को तलाश किया तो सब की सब निशानियां उन्हें अब्दुल मुत्तलिब में मिल गई । चुनांचे सब उनके पास जमा हो गए हर खानदान से एक एक आदमी आया उन सब ने शराइत पूरी की, उसके बाद सब अबु के़श पहाड़ पर चढ़ गए ,उनमें नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम भी थे आप उस वक्त नव उम्र थे । फिर अब्दुल मुत्तलिब आगे बड़े और उन्होंने यूं दुआ की :- 

"_ ऐ अल्लाह ! यह सब तेरे गुलाम है तेरे गुलामों की औलाद है तेरी बांदिया है और तेरी बांदियों की औलाद है हम पर जो बुरा वक्त आ पड़ा है तू देख रहा है हम मुसलसल क़हत साली का शिकार हैं अब ऊंट गायें घोड़े खच्चर और गधे सब कुछ खत्म हो चुके हैं और जानवरों पर बन आई है इसलिए हमारी यह खुश्कसाली खत्म फरमा दे हमें जिंदगी और सर सब्जी़ और शादाबी अता फरमा दे।


★_अभी यह दुआ मांग ही रहे थे कि बारिश शुरू हो गई, वादियां पानी से भर गई लेकिन उस बारिश में एक बहुत अजीब बात हुई और वह अजीब बात यह थी कि क़ुरेश को यह सैराबी ज़रूर हासिल हुई मगर यह बारिश कबीला क़ैस और क़बीला मुज़िर की क़रीबी बस्तियों में बिल्कुल ना हुई। अब लोग बहुत हैरान हुए कि यह क्या बात हुई ,एक क़बीले पर बारिश और आसपास के सभी क़बीले बारिश से महरूम ...तमाम क़बीलों के सरदार जमा हुए इस सिलसिले में बातचीत शुरू हुई एक सरदार ने कहा :- हम ज़बरदस्त क़हत और खुश्क़साली का शिकार हैं जबकि कुरेश को अल्लाह ताला में बारिश अता की है और यह अब्दुल मुत्तलिब की वजह से हुआ है। इसलिए हम सब उनके पास चलते हैं अगर वह हमारे लिए दुआ कर दें तो शायद अल्लाह हमें भी बारिश दे दे।


★_ यह मशवरा सबको पसंद आया । चुनांचे सब लोग मक्का मुअज्जमा में आए और अब्दुल मुत्तलिब से मिले उन्हें सलाम किया फिर उनसे कहा :- ऐ अब्दुल मुत्तलिब ! हम कई साल से खुश्कसाली के शिकार हैं हमें आपकी बरकत के बारे में मालूम हुआ है इसलिए मेहरबानी करके आप हमारे लिए भी दुआ करें इसलिए कि अल्लाह ने आपकी दुआ से कु़रेश को बारिश अता की है।

 उनकी बात सुनकर अब्दुल मुत्तलिब ने कहा:- अच्छी बात है, मैं कल मैदाने अराफात में आप लोगों के लिए भी दुआ करूंगा।


★__ दूसरे दिन सुबह सवेरे अब्दुल मुत्तलिब मैदाने अराफात की तरफ रवाना हुए उनके साथ दूसरे लोगों के अलावा उनके बेटे और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम भी थे ।अराफात के मैदान में अब्दुल मुत्तलिब के लिए एक कुर्सी बिछाई गई वह उस पर बैठ गए ,नबी करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम को उन्होंने गोद में बिठा लिया फिर उन्होंने हाथ उठाकर यह दुआ की :- 

ऐ अल्लाह ,चमकने वाली बिजली के परवरदिगार और गरजने वाली गरज के मालिक पालने वालों के पालने वाले और मुश्किलात को आसान करने वाले यह क़बीला कैश और कबीला मुज़िर के लोग हैं ,यह बहुत परेशान हैं इनकी कमरे झुक गई हैं यह तुझसे अपनी लाचारी और बेबसी की फरियाद करते हैं और जान माल की बर्बादी की शिकायत करते हैं। ए अल्लाह इनके लिए खूब बरसने वाले बादल भेज दे और आसमान से इनके लिए रहमत अता फरमा। ताकि ज़मीने सर सब्ज़ हो जाएं और उनकी तकलीफ दूर हो जाएं।


★_अब्दुल मुत्तलिब अभी यह दुआ कर ही रहे थे कि एक सियाह बादल उठा अब्दुल मुत्तलिब की तरफ आया और उसके बाद उसका रूख क़बीला कैश और बनु मुज़िर की बस्तियों की तरफ हो गया यह देखकर अब्दुल मुत्तलिब ने कहा :-  ऐ गिरोह क़ुरेश और मुज़िर, जाओ तुम्हें सैराबी हासिल हो गई ।

चुनांचे यह लोग जब अपनी बस्ती में पहुंचे तो वहां बारिश शुरू हो चुकी थी।


★_आप 7 साल के हो चुके थे कि आपकी आंखें दुखने को आ गई, मक्का में आंखों का इलाज कराया लेकिन इफाक़ा ना हुआ अब्दुल मुत्तलिब से किसी ने कहा- उकाज़ के बाज़ार में एक राहिब रहता है वह आंखों की तकालीफ का इलाज करता है। अब्दुल मुट्टलिब आपको उसके पास ले गए उसकी इबादतगाह का दरवाजा बंद था उन्होंने इसे आवाज दी। राहीब ने कोई जवाब ना दिया, अचानक इबादत गाह में शदीद ज़लज़ला आया ,वह डर गया कि कहीं इबादत खाना उसके ऊपर ना गिर पड़े इसलिए एकदम बाहर निकल आया ।अब उसने आपको देखा तो चौंक उठा। उसने कहा:- ए अब्दुल मुत्तलिब यह लड़का इस उम्मत का नबी है अगर मैं बाहर ना निकल आता तो यह इबादत गाह ज़रूर मुझ पर गिर पड़ता, इस लड़के को फौरन वापस ले जाओ और इसकी हिफाजत करें, कहीं यहूदियों या ईसाइयों में से कोई इसे क़त्ल ना कर दें, 

फिर उसने कहा - और रही बात इनकी आंखों की ...तो आंखों की दुआ तो खुद के इनके पास मौजूद है ।

अब्दुल मुत्तलिब यह सुनकर हैरान हुए और बोले -इनके अपने पास है ? मैं समझा नहीं ।

हां इनका लूआबे दहन इनकी आंखों में लगाएं ।

उन्होंने ऐसा ही किया आंखें फौरन ठीक हो गई ।


★__ पुरानी आसमानी किताबों में आपकी बहुत सी निशानियां लिखी हुई थी इसकी तफ्सील बहुत दिलचस्प है । 

यमन में एक क़बीला हमीर था वहां एक शख्स सेफ बिन यज़्न  था वह सेफ हमीरी कहलाता था। किसी जमाने में उसके बाप दादा उस मुल्क पर हुकूमत करते थे लेकिन फिर हब्शियों ने यमन पर हमला किया और उस पर कब्ज़ा कर लिया वहां हब्शियों की हुकूमत हो गई 70 साल तक यमन हब्शियों के क़ब्जे़ में रहा जब यह सैफ बड़ा हुआ तो उसके अंदर अपने बाप दादा का मुल्क आज़ाद कराने की उमंग पैदा हुई । उसमें एक फौज तैयार की, उस फौज के ज़रिए हब्शियों पर हमला किया और उन्हें यमन से भगा दिया । इस तरह वह बाप दादा के मुल्क को आज़ाद कराने में कामयाब हो गया ,वहां का बादशाह बन गया । यह यमन अरब का इलाका था जब उस पर हब्शियों ने कब्जा किया था तो अरबों को बहुत अफसोस हुआ। 70 साल बाद जब यमन के लोगों ने हब्शियों को निकाल बाहर किया तो अरबों को बहुत खुशी हुई ।उनकी खुशी की एक वजह तो यह थी कि इन्ही हब्शियों ने अब्राहा के साथ मक्का पर चढ़ाई की थी । चारों तरफ से अरबों के वफद सेफ को मुबारकबाद देने के लिए आने लगे।


★_ क़ुरेश का भी एक वफद मुबारक बु देने के लिए गया उस वफद के सरदार अब्दुल मुत्तलिब थे ।यह वफद जब यमन पहुंचा तो सैफ अपने महल में था उसके सर पर ताज था सामने तलवार रखी थी और हमीरी सरदार उसके दाएं बाएं बैठे थे । सेफ क़ुरेश के वफद की आमद के बारे में बताया गया उसे यह भी बताया गया कि यह लोग किस रुतबे के हैं । उसने उन लोगों को आने की इजाजत दे दी । यह वफद दरबार में पहुंचा अब्दुल मुत्तलिब आगे बढ़कर उसके सामने जा खड़े हुए उन्होंने बात करने की इजाजत चाही। सैफ ने कहा- अगर तुम बादशाहो के सामने बोलने के आदाब से वाकि़फ हो तो हमारी तरफ से इजाज़त है ।

अब्दुल मुत्तलिब ने कहा- ए बादशाह हम काबा के खादिम है , अल्लाह के घर के मुहाफिज़ है हम आपको मुबारकबाद देने आए हैं यमन पर हब्शी हुकूमत हमारे लिए भी बोझ बनी हुई थी आपको मुबारक हो आपके इस कारनामे से आपके बुजुर्गों को भी इज्ज़त मिलेगी और आने वाली नस्लों को भी वका़र हासिल होगा।


★_सैफ उनके अल्फा़ज़ सुनकर बहुत खुश हुआ बे अख्तियार बोल उठा - ऐ शख्स तुम कौन हो क्या नाम है तुम्हारा ?

उन्होंने कहा -मेरा नाम अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम है।

 सैफ ने हाशिम का नाम सुनकर कहा - तब तो तुम हमारी बहन के लड़के हो ।


"_ अब्दुल मुत्तलिब की वाल्दा मदीने के क़बीला खज़रज की थी और खज़रज का क़बीला दरअसल यमन का था इसलिए सैफ ने हाशिम का नाम सुनकर कहा-  तब तो तुम हमारी बहन के लड़के हो । 

फिर उसने कहा -हम आप सब को खुशामदीद कहते हैं आपके जज़्बात की कद्र करते हैं।


★__ उसके बाद क़ुरेश के वफद को सरकारी मेहमान खाने में ठहरा दिया गया उनकी खूब खातिर मदारत की गई यहां तक कि एक महीना गुजर गया।एक माह की मेहमान नवाजी के बाद सैफ में उन्हें  बुलाया ,अब्दुल मुत्तलिब को अपने पास बुला कर उसने कहा :-

"_ ए अब्दुल मुत्तलिब मैं अपने इल्म के पोशीदा राज़ों में से एक राज़ तुम्हें बता रहा हूं तुम्हारे अलावा कोई और होता तो मैं हरगिज़ ना बताता तुम इस राज़ के उस वक्त तक राज़ ही रखना जब तक कि खुद अल्लाह ताला इस राज़ को ज़ाहिर ना फरमा दे। हमारे पास एक पोशीदा किताब है वह पोशीदा राज़ों का एक खज़ाना है हम दूसरों से इसको छुपा कर रखते हैं । मैंने उस किताब में एक अज़ीमुश शान खबर और एक बड़े खतरे के बारे में पढ़ लिया है और वह आपके बारे में है ।


अब्दुल मुत्तलिब यह बातें सुनकर हद दर्जे हैरत ज़दा हुए और पुकार उठे :- मैं समझा नहीं आप कहना क्या चाहते हैं ।

सुनो अब्दुल मुत्तलिब , जब तहामा की वादी यानी मक्का में ऐसा बच्चा पैदा हो कि जिसके दोनों कंधों के दरमियान बालों का गुच्छा( यानी मोहरे नबुवत) हो तो उसे इमामत और सरदारी हासिल होगी और इसकी वजह से तुम्हें क़यामत तक के लिए ऐज़ाज़ मिलेगा, इज्जत मिलेगी ।

अब्दुल मुत्तलिब ने यह सुनकर कहा:-  ऐ बादशाह , अल्लाह करे आपको भी ऐसी खुशबख्ती मयस्सर हो आपकी हैयत मुझे रोक रही है वरना मैं आपसे पूछता कि उस बच्चे का जमाना कब होगा ?

 बादशाह ने जवाब में कहा :- यही उसका जमाना है वह इसी जमाने में पैदा होगा या पैदा हो चुका है उसका नाम मोहम्मद होगा उसकी वाल्दा का इंतकाल हो जाएगा उसके दादा और चाचा उसकी परवरिश करेंगे हम भी उसके आरजूमंद रहे कि वह बच्चा हमारे यहां पैदा हो । अल्लाह ताला उसे खुले आम ज़ाहिर फरमाएगा और उसके लिए हममे से (यानी मदीना के क़बीला खज़रज में ) उस नबी के मददगार बनाएगा (हममे से उसने इसलिए कहा कि खज़रज असल में यमन के लोग थे ) उनके जरिए उस नबी के खानदान और क़बीले वालों को इज्जत हासिल होगी और उनके ज़रिए उसके दुश्मनों को जिल्लत मिलेगी और उनके जरिए वह तमाम लोगों से मुक़ाबला करेगा और उनके ज़रिए ज़मीन के अहम इलाक़े फयह हो जाएंगे। वह नबी रहमान की इबादत करेगा शैतान को धमकाया आतिश क़दो को ठंडा करेगा ( यानि आग के पुजारियों को मिटाएगा) बुतों को तोड़ डालेगा, उसकी हर बात आखरी फरमान होगी उसके अहकामात इंसाफ वाले होंगे वह नेक कामों का हुक्म देगा खुद भी उन पर अमल करेगा बुराइयों से रोकेगा उनको मिटा डालेगा ।


★_ अब्दुल मुत्तलिब ने सैफ बिन यज़न को दुआ दी फिर कहा :- कुछ और तफसील बयान करें।


"_ बात ढ़ंकी छिपी है और अलामतें पोशीदा है मगर ए अब्दुल मुत्तलिब इसमें शुबहा नहीं कि तुम उसके दादा हो।

अब्दुल मुत्तलिब यह सुनकर फौरन सज्दे में गिर गये और सैफ ने उनसे कहा -अपना सर उठाओ अपनी पेशानी ऊंची करो और मुझे बताओ जो कुछ मैंने तुमसे कहा है क्या तुमने इनमें से कोई अलामत अपने यहां देखी है ? 

इस पर अब्दुल मुत्तलिब ने कहा:- हां मेरा एक बेटा था , मैं उसे बहुत चाहता था , मैंने एक शरीफ और मोअज्जज़ लड़की आमना बिन्ते वहब बिन अब्दे मुनाफ से उसकी शादी कर दी वह मेरी क़ौम के इंतेहाई बा इज्ज़त खानदान से थी, उससे मेरे बेटे के यहां एक लड़का पैदा हुआ । मैंने उसका नाम मोहम्मद रखा , उस बच्चे का बाप और मां दोनों फौत हो चुके हैं, अब मैं और उसका चचा अबु तालिब उसकी देखभाल करते हैं।


अब सैफ ने उनसे कहा -मैंने तुम्हें जो कुछ बताया है वह वाकि़या इस तरह है,  अपने पोते की हिफाज़त करो इसे यहूदियों से बचाये रखो इसलिए कि वह उसके दुश्मन है ,यह और बात है कि अल्लाह ताला हरगिज़ उन लोगों को उन पर काबू नहीं पाने देगा और मैंने जो कुछ आपको बताया है इसका अपने कबीले वालों से ज़िक्र ना करना ,मुझे डर है कि इन बातों की वजह से उन लोगों में हसद और जलन ना पैदा हो जाए , यह लोग सोच सकते हैं यह इज्जत और बुलंदी आखिर उन्हें  क्यों मिलने वाली है यह लोग उनके रास्ते में रुकावटें खड़ी करेंगे , अगर यह लोग उस वक्त तक जिंदा ना रहे तो उनकी औलाद यह काम करेगी अगर मुझे मालूम ना होता कि उस नबी के ज़हूर से पहले ही मौत मुझे आ लेगी तो मैं अपने ऊंटों और काफ़िले के साथ रवाना होता और उनकी सल्तनत के मरकज़ यसरिब पहुंचता , क्योंकि मैं उस किताब में यह बात पाता हूं कि शहर यसरिब उनकी सल्तनत का मरकज होगा उनकी ताकत का सरचश्मा होगा उनकी मदद और नुसरत का ठिकाना होगा और उन की वफात की जगह होगी और उन्हें दफन भी यही किया जाएगा और हमारी किताब पिछले उलूम से भरी पड़ी है।


"_ मुझे पता है अगर मैं इस वक्त उनकी अज़मत का ऐलान करूं  तो खुद उनके लिए और मेरे खतरात  पैदा हो जाएंगे , यह डर ना होता तो मैं उनके बारे में तमाम बातें सबको बता देता, अरबों के  सामने उनकी सर बुलंदी और ऊंचे रुतबे की दास्तानें सुना देता, लेकिन मैंने यह राज़ तुम्हें बताया है ... तुम्हारे साथियों में से भी किसी को नहीं बताया ।


★_ इसके बाद उसने अब्दुल मुत्तलिब के साथियों को बुलाया उनमें से हर एक को 10 हबशी गुलाम दश हबशी बांदियां और धारीदार यमनी चादरें बड़ी मिक़दार में सोना चांदी सौ सौ ऊंट और अंबर के भरे डिब्बे दिये ,  फिर अब्दुल मुत्तलिब को उससे दस गुना ज्यादा दिया और बोला- साल गुजरने पर मेरे पास उनकी खबर लेकर आना और उनके हालात बताना।

साल गुजरने से पहले ही बादशाह का इंतकाल हो गया।


★_ अब्दुल मुत्तलिब अक्सर उस बादशाह का जिक्र किया करते थे,  आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की उम्र है 8 साल की हुई तो अब्दुल मुत्तलिब का इंतकाल हो गया । इस तरह एक अज़ीम सरपरस्त का साथ छूट गया ।उस वक्त अब्दुल मुत्तलिब की उमर 95 साल थी , तारीख की बाज़ किताबों में उनकी उम्र इस से भी ज्यादा लिखी है ।


★_ जिस वक्त अब्दुल मुत्तलिब का इंतकाल हुआ आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम उनकी चारपाई के पास मौजूद थे। आप रोने लगे । अब्दुल मुत्तलिब को अजवन के मुकाम पर उनके दादा कु़शई के पास दफन किया गया ।मरने से पहले उन्होंने नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को अपने बेटे अबू तालिब के हवाले किया , अबू तालिब आपके निगरां हुए। उन्हें भी आपसे बेतहाशा मोहब्बत हो गई उनके साथ अब्बास और जुबेर भी आपका बहुत खयाल रखते थे फिर जुबेर भी इंतकाल कर गए तो आप की निगरानी आपके चाचा अबू तालिब ही करते रहे।


★_ उन्हें भी नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से बहुत मोहब्बत थी जब उन्होंने आपकी बरकात देखी, मोजजे़ देखें तो उनकी मोहब्बत में और इज़ाफ़ा हो गया। यह माली एतबार से कमजोर थे दो वक्त सारे घराने को पेट भर कर खाना नहीं मिलता था लेकिन जब नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम उनके साथ खाना खाते तो थोड़ा खाना भी उन सब के लिए काफी हो जाता सबके पेट भर जाते इसलिए जब दोपहर या रात के खाने का वक्त होता तो और सब दस्तरखान पर बैठते तो अबु तालिब उनसे कहते -अभी खाना शुरु ना करो मेरा बेटा आ जाए फिर शुरू करना।


★_ फिर आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम तशरीफ ले आते और उनके साथ बैठ जाते आपकी बरकात इस तरह ज़ाहिर होती कि सबके सैर होने के बाद भी खाना बच जाता, अगर दूध होता तो पहले नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पीने के लिए दिया जाता , फिर अबु तालिब के बेटे पीते , यहां तक कि एक ही प्याले से सब के सब दूध पी लेते, खूब सैर हो जाते और दूध फिर भी बच जाता । अबु तालिब के लिए एक तकिया रखा रहता था वह उससे टेक लगा कर बैठते थे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम तशरीफ लाते तो सीधे उस तकिए के साथ बैठ जाते यह देखकर अबु तालिब कहते- मेरे बेटे को अपने बुलंद मर्तबे का एहसास है।


★_ एक बार मक्का में क़हत पड़ गया बारिश बिल्कुल नहीं हुई, लोग एक दूसरे से कहते थे लात और उजया से बारिश की दुआ करो । कुछ कहते थे तीसरे बड़े बुत मनात पर भरोसा करो । इसी दौरान एक बूढ़े ने कहा- तुम हक़  और सच्चाई से भाग रहे हो , तुमने इब्राहिम अलैहिस्सलाम और इस्माइल अलैहिस्सलाम की निशानी मौजूद है तुम उसे छोड़कर गलत रास्ते पर क्यों जा रहे हो।

 इस पर उन्होंने कहा क्या आपकी मुराद अबू तालिब से है ।

उसने जवाब ने कहा -हां मैं यही कहना चाहता हूं ।

अब सब लोग अबू तालिब के घर की तरफ चले वहां पहुंच कर उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी तो एक खूबसूरत आदमी बाहर आया उसने तेहबंद लपेट रखा था सब लोग उसकी तरफ बड़े और बोले - ऐ अबू तालिब वादी में क़हत पड़ि है बच्चे भूखे मर रहे हैं इसलिए आओ और हमारे लिए बारिश की दुआ करो।


★_ चुनांचे अबू तालिब बाहर आए  उनके साथ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम भी थे आप ऐसे लग रहे थे जैसे अंधेरे में सूरज निकल आया है । अबु तालिब के साथ और भी बच्चे थे लेकिन उन्होंने आप ही का बाजू पकड़ा हुआ था। उसके बाद अबू तालिब ने आपकी उंगली पकड़कर काबे का तवाफ किया। यह तवाफ कर रहे थे और दूसरे लोग आसमान की तरफ नज़र उठा कर देख रहे थे जहां बादल का एक टुकड़ा भी नहीं था लेकिन फिर अचानक हर तरफ से बादल घिर घिर कर आने लगे , इस क़दर जोरदार बारिश हुई और जंगल सैराब हो गए।


★_ अबू तालिब एक बार जि़ल हिजाज़ के मेले में गए यह जगह  अराफात से तकरीबन 8 किलोमीटर दूर है उनके साथ रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम भी थे ,  ऐसे में अबू तालिब को प्यास मेहसूस हुई , उन्होंने आपसे कहा -भतीजे मुझे प्यास लगी है ।

यह बात उन्होंने इसलिए नहीं कही थी कि आपके पास पानी था.. बल्कि अपनी बेचैनी जा़हिर करने के लिए कही भी। चाचा की बात सुनकर आप फोरन सवारी से उतर आए और बोले चाचा जान आपको प्यास लगी है।

 उन्होंने कहा- हां भतीजे , प्यास लगी है ,‌

यह सुनते ही आपने एक पत्थर पर अपना पांव मारा ।


 *📕_ सीरतुन नबी ﷺ _ क़दम बा क़दम (मुसन्निफ- अब्दुल्लाह फारानी) ,*

 ╨─────────────────────❥

❥_ शाम का सफर _,*


★_: ज्योंही आपने पत्थर पर पांव मारा उसके नीचे से साफ और उम्दा पानी फूट निकला उन्होंने ऐसा पानी पहले कभी नहीं पिया था खूब सैर हो कर पिया , फिर उन्होंने पूछा -भतीजे क्या आप सैर हो चुके हैं ? नबी करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम ने फरमाया -हां।

आपने उस जगह अपनी एड़ी फिर मारी और वह जगह दोबारा ऐसी खुश्क़ हो गई जैसे पहले थी।


★_हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम चंद साल अपने दूसरे चाचा जुबेर बिन अब्दुल मुत्तलिब के साथ भी रहे थे इस ज़माने में एक मर्तबा हुजूर सल्लल्लाहु सल्लम अपने उन चचा के साथ एक काफिले में यमन तशरीफ ले गए , रास्ते में एक वादी से गुजर हुआ उस वादी में एक सरकस ऊंट रहता था  गुजरने वालों का रास्ता रोक लेता था ।  ज्योंही उसने नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को देखा तो फौरन बैठ गया जमीन से अपनी छाती रगड़ने लगा आप अपने ऊंट से उतरकर उस पर सवार हो गए। अब वो ऊंट आपको लेकर चला और वादी के पार तक ले गया इसके बाद आपने उसको छोड़ दिया


★__यह काफिला जब सफर से वापस लौटा तो एक ऐसी वादी से गुज़र हुआ जब तूफानी पानी से भरी हुई थी पानी मौजे मार रहा था । यह देखकर आप ने काफ़िले वालों से फरमाया -मेरे पीछे-पीछे आओ ।

फिर आप इतमिनान से वादी में दाखिल हो गए बाक़ी लोग भी आपके पीछे थे, अल्लाह ताला ने अपनी कु़दरत से पानी खुश्क कर दिया और आप पूरे काफिले को लिए पार हो गए ।

का़फिला मक्का पहुंचा तो लोगों ने यह हैरतनाक वाक्या़त बयान किए , लोग सुनकर बोले उठे :- उस लड़के की तो शान ही निराली है।


 ★_इब्ने हिशाम लिखते हैं बनु लहब का एक शख्स बहुत बड़ा क़ियाफा सनाश था , यानी  लोगों की शक्ल व सूरत देखकर उनके हालात और मुस्तकबिल के बारे में अंदाजा लगाया करता था। मक्का आता तो लोग अपने बच्चों को उसके पास लाते हैं उन्हें देख देख कर उनके बारे में बताता था। एक बार यह आया तो अबू तालिब आपको भी उसके पास ले गए और उस वक्त आप अभी नव उम्र लड़के ही थे । क़ियाफा सनाश ने आपको एक नज़र देखा फिर दूसरे बच्चों को देखने लगा। फारिग होने के बाद उसने कहा:-  इस लड़के को मेरे पास लाओ।


★_अबू तालिब ने यह बात महसूस कर ली थी कि क़ियाफा सनाश ने  उनके भतीजे को अजीब नज़रों से देखा है लिहाजा वह आपको लेकर वहां से निकल आए थे । जब कि़याफा सनाश को मालूम हुआ कि आप वहां मौजूद नहीं हैं तो वह चीखने लगा :-  तुम्हारा बुरा हो उस लड़के को मेरे पास लाओ जिसे मैंने अभी देखा है ,अल्लाह की कसम वह बड़ी शान वाला है।"

अबू तालिब ने निकलते हुए उसके यह अल्फाज़ सुन लिए थे


★_अबू तालिब ने तिजारत की गर्ज़ से शाम जाने का इरादा किया। नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने भी साथ जाने का शौक जाहिर फरमाया। बाज़ रिवायात में आया है कि आपने जाने के लिए खास तौर पर फरमाइश की । अबू तालिब ने आपका शौक देख कर कहा :-  अल्लाह की कसम मैं इसे साथ जरूर ले जाऊंगा, ना यह कभी मुझसे जुदा हो सकता है ना मैं इसे कभी अपने से जुदा कर सकता हूं।

एक रिवायत में यूं भी आया है, आपने अबु तालिब की ऊंटनी की लगाम पकड़ ली और फरमाया- चाचा जान आप मुझे किस के पास छोड़े जा रहे हैं मेरी ना मां है ना बाप ।


: ★_ उस वक्त आप की उमर मुबारक 9 साल थी, आखिर अबू तालिब आपको साथ लेकर रवाना हुए आपको अपनी ऊंटनी पर बिठाया । रास्ते में ईसाइयों की एक इबादत गाह के पास ठहरे , खानकाह  के राहिब ने नबी करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम को देखा तो चौंक उठा । उसने अबू तालिब से पूछा- यह लड़का तुम्हारा कौन है ?

उन्होंने जवाब दिया- यह मेरा बेटा है ।

यह सुनकर राहिब ने कहा -यह तुम्हारा बेटा नहीं हो सकता ,

यह सुनकर अबू तालिब बहुत हैरान हुए, बोले -क्या मतलब.. यह क्यों मेरा बेटा नहीं हो सकता भला ?

उसने कहा -यह मुमकिन ही नहीं कि इस लड़के का बाप जिंदा हो, यह नबी है।


★__ मतलब यह था कि उनमें जो निशानियां है वह दुनिया के आखरी नबी की हैं और उनकी एक अलामत यह है कि वह यतीम होंगे उनके बाप का इंतकाल उसी जमाने में हो जाएगा जबकि वह अभी पैदा होने वाले होंगे । इस लड़के में आने वाले नबी की तमाम अलामात मौजूद हैं , उनकी एक निशानी यह है कि बचपन में उनकी वाल्दा का भी इंतकाल हो जाएगा।


★__ अब अबू तालिब ने उस राहिब से पूछा- नबी क्या होता है ?

राहिब ने कहा - नबी वह होता है जिसके पास आसमान से खबरें आती हैं और फिर वह जमीन वालों को उनकी इत्तेला देता है... तुम यहूदियों से इस लड़के की हिफाज़त करना _,"


★_ इसके बाद अबु तालिब वहां से आगे रवाना हुए, रास्ते में एक राहिब के पास ठहरे, यह भी एक खानकाहा का आबिद था, उसकी नज़र भी नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम पर पड़ी तो यही पूछा - यह लड़का तुम्हारा क्या लगता है।

अबु तालिब ने उससे भी यही कहा -यह मेरा बेटा है।

राहिब यह सुनकर बोला - यह तुम्हारा बेटा नहीं हो सकता, इसका बाप जिंदा हो ही नहीं सकता ।

अबू तालिब ने पूछा - वह क्यों ?

राहिब ने जवाब में कहा- इसलिए कि इसका चेहरा नबी का चेहरा है इसकी आंखें एक नबी की आंखें हैं यानी नबी जैसी ,जो आखरी उम्मत के लिए भेजे जाने वाले हैं, उनकी अलामात पुरानी किताबों में मौजूद है ।


: ★__ इसके बाद यह काफिला रवाना होकर बसरा पहुंचा यहां बहिरा नाम का एक राहिब अपनी खानकाह में रहता था उसका असल नाम जरज़ीश था बहिरा उसका लक़ब था वह बहुत जबरदस्त आलिम था। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के ज़माने से उस खानकाह का राहिब, नस्ल दर नस्ल यह आलिम फाजिल खानदान ही चला आ रहा था। इस तरह उस ज़माने में उनका सबसे बड़ा आलिम बहीरा ही था।


★__ क़ुरेश के लोग अक्सर बहिरा के पास से गुज़रा करते थे मगर उसने कभी उनसे कोई बात नहीं की थी मगर इस बार उसने काफ़िले में आपको देख लिया तो पूरे काफ़िले के लिए खाना तैयार करवाया ।बहिरा ने यह मंजर भी देखा कि नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम पर एक बदली साया किए हुए थी, जब यह काफ़िला एक दरख्त के नीचे आकर ठहरा तो उसने बदली की तरफ देखा वह अब उस दरख्त पर साया डाल रही थी और उस  दरख्त की शाखें उस तरफ झुक गई थी जिधर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम मौजूद थे उसने देखा बहुत सी शाखों ने आपके ऊपर जमघटा सा कर लिया था। असल में हुआ यह था कि जब नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम उस दरख़्त के पास पहुंचे तो क़ाफिले के लोग पहले ही सायादार जगह पर कब्जा कर चुके थे अब आपके लिए कोई सायादार जगह  नहीं बची थी। चुनांचे आप जब धूप में बैठे तो शाखों ने अपना रुख तब्दील कर लिया और आपके ऊपर जमा हो गई । इस तरह आप मुकम्मल तौर पर साए में हो गए । बहीरा ने यह मंजर साफ देखा था । आपकी निशानी देखकर उसने काफ़िले वालों को पैगाम भिजवाया :-

"_ ए क़ुरेशियों मैंने आप लोगों के लिए खाना तैयार करवाया है मेरी ख्वाहिश है कि आप तमाम लोग खाना खाने आएं यानी बच्चे बूढ़े और गुलाम सब आएं।"

बहिरा का यह पैगाम सुनकर काफ़िले में से एक ने कहा:- 

ए बहीरा , आज तो आप नया काम कर रहे हैं हम तो अक्सर इस रास्ते से गुज़रते हैं आपने कभी दावत का इंतजाम नहीं किया फिर आज क्या बात है ?

बहीरा ने उन्हें सिर्फ इतना जवाब दिया:-  तुमने ठीक कहा , लेकिन बस आप लोग मेहमान हैं और मेहमान का इक़राम करना बहुत अच्छी बात है।


★_इस तरह तमाम लोग बहिरा के पास पहुंच गए लेकिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम उनके साथ नहीं थे उन्हें पड़ाव ही में छोड़ दिया गया था।

[

: ★_ आपको काफिले के साथ इसलिए नहीं ले जाया गया था कि आप कम उम्र थे आप वहीं दरख़्त के नीचे बैठ गए । उधर बहीरा ने लोगों को देखा और उनमें से किसी में उसे वह सिफ्त नज़र ना आई जो आखिरी नबी के बारे में उसे मालूम थी , ना उनमें से किसी पर वह बदली नजर आई बल्कि उसने अजी़ब बात देखी कि वह बदली वही पड़ाव की जगह पर ही रह गई थी, इसका साफ मतलब यह था बदली वहीं है जहां अल्लाह के रसूल है ।

तब उसने कहा-  ऐ क़ुरैश के लोगों ! मेरी दावत से आप में से कोई भी पीछे नहीं रहना चाहिए।

इस पर कुरैश ने कहा- ए बहिरा जिन लोगों को आपकी इस दावत में लाना ज़रूरी था उनमें से तो कोई रहा नहीं... हां एक लड़का रह गया है जो सबसे कम उम्र है।

बहीरा बोला- तब फिर मेहरबानी फरमा का उसे भी बुलाएं यह किस क़दर बुरी बात है कि आप सब आएं और आप में से एक रह जाए और मैंने उसे आप लोगों के साथ देखा था।


★_तब एक शख्स गया और आप को साथ लेकर बहिरा की तरफ रवाना हुआ। उस वक्त वह बदली आपके साथ साथ चली और तमाम रास्ते उसने आप पर साया किये रखा। बहीरा ने यह मंजर देखा ।वह अब आपको और ज़्यादा गौर से देख रहा था और आपके जिस्म  मुबारक में वह अलामात तलाश कर रहा था जो उनकी कुतुब में दर्ज थी।


★_जब लोग खाना खा चुके और इधर उधर हो गए तब बहीरा  आपके पास आया और बोला-  मैं लात और उज़या के नाम पर आपसे चंद बातें पूछना चाहता हूं जो मैं पूछूं आप मुझे बताएं ।

उसकी बात सुनकर आप ने फरमाया - लात और उज़या (बुतों के नाम) के नाम पर मुझसे कुछ ना पूछो अल्लाह की कसम मुझे सबसे ज़्यादा नफरत इन्हीं से है।

अब बहीरा बोला- अच्छा तो फिर अल्लाह के नाम पर बताएं जो मैं पूछना चाहता हूं ।

तो आपने फरमाया -पूछो क्या पूछना है ।

उसने बहुत से सवालात किये, आपकी आदात के बारे में पूछा, उसके बाद उसने आपकी कमर पर से कपड़ा हटाकर मोहरे नबूवत को देखा वह बिल्कुल वैसी ही थी जैसा कि उसने अपनी किताबों में पढ़ा था ।उसने फौरन मोहरे नबूवत की जगह को बोसा दिया। क़ुरैश के लोग यह सब देख रहे थे और हैरान हो रहे थे आखिर लोग कहे बगैर ना रह सके - यह राहिब  मोहम्मद (सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम) में बहुत दिलचस्पी ले रहा है ,शायद इसके नज़दीक  इनका मर्तबा बहुत बुलंद है।


★_इधर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बातचीत करने के बाद बहिरा अबू तालिब की तरफ आया और बोला :- यह लड़का तुम्हारा क्या लगता है ?

अबू तालिब ने कहा -यह मेरा बेटा है ।

इस पर बहीरा ने कहा- नहीं यह तुम्हारा बेटा नहीं हो सकता ,यह नहीं हो सकता कि इसका बाप जिंदा हो ।

अबू तालिब को यह सुनकर हैरत हुई फिर उन्होंने कहा- दरअसल यह मेरे भाई का बेटा है ।

इनका बाप कहां है ?

वह फौत हो चुका है ,उसका इंतकाल उस वक्त हो गया था जब यह अभी पैदा नहीं हुए थे। 

यह सुनकर बहीरा बोल उठा- हां यह बात सही है और इनकी वाल्दा का क्या हुआ ?

उनका अभी थोड़े अरसे ही पहले इंतकाल हुआ है।


★_ यह सुनते ही बहीरा ने कहा-  बिल्कुल ठीक कहा अब तुम यूं करो कि अपने भतीजे को वापस वतन ले जाओ। यहूदियों से इनकी पूरी तथा हिफाज़त करो अगर उन्होंने इन्हें देख लिया और इनमें वह  निशानियां देख ली जो मैंने देखी हैं तो वह इन्हें कत्ल करने की कोशिश करेंगे ।तुम्हारा यह भतीजा नबी है इसकी बहुत शान है ।इनकी शान के बारे में हम अपनी किताबों में भी लिखा हुआ पाते हैं और हमने अपने बाप दादाओं से भी बहुत कुछ सुन रखा है । मैंने यह नसीहत करके अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया है और इन्हें वापस ले जाना तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।


★_ अबू तालिब बहिरा की बात सुनकर खौफ ज़दा हो गए। आपको लेकर मक्का वापस आ गए । इस वाक्य के वक्त आपकी उमर 9 साल थी।


★__ इस उम्र के लड़के आमतौर पर खेलकूद में जरूर हिस्सा लेते हैं उन खेलों में खराब और गंदे खेल भी होते हैं अल्लाह ताला ने आपको इस सिलसिले में भी बिल्कुल महफूज़ रखा।


★__ जाहिलियत के ज़माने में अरब जिन बुराइयों में जकड़े हुए थे ,उन बुराइयों से भी अल्लाह ताला ने आपकी हिफाज़त फरमाई। एक वाक़या आपने खुद बयान फ़रमाया :- 

"_एक कुरैशी लड़का मक्का के बालाई हिस्से में अपनी बकरियां लिए मेरे साथ था मैंने उससे कहा तुम ज़रा मेरी बकरियों का ध्यान रखो ताकि मैं कि़स्सागोई की मजलिस में शरीक हो सकूं वहां सब लड़के जाते हैं ।

उस लड़के ने कहा- अच्छा ।

इसके बाद मैं रवाना हुआ मैं मक्का के एक मकान में दाखिल हुआ तो मुझे गाने और बाजे की आवाज सुनाई दी मैंने लोगों से पूछा कि क्या हो रहा है ? मुझे बताया गया एक कुरैशी की फलाह शख्स  की बेटी से शादी हो रही है । मैंने उस तरफ तवज्जो दी ही थी कि मेरी आंखें  नींद से झुकने लगी यहां तक कि मैं सो गया फिर मेरी आंख उस वक्त खुली जब धूप मुझ पर पड़ी ।


★__ आप वापस उस लड़के के पास पहुंचे तो उसने पूछा -तुमने वहां जाकर क्या किया ? मैंने उसे वाक्या सुना दिया। दूसरी रात फिर ऐसा ही हुआ। मतलब यह कि कुरेश की लगु मजलिसों से अल्लाह ताला ने आप को महफूज़ रखा ।


★__ कु़रेश के एक बुत का नाम हवाना था, कुरेश हर साल उसके पास हाजिरी दिया करते थे उसकी बेहद इज्जत करते थे उसके पास कुर्बानी का जानवर ज़िबह करते, सर मुंडवाते ,सारा दिन उसके पास ऐतकाफ करते , अबू तालिब भी अपनी कौम के साथ उस बुत के पास हाज़री देते इस मौके को कुरेश ईद की तरह मनाते थे ।

अबू तालिब में नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से कहा -भतीजे आप भी हमारे साथ ईद में शरीक हों। 

आपने इनकार फरमा दिया ।अबू तालिब हर साल आपको शरीक होने के लिए कहते रहे लेकिन आप हर बार इनकार करते रहे। आखिर एक बार अबू तालिब को गुस्सा आ गया आपकी फूफियों को भी आप पर बेतहाशा गुस्सा आया वह आपसे बोली- तुम हमारे माबूदों से इस तरह बचते हो और परहेज़ करते हो हमें डर है कि तुम्हें कोई नुकसान ना पहुंचे। 

उन्होंने यह भी कहा- मोहम्मद ! आखिर तुम ईद में क्यों शरीक नहीं होते ?

उनकी बातों से तंग आकर आप उनके पास से उठकर कहीं दूर चले गए । इस बारे में आप फरमाते हैं - मैं जब भी हवाना या किसी और बुत के नज़दीक हुआ, मेरे सामने एक सफेद रंग का बहुत कद्दावर आदमी जाहिर हुआ उसने हर बार मुझसे यह कहा- मोहम्मद ! पीछे हटो उसको छूना नहीं ।

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*┱✿_ फुजार की लड़ाई -_,*


★__खाना काबा में तांबे के दो बुत थे उनके नाम असाफ और नाऐला थे ।तवाफ करते वक्त मुशरिक बरकत हासिल करने के लिए उन को छुआ करते थे ।

हजरत ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं -एक मर्तबा आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम बैतुल्लाह का तवाफ कर रहे थे मैं भी आपके साथ था जब मैं तवाफ के दौरान उन बुतों के पास से गुजरा तो मैंने भी उनको छुआ । नबी पाक सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने फौरन फरमाया- उनको हाथ मत लगाओ।


★_ इसके बाद हम तवाफ करते रहे मैंने सोचा एक बार फिर बुतों को छूने की कोशिश करूंगा ताकि पता तो चले उनको छूने से क्या होता है और आपने किस लिए मुझे रोका है । चुनांचे मैंने उनको फिर छू लिया। तब आप ने सख्त लहजे में फरमाया -क्या मैंने तुम्हें उनको छूने से मना नहीं किया था।

और मैं क़सम खाकर कहता हूं, नबी पाक सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने कभी भी किसी बुत को नहीं छुआ यहां तक कि अल्लाह ने आपको नबूवत अता फरमा दी और आप पर वही नाज़िल होने लगी।


★__ इसी तरह अल्लाह ताला हराम चीजों से भी आप की हिफाज़त फरमाते थे, मुशरिक बुतों के नाम पर जानवर कुर्बान करते थे फिर यह गोस्त तक़सीम कर दिया जाता था या पकाकर खिला दिया जाता था लेकिन आपने कभी भी ऐसा गोश्त ना खाया । खुद आपने एक बार इरशाद फरमाया - मैंने कभी कोई ऐसी चीज नहीं चखी जो बुतों के नाम पर जिबह की गई हो यहां तक कि अल्लाह ताला ने मुझे नबूवत अता कर दी _,"


★__ इसी तरह आप से पूछा गया- क्या आपने बचपन में कभी बुत परस्ती की ?

आपने इरशाद फरमाया- नहीं ।

आपसे फिर पूछा गया -क्या आपने कभी शराब पी ?

जवाब में इरशाद फरमाया -नहीं।

 हालांकि उस वक्त मुझे मालूम नहीं था कि किताबुल्लाह क्या है और ईमान (की तफसील )क्या है। 

आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के अलावा भी उस ज़माने में कुछ लोग जानवरों के नाम ज़िबह किया गया गोस्त नहीं खाते थे और शराब को हाथ नहीं लगाते थे ।



★__ बचपन में आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने बकरियां भी चराई , आप मक्का के लोगों की बकरियां चराया करते थे। मुआवज़े के तौर पर आपको एक सिक्का दिया जाता था। आप फरमाते हैं - अल्लाह ताला ने जितने नबी भेजें उन सब ने बकरियां चराने का काम किया मैं मक्का वालों की बकरियां सिक्के के बदले चराया करता था ।

मक्का वालों की बकरियों के साथ आप अपने घर वालों और रिश्तेदारों की बकरियां भी चराया करते थे।

पैगंबरों ने बकरियां क्यों चराई, इसकी वजह यूं बयान की जाती है :- 


★__ इस काम में अल्लाह ताला की ज़बरदस्त हिकमत है ।बकरी कमजोर जानवर है , लिहाजा जो शख्स बकरियां चराता है उसमें  कुदरती तौर पर नरमी, मोहब्बत और इंकसारी का जज़्बा पैदा हो जाता है। हर काम और पेशे की कुछ खुसूसियात होती हैं, मसलन क़साब के दिल में सख्ती होती है लोहार ज़फाकस होता है माली नाज़ुक तबीयत होता है । 


"_अब जो शख्स बकरियां चराता रहा जब वह मखलूक की तरबियत का काम शुरू करेगा उसकी तबीयत में से गर्मी और सख्ती निकल चुकी होती है । मखलूक की तरबियत के लिए वह बहुत नरम मिजाज हो चुका होता है और तबलीग के काम में नर्म मिज़ाजी की बहुत ज़रूरत होती है।


★__ अरबों में एक शख्स बदर बिन मा'शर गिफारी था यह उकाज़ के मेले में बैठा करता था लोगों के सामने अपनी बहादुरी के किस्से सुनाया करता था अपनी बड़ाई बयान करता था एक दिन उसने पैर फैलाकर और गर्दन अकड़ा कर कहा :- मैं अरबों में से सबसे ज्यादा इज्जत दार हूं और अगर कोई ख्याल करता है कि वह ज्यादा इज्जत वाला है तो तलवार के ज़ोर पर यह बात साबित कर दिखाएं ।


★_उसके यह बड़े बोल सुनकर एक शख्स को गुस्सा आ गया वह अचानक उस पर झपटा और उसके घुटने पर तलवार दे मारी उसका इतना कट गया यह भी कहा जाता है यह घुटना सिर्फ जख्मी हुआ था इस पर दोनों के क़बीले आपस में लड़ पड़े उनमें जंग शुरू हो गई। इस लड़ाई को फुजार की पहली लड़ाई कहा जाता है । उस वक्त आपकी उम्र 10 साल थी ।


★__ फुजार की एक और लड़ाई बनु आमिर की एक औरत की वजह से हुई । इसमें बनु आमिर बनु कनाना से लड़े क्योंकि कनाना के एक नौजवान ने उस कबीले की किसी औरत को छेड़ा था। फुजार की तीसरी लड़ाई भी बनु आमिर और बनु कनाना के दरमियान हुई थी यह लड़ाई क़र्ज़ की अदायगी के सिलसिले में हुई ।


★_फुजार की इन तीनों लड़ाइयों में नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने कोई हिस्सा नहीं लिया अलबत्ता फुजार की चौथी लड़ाई में आप ने शिरकत फरमाई थी ।

अरबों के यहां 4 महीने ऐसे थे कि उसमें किसी का खून बहाना जायज़ नहीं था ,यह महीने ज़िलक़ा'दा, ज़िलहज, मोहर्रम और रज्जब थे। यह लड़ाई चूंकि हुरमत के इन महीनों में हुई इसलिए इनका नाम फुजार की लड़ाइयां रखा गया , फुजार के मा'ने है गुनाह, यानी यह लड़ाइयां उनका गुनाह था ।


★__ चौथी लड़ाई जिसमें नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने भी हिस्सा लिया उसका नाम फुजार बराज़ है यह लड़ाई इस तरह शुरू हुई :- क़बीला कनाना के बराज़ नामी एक शख्स ने एक आदमी उरवाह को क़त्ल कर दिया । उरवाह का ताल्लुक कबीला हवाजिन से था यह वाक़या हुरमत वाले महीने में पेश आया । बराज़ और उरवाह के खानदान के लोग यानी बनु कनाना और बनु हवाजिन उस वक्त उकाज़ के मेले में थे। वहीं किसी ने बनु कनाना को यह खबर पहुंचादी कि बराज़ ने उरवाह  को क़त्ल कर दिया है यह खबर सुनकर बनु कनाना के लोग परेशान हुए कि कहीं मेले ही में हवाजिन के लोग उन पर हमला ना कर दे इस तरह बात बहुत बढ़ जाएगी।चुनांचे वह लोग मक्का की तरफ भाग निकले । हवाजिन को उस वक्त तक खबर नहीं हुई थी उन्हें कुछ दिन या कुछ वक्त गुजरने पर खबर हुई , यह बनु कनाना पर चढ़ दौड़े लेकिन बनु कनाना हरम में पनाह ले चुके थे।


★_ अरबों में हरम के अंदर खून बहाना हराम था इसलिए हवाजिन रुक गए उस दिन लड़ाई ना हो सकी लेकिन दूसरे दिन कनाना के लोग खुद ही मुकाबले के लिए बाहर निकल आए उनकी मदद करने के लिए कबीला कुरैश भी मैदान में निकल आया । इस तरह फुजार की यह जंग शुरू हुई। यह जंग 4 या 6 दिन तक जारी रही। अब चूंकि क़ुरेश भी इसमें शरीक़ थे लिहाजा आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के चचा आपको भी साथ ले गए मगर आपने जंग के सब दिनों में लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया अलबत्ता जिस दिन आप मैदाने जंग में पहुंच जाते तो बनु कनाना को फतेह होने लगती और जब आप वहां ना पहुंचते तो उन्हें शिकस्त होने लगती। आपने इस जंग में सिर्फ इतना हिस्सा लिया कि अपने चाचा उनको तीर पकड़ाते रहे और बस...,।


★__ 6 दिन की जंग के बाद भी कोई फैसला ना हो सका आखिर दोनों गिरोहों में सुलह हो गई लेकिन काफी खून खराबे के बाद हुई थी 


★_इसके फौरन बाद हल्फे फज़ूल का वाक़या पेश आया यह वाक़या इस तरह हुआ कि क़बीला ज़ैद का एक शख्स अपना कुछ माल लेकर मक्का आया । उससे यह माल आस बिन वाइल ने खरीद लिया यह आस बिन वाइल मक्का के बड़े लोगों में से था उसकी बहुत इज्जत थी । उसने माल तो ले लिया लेकिन कीमत अदा नहीं की । ज़ैदी उससे अपनी  रक़म का मुतालबा करता रहा लेकिन आस बिन वाइल ने रकम अदा ना की । अब यह ज़ैदी शख्स अपनी फरियाद लेकर मुख्तलिफ कबीलों के पास गया उन सब को बताया कि उस पर जुल्म किया है लिहाजा उसकी रकम दिलवाई जाए । अब चूंकि आस बिन वाइल मक्का के बड़े लोगों में से था इसलिए उन सब लोगों ने आप के खिलाफ उसकी मदद करने से इंकार कर दिया उल्टा उसे डांट डपट कर वापस भेज दिया । जब ज़ैदी ने उन लोगों की हालत देखी तो दूसरे दिन सुबह सवेरे वह अबु क़ैस नामी पहाड़ी पर चढ़ गया । क़ुरेश अभी अपने घरों ही हीं थे ऊपर चढ़कर उसने बुलंद आवाज से चंद शेर पढ़ें जिनका खुलासा यह है :- 

ऐ फहर की औलाद ! एक मज़लूम की मदद करो जो अपने वतन से दूर है इसकी तमाम पूंजी इस वक्त मक्का के अंदर ही है।


★_उस ज़ैदी शख्स की यह फरियाद आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के चाचा जुबेर बिन अब्दुल मुत्तलिब ने सुनी  उन पर बहुत असर हुआ उन्होंने अब्दुल्लाह बिन जद'आन को साथ लिया और उस आदमी की मदद के लिए उठ खड़े हुए । फिर उनके साथ बनु हाशिम , बनु ज़ोहरा और बनु असद के लोग भी शामिल हो गए यह सब अब्दुल्लाह बिन जद'आन के घर जमा हुए यहां इन सब को खाना खिलाया गया उसके बाद उन सब से खुदा के नाम पर हल्फ लिया गया ,हल्फ के अल्फाज यह थे :- 

"_ हम हमेशा मज़लूम का साथ देते रहेंगे और उसका हक़ उसे दिलाते रहेंगे ।"

इस हल्फ का नाम हल्फुल फज़ूल रखा गया। इस अहद और हल्फ के मौक़े पर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम क़ुरेश के साथ मौजूद थे ।

 *📕_ सीरतुन नबी ﷺ _ क़दम बा क़दम (मुसन्निफ- अब्दुल्लाह फारानी) ,*

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१_ नस्तवार की मुलाकात 


★__हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने उस अहद यानी हल्फुल फज़ूल को बहुत पसंद फरमाया ।आप फरमाते थे :-  मैं उस अहदनामे में शरीक था यह अहदनामा बनु जद'आन के मकान में हुआ था अगर कोई मुझसे कहे कि इस अहदनामे से दस्त बरदार हो जाएं और इसके बदले में 100 ऊंट लें  तो मैं नहीं लूंगा , इस अहदनामे के नाम पर अगर कोई आज भी मुझे आवाज दे तो मैं कहूंगा- मैं हाजिर हूं ।


★__ आपके इस इरशाद का मतलब यह था कि अगर आज भी कोई मज़लूम यह कहकर आवाज़ दे - ऐ हल्फुल फज़ूल वालों । तो मैं उसकी फरियाद को जरूर पहुंचुंगा क्योंकि इस्लाम तो आया ही इसलिए है कि सच्चाई का नाम बुलंद करें और मज़लूम की मदद और हिमायत करें।  

यह हल्फुल फज़ूल बाद में भी जारी रहा।


★__ मक्का में आपकी अमानत और दयानत की वजह से आपको अमीन कहकर पुकारा जाने लगा था आपका यह लक़ब बहुत मशहूर हो गया था लोग आपको अमीन के अलावा और किसी नाम से नहीं पुकारते थे ।


★_उन्हीं दिनों अबू तालिब ने आपसे कहा - ए भतीजे ! मैं एक बहुत गरीब आदमी हूं और क़हत साली की वजह से और ज्यादा सख्त हालात का सामना है काफी अरसे से खुश्क साली का दौर चल रहा है कोई ऐसा ज़रिया नहीं कि अपना काम चला सके और ना हमारी कोई तिजारत है । एक तिजारती काफ़िला शाम जाने वाला है उसमें कुरेश के लोग शामिल हैं क़ुरेश की एक खातून खदीज़ा बिन्त खुवेल्द शाम की तरफ अपना तिजारती सामान भेजा करती है जो शख्स उनका माल लेकर जाता है वह अपनी उजरत उनसे तय कर लेता है । अब अगर तुम उनके पास जाओ और उनका माल ले जाने की पेशकश करो तो वह ज़रूर अपना माल तुम्हें दे देंगी क्योंकि तुम्हारी अमानत दारी की शोहरत उन तक पहुंच चुकी है अगरचे में इस बात को पसंद नहीं करता कि तुम शाम के सफर पर जाओ यहूदी तुम्हारे दुश्मन है लेकिन हालात की वजह से मैं मजबूर हूं ।इसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं।


 ★_ यहां तक कह कर अबू तालिब खामोश हो गए तब आपने फरमाया- मुमकिन है वह खातून खुद मेरे पास किसी को भेजें ।

यह बात आपने इसलिए कहीं थी कि सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा को एक बा एतमाद आदमी की जरूरत थी और उस वक्त मक्का में आपसे ज्यादा शरीफ, पाकबाज़ ,अमानत दार ,समझदार और क़ाबिले एतमाद आदमी कोई नहीं था


★_ अबू तालिब उस वक्त बहुत परेशान थे आपकी यह बात सुनकर उन्होंने कहा -अगर तुम ना गए तो मुझे डर है वह किसी और से मामला तय कर लेंगी।

 यह कहकर अबू तालिब उठ गए।


★__ इधर आपको यकीन सा था कि सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा खुद उनकी तरफ किसी को भेजेंगी और हुआ भी यही सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को बुलवा भेजा फिर आपसे कहा :- 

"_मैंने आप की सच्चाई ,अमानत दारी और नेक अखलाक के बारे में सुना है और इसी वजह से मैंने आपको बुलाया है जो मुआवजा आपकी कौम के दूसरे आदमियों को देती हूं आपको उनसे दोगुना दूंगी।


★_ आपने  उनकी बात मंजूर फरमा ली , फिर आप अपने चचा अबु तालिब से मिले उन्हें यह बात बताई , अबू तालिब सुन कर बोले :-  यह रोज़ी तुम्हारे लिए अल्लाह ने पैदा फरमाई है ।"

इसके बाद आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा का सामाने तिजारत लेकर शाम की तरफ रवाना हुए । सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के गुलाम मैयसराह आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के साथ थे ।

रवानगी के वक्त हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने मैयसराह से कहा:-  किसी मामले में इनकी नाफरमानी ना करना जो यह कहें वही करना, इनकी राय से इख्तिलाफ ना करना ।


★__ आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम के चचाओं ने काफिले वालों से आप की खबर गिरी रखने की दरखास्त की इसकी वजह यह भी थी की ज़िम्मेदारी के लिहाज़ से यह आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम का पहला तिजारती सफर था । गोया आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम इससे काम में बिल्कुल नए थे।


★__ इधर आप रवाना हुए उधर आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम का मोजजा़ शुरू हो गया ।एक बदली ने आपके ऊपर साया कर लिया । आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के साथ साथ चलने लगी ।जब आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम शाम पहुंचे तो बसरा शहर के बाजार में एक दरख्त के साए में उतरे । यह दरख्त एक ईसाई राहिब नस्तवार की खानकाह के सामने था। इस राहिब ने मैसराह को देखा तो खानकाह से निकल आया , उस वक्त उसने आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम को देखा ,आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम दरख़्त के नीचे ठहरे हुए थे। 

उसने मैसराह से पूछा - यह शख्स कौन है? जो उस दरख्त के नीचे मौजूद है ।

मैंसराह ने कहा - यह एक कुरेशी शख्स है हरम वालों में से है ।

यह सुनकर राहिब ने कहा -उस दरख़्त के नीचे नबी के सिवा कभी कोई आदमी नहीं बैठा।


★__ मतलब यह था कि उस दरख़्त के नीचे आज तक कोई शख्स नहीं बैठा । अल्लाह ताला ने उस दरख्त को हमेशा इससे बचाया है कि उसके नीचे नबी के सिवा कोई दूसरा शख्स बैठे ।

इसके बाद उसने मैसराह से पूछा-  क्या उनकी आंखों में सुर्खी है ?

मैसराह ने जवाब दिया - हां बिल्कुल है और यह सुर्खी उनकी आंखों में मुस्तकिल रहती है ।

अब नस्तवार ने कहा- यह वही हैं_,"

मैसराह ने हैरान होकर उसकी तरफ देखा और बोले -  क्या मतलब ...यह वही है ...कौन वही? 

यह आखिरी पैगंबर हैं। काश मैं वह जमाना पा सकता जब उन्हें ज़हूर का हुक्म मिलेगा यानी जब उन्हें नबुवत मिलेगी ।


 ★__ इसके बाद वह चुपके से आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के पास पहुंचा पहले तो उसने आप सल्लल्लाहच अलेही वसल्लम के सर को बोसा दिया फिर आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के क़दमों का बोसा दिया और बोला :- मैं आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम पर ईमान लाता हूं और गवाही देता हूं कि आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम वही हैं जिनका जिक्र अल्लाह ताला ने तौरात में फरमाया है।


★_ इसके बाद नस्तवार ने कहा :-  ऐ मोहम्मद सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ! मैंने आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम में वह तमाम निशानियां देख ली है जो पुरानी किताबों में आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की नबुवत की अलामातों के तौर पर दर्ज हैं सिर्फ एक निशानी बाक़ी है इसलिए आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ज़रा अपने कंधे से कपड़ा हटाऐं _,"

आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने अपने शाना मुबारक से कपड़ा हटा दिया तब नस्तवार ने वहां मोहरे नबुवत को जगमगाते देखा वह फौरन मोहरे नबुवत को चूमने के लिए झुक गया । 

फिर बोला :- मैं गवाही देता हूं अल्लाह ताला के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं और मैं गवाही देता हूं कि आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम अल्लाह ताला के पैगंबर है, आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के बारे में हज़रत ईसा इब्ने मरियम अलैहिस्सलाम ने खुशखबरी दी थी और उन्होंने कहा था- मेरे बाद इस दरख़्त के नीचे कोई नहीं बैठेगा सिवाय उस पैगंबर के जो उम्मी (यानी अनपढ़)  हाशमी अरबी और मक्की (यानी मक्का के रहने वाले) होंगे , क़यामत में हौजे कौसर और शफा'अत वाले होंगे ।


★_ इस वाक्य के बाद आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम बसरा के बाजार तशरीफ ले गए वहां आप सल्लल्लाहु अलेही  वसल्लम ने माल फरोख्त किया जो साथ लाए थे और कुछ चीजें खरीदी । इस खरीद फरोख्त के दौरान एक शख्स ने आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से कुछ झगड़ा किया और बोला लात और उज़या की क़सम खाओ।

आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम ने फरमाया- मैंने इन बुतों के नाम पर कभी क़सम नहीं खाई ।

आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम का यह जुमला सुनकर वह शख्स चौक उठा ।

*

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★: हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा से निकाह,


 ★_  शायद वह गुजिश्ता आसमानी किताब का कोई आलिम था और उसने आपको पहचान लिया था चुनांचे बोला :-  आप ठीक कहते हैं ।

इसके बाद उसने मैसराह से अलहदगी में मुलाकात की। कहने लगा :- मैसराह यह नबी हैं, कसम है उस जा़त की जिसके हाथ में मेरी जान है यह वही हैं जिनका जिक्र हमारे राहिब अपनी किताबों में पाते हैं _,"


★__ मैसराह ने उसकी इस बात को जहन नशीन कर लिया। रास्ते में एक और वाकि़या पेश आया। सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के दो ऊंट बहुत ज्यादा थक गए थे और चलने के काबिल ना रहे उनकी वजह से मैसराह काफ़िले के पीछे रह गया। नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम काफ़िले के अगले हिस्से में थे ।मैसराह ऊंटों की वजह से परेशान हुआ तो दौड़ता हुआ अगले हिस्से की तरफ आया और अपनी परेशानी के बारे में आपको बताया। आप उसके साथ उन दोनों ऊंटों के पास तशरीफ लाए उनकी कमर और पिछले हिस्से पर हाथ फेरा कुछ पढ़कर दम किया आपका ऐसा करना था कि वह उसी वक्त ठीक हो गए और इस क़दर तेज़ चले कि काफ़िले के अगले हिस्से में पहुंच गए अब वह मुंह से आवाजें निकाल रहे थे और चलने में जोश व खरोश का इज़हार कर रहे थे।


★__ फिर क़ाफिले वालों ने अपना सामान फरोख्त किया इस बार उन्हें इतना नफा हुआ कि पहले कभी नहीं हुआ था। चुनांचे मैसराह ने आपसे कहा:-  ए मुहम्मद ! हम साल हा साल से सैयदा खदीजा के लिए तिजारत कर रहे हैं मगर इतना जबरदस्त नफा हमें कभी नहीं हुआ जितना इस बार हुआ है ।


★__ आखिर काफ़िला वापस मक्का की तरफ रवाना हुआ। मैसराह ने इस दौरान साफ तौर पर यह बात देखी जब गर्मी का वक्त होता था नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम अपने ऊंट पर होते थे तो दो फरिश्ते धूप से बचाने के लिए आप पर साया किए रहते थे। इन तमाम बातों की वजह से मैसराह के दिल में आपकी मोहब्बत घर कर गई थी और यूं लगने लगा जैसे वह आपका गुलाम हो।


 ★__ आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम दोपहर के वक्त मक्का में दाखिल हुए आप बाकी काफिले से पहले पहुंच गए थे। आप सीधे हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के घर पहुंचे। वह इस वक्त चंद औरतों के साथ बैठी थी उन्होंने दूर से आपको देख लिया । आप ऊंट पर सवार थे और दो फरिश्ते आप पर साया किए हुए थे। हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने यह मंजर दूसरी औरतों को भी दिखाया । वह सब बहुत हैरान हुई।


★__ आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम ने हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा को तिजारत के हालात सुनाएं मुनाफे के बारे में बताया, इस मर्तबा पहले की निसबत दोगुना मुनाफा हुआ था। हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा बहुत खुश हुई, उन्होंने पूछा मैसराह कहां है ?

आपने बताया वह अभी पीछे हैं।

यह सुनकर सैयदा ने कहा- आप फौरन उसके पास जाइए और उसे जल्द से जल्द मेरे पास लाऐं।


★__ आप वापस रवाना हो गए हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने दरअसल आपको इसलिए भेजा था कि वह फिर से वही मंजर देखना चाहती थी, जानना चाहती थी क्या अब भी फरिश्ते उन पर साया करते हैं या नहीं। जूंही आप रवाना हुए यह अपने मकान के ऊपर चढ़ गई और वहां आपको देखने लगी आप की शान अब भी वही नजर आई , अब उन्हें यक़ीन हो गया कि उनकी आंखों ने धोखा नहीं खाया था। कुछ देर बाद आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम मैसराह के साथ उनके पास पहुंच गए । हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने मैसराह से कहा-  मैंने उन पर दो फरिस्तों को साया करते हुए देखा है क्या तुमने भी कोई ऐसा मंजर देखा है।

जवाब में मैसराह ने कहा -मैं तो यह मंजर उस वक्त से देख रहा हूं जब काफिला यहां से शाम जाने के लिए रवाना हुआ था।


★_ इसके बाद मैसराह ने नस्तवार से मुलाकात का हाल सुनाया, दूसरे आदमी ने जो कहा था वह भी बताया- जिसने लात और उज्जा़ की कसम खाने के लिए कहा था । फिर ऊंटों वाला वाक़या बताया। ये तमाम बातें सुनने के बाद सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने आपको तयशुदा उजरत से दोगुना दी जबकि तयशुदा उजरत पहले ही दूसरे लोगों की निस्बत 2 गुना थी।

इन तमाम बातों से सैयद खदीजा रजियल्लाहु अन्हा बहुत हैरान हुई। अब वह अपने चचाजाद भाई वरक़ा बिन नोफिल से मिली , यह पिछली किताबों के आलिम थे। सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने जो कुछ देखा और मैसराह की ज़ुबानी सुना था वह सब कह सूनाया । वरका बिन नोफिल ईसाई मजहब से ताल्लुक रखते थे इससे पहले यहूदी थे। सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा की तमाम बातें सुनकर वरक़ा बिन नोफिल ने कहा :-  खदीजा ! अगर यह बात सच है तो समझ लो मोहम्मद इस उम्मत के नबी है । मैं यह बात जान चुका हूं कि वह इस उम्मत के होने वाले नबी हैं, दुनिया को इन्हीं का इंतजार था यही इनका जमाना है।


 ★_ यहां यह बात भी वाज़े हो जाए कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के लिए तिजारती  सफर सिर्फ एक बार ही नहीं किया चंद सफर और भी किए। सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा एक शरीफ और पाक़बाज़ खातून थी , नसब के एतबार से भी क़ुरेश में सबसे आला थी उन्हें कुरेश की सैयदा कहा जाता था। क़ौम के बहुत से लोग उनसे निकाह के ख्वाहिशमंद थे, कई नौजवानों के पैगाम उन तक पहुंच चुके थे लेकिन उन्होंने किसी के पैगाम को कुबूल नहीं किया था।


★_ नबी अकरम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम तिजारत के सफ़र से वापस आए तो आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की खुशुसियात देखकर और आपकी बातें सुनकर वह आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम से बहुत ज्यादा मुतास्सिर हो चुकी थी लिहाज़ा उन्होने एक खातून नफीसा बिन्ते मुनीहा को आपकी खिदमत में भेजा उन्होंने आकर आपसे कहा कि अगर कोई दौलतमंद और पाक़बाज़ खातून खुद आपको निकाह की पेशकश करें तो क्या आप मान लेंगे ?

उनकी यह बात सुनकर आप ने फरमाया :-  वह कौन हैं ?

नफीसा ने फौरन कहां - खदीजा बिन्त खुवेल्द ।

आपने उन्हें इजाजत दे दी,  नफीसा बिन्ते मुनिहा सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा  के पास आई, उन्हें सारी बात बताई। सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने  अपने चाचा अमर् बिन असद को इत्तेला कराई ताकि वह आकर निकाह कर दें।


★__ सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा की इससे पहले दो मर्तबा शादी हो चुकी थी उनका पहला निकाह अतीक़ इब्ने  माइद से हुआ था उससे बेटी हिंदा पैदा हुई थी । अतीक़ के फौत हो जाने के बाद सैयदा का दूसरा निकाह अबु हाला नामी शख्स से हुआ । अबु हाला की वफात के बाद सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा बेवगी  की जिंदगी गुजार रही थी कि उन्होंने आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम से निकाह का इरादा कर लिया। उस वक्त सैयदा की उम्र 40 साल के लगभग थी।


★__ सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के चाचा अमरु बिन असद वहां पहुंच गए। इधर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम भी अपने चाचाओं को लेकर पहुंच गए । निकाह किसने पढ़ाया इस बारे में रिवायात मुख्तलिफ है, एक रिवायत यह है कि यह निकाह चचा अबू तालिब ने पढ़ाया था। मैहर की रक़म के बारे में भी रिवायात मुख्तलिफ हैं, एक रिवायत यह है कि मैहर की रक़म 12 ओक़िया के क़रीब थी, दूसरी रिवायत यह है कि आपने मैहर में 20 जवान ऊंटनियां दी ।

निकाह के बाद नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने वलीमे की दावत खिलाई और उस दावत में आपने एक या दो ऊंट ज़िबह किए ।

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★__ तीन तहरीरें _,"*


★__ आप सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम की उमर 35 साल हुई तो मक्का में जबरदस्त सैलाब आया,  क़ुरेश ने सैलाब से महफूज रहने के लिए एक बंद बना रखा था, मगर यह सैलाब इस क़दर जबरदस्त था कि बंद तोड़कर काबे में दाखिल हो गया। पानी के जबरदस्त रेले और पानी के अंदर जमा होने की वजह से काबे की दीवारों में सगाफ पड़ गए। इससे पहले एक मर्तबा यह दीवारें आग लग जाने की वजह से कमजोर हो चुकी थी और यह वाक़या इस तरह हुआ था की एक मर्तबा कोई औरत काबे को धूनी दे रही थी कि उस आग में से एक चिंगारी उड़कर काबे के पर्दे तक पहुंच गई इससे पर्दे को आग लग गई और दीवारें तक जल गई । इस तरह दीवारें बहुत कमजोर हो गई थी यही वजह थी कि सैलाब ने उनकी कमजोर दीवारों में सगफ कर दिए।


★__ सैयदना इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने काबे की जो दीवार उठाई थी वह 9 गज ऊंची थी उन पर छत नहीं थी । लोग काबे के लिए नजराने वगैरह लाते थे यह नजराने कपड़े और खुशबूऐं वगैरह होती थी । काबे के अंदर जो कुआं था यह सब नजराने उस कुएं में डाल दिए जाते थे । कुआं अंदरूनी हिस्से में दाएं तरफ था उसको काबे का खजाना कहा जाता था । काबे के खजाने को एक मर्तबा एक चोर ने चुराने की कोशिश की ,चोर कुएं में गिर गया , उसके बाद अल्लाह ताला ने उसकी हिफाजत के लिए एक सांप को मुकर्रर कर दिया। सांप कुएं की मुंडेर पर बैठा रहता था किसी को खजाने के नजदीक नहीं आने देता था । कुरैशी भी उससे खौफज़दा रहते थे । अब जबकि काबे की दीवारों में सगाफ पड़ गए और नए सिरे से उसको तामीर का मसला पेश आया तो अल्लाह ताला ने एक परिंदे को भेजा वह उस उस सांप को उठा ले गया ।

*( अल बिदाया वा अन निहाया )*


★__ यह देखकर कुरेश के लोग बहुत खुश हुए ।अब उन्होंने नए सिरे से काबे की तामीर का फैसला कर लिया और प्रोग्राम बनाया की बुनियादें मजबूत बनाकर दीवारों को ज्यादा ऊंचा उठाया जाए इस तरह दरवाजे को भी ऊंचा कर दिया जाएगा ताकी काबे में कोई दाखिल ना हो, सिर्फ वही शख्स दाखिल हो जिसे वह इजाजत दें ।


★_ अब उन्होंने पत्थर जमा किए हर कबीला अपने हिस्से के पत्थर अलग जमा कर रहा था ।चंदा भी जमा किया गया। चंदे में उन्होंने पाक कमाई दी नापाक कमाई नहीं दी । मसलन तवायफ की आमदनी ,सूद की कमाई ,दूसरे का माल गस्ब करके हासिल की गई दौलत चंदे में नहीं दी गई और पाक कमाई उन्होंने बिना वजह नहीं दी थी एक खास वाकि़या पेश आया था जिससे वह इस नतीजे पर पहुंचे थे कि इस काम में सिर्फ पाक कमाई लगाई जाएगी ।


 ★__ वह वाकि़या यूं था :- एक क़ुरेश सरदार अबु वहब अमरू बिन आबिद ने जब यह काम शुरू करने के लिए एक पत्थर उठाया तो पत्थर उसके हाथ से निकल कर फिर उस जगह पहुंच गया जहां से उसे उठाया था । इस पर क़ुरेश हैरान व परेशान हुए,  आखिर खुद वहब खड़ा हुआ और बोला :- 

"_ ऐ क़ुरेश !  काबे की बुनियाद में सिवाय पाक माल के कोई दूसरा माल शामिल मत करना बैतुल्लाह की तामीर में किसी बदकार औरत की कमाई, सूद की कमाई या जबरदस्ती हासिल की गई दौलत हरगिज़ शामिल ना करना_,"


★__ यह वहब नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के वालिद हजरत अब्दुल्लाह का मामू था और अपनी कौम में एक शरीफ आदमी था। 

जब क़ुरेश के लोग खाना काबा की तामीर के लिए पत्थर ढ़ो रहे थे तो उनके साथ नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम भी पत्थर ढोने में शरीक थे आप पत्थर अपनी गर्दन पर रख कर ला रहे थे , तामीर शुरू करने से पहले क़ुरेश के लोगों ने खौफ महसूस किया की दीवारें गिराने से कहीं उन पर कोई मुसीबत ना नाजिल हो जाए । आखिर एक सरदार वलीद बिन मुगीरा ने कहा :-  काबे की दीवार गिराने से तुम्हारा इरादा इस्लाह और मरम्मत का है या उसको खराब करने का ?

जवाब में लोगों ने कहा - ज़ाहिर है हम मरम्मत और इस्लाह चाहते हैं। 

यह सुनकर वलीद ने कहा- तब फिर समझ लो अल्लाह ताला इस्लाह करने वालों को बर्बाद नहीं करता _,"


★__ फिर वलीद ही ने गिराने के काम की इब्तिदा की लेकिन उसने भी सिर्फ एक हिस्सा ही गिराया ताकि मालूम हो जाए कि उन पर कोई तबाही तो नहीं आती । जब वो रात खैरियत से गुजर गई तब दूसरे दिन सब लोग उसके साथ शरीक हो गए और पूरी इमारत गिरा दी ,यहां तक कि इसकी बुनियाद तक पहुंच गए ।

यह बुनियाद इब्राहिम अलैहिस्सलाम के हाथ की रखी हुई थी । हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने बुनियादों में सब्ज़  रंग के पत्थर रखे थे, यह पत्थर ऊंट की कौहान की तरह के थे और एक दूसरे से जुड़े हुए थे उन लोगों के लिए इन को तोड़ना बहुत मुश्किल काम साबित हुआ ।


★__ दाएं कोने से नीचे से क़ुरेश को एक तहरीर मिली, वह तहरीरें सुरयानी जुबान में लिखी हुई थी, उन्हें सुरियानी जुबान नहीं आती थी। आखिर एक यहूदी को तलाश करके लाया गया उसने वो तहरीर पढ़कर उन्हें सुनाई ।


 ★__ तहरीर यह थी :- मैं अल्लाह हूं मक्का का मालिक जिसको मैंने उस दिन पैदा किया जिस दिन मैंने आसमानों और ज़मीनों को पैदा किया जिस दिन मैंने सूरज और चांद बनाएं मैंने इसको यानी मक्का को सात फरिश्तों के जरिए घैर दिया है इस की अज़मत उस वक्त तक खत्म नहीं होगी जब तक इसके दोनों तरफ के पहाड़ मौजूद हैं, इन पहाड़ों से मुराद एक तो कैस पहाड़ है जो कि सफा पहाड़ी के सामने है और दूसरा कैकि़यान पहाड़ है जो मक्का के करीब है और जिसका रुख अबु क़ैस पहाड़ की तरफ है और यह शहर अपने बाशिंदों के लिए पानी और दूध के लिहाज़ से बहुत बा बरकत और नफा वाला है_,"


★__ यह पहली तहरीर थी। दूसरी मक़ामें इब्राहिम से मिली उसमें लिखा था :-  मक्का अल्लाह ताला का मोहतरम और मौअज्ज़म शहर है इसका रिज़्क़ 3 रास्तों से इसमें आता है ।"

यहां तीन रास्तों से मुराद क़ुरेश के तीन तिजारती रास्ते हैं ,उन रास्तों से काफ़िले आते जाते थे।


★__ तीसरी तहरीर इसके कुछ फासले से मिली उसमें लिखा था :-  जो भलाई होएगा लोग उस पर रश्क़ करेंगे यानी उस जैसे बनने की कोशिश करेंगे और जो शख्स रुसवाई होयेगा वह रुसवाई और नदामत पाएगा ,तुम बुराइयां करके भलाई की आस लगाते हो । हां ! यह ऐसा ही है जैसे कीकर यानी कांटेदार दरख्त में कोई अंगूर तलाश करें _,"


★__ यह तहरीरें काबा के अंदर पत्थर पर खुदी हुई मिली ,काबा की तामीर के सिलसिले में क़ुरेश को पत्थरों के अलावा लकड़ी की भी जरूरत थी, छत और दीवारों में लकड़ी की जरूरत थी ।लकड़ी का मसला इस तरह हल हुआ कि एक जहाज अरब के साहिल से आकर टकरा गया ,आज उस मुकाम को जद्दा का साहिल कहा जाता है पहले यह मक्का का साहिल कहलाता था इसलिए कि मक्का का करीब तरीन साहिल यही था।


★__ साहिल से टकराकर जहाज टूट गया वह जहाज किसी रूमी ताजिर का था उस जहाज में शाहे रोम  के लिए संगेमरमर ,लकड़ी और लोहे का सामान ले जाया जा रहा था। कुरेश को इस जहाज के बारे में पता चला तो यह लोग वहां पहुंचे और उन लोगों से लकड़ी खरीद ली ।इस तरह छत की तामीर में इस लकड़ी को इस्तेमाल किया गया । आखिर खाना काबा की तामीर का काम हजरे अस्वद तक पहुंच गया ।




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★__ हजरे अस्वद कौन रखेगा ?*


★__ अब यहां एक नया मसला पैदा हो गया । सवाल यह पैदा हुआ की हजरे अस्वद कौन उठाकर उसकी जगह पर रखेगा। हर कबीला यह फजी़लत खुद हासिल करना चाहता था ।यह झगड़ा इस हद तक बड़ा कि मरने मारने तक नौबत आ गई ,लोग एक दूसरे को क़त्ल करने पर तुल गए । कबीला अब्द अल दार ने तो कबीला अदी के साथ मिलकर एक बर्तन में खून भरा और उसमें अपने हाथ डुबो कर कहा :- हजरे अस्वद हम रखेंगे _,"

इसी तरह दूसरे क़बीले भी अड़ गए ,तलवारे नियामों से निकल  आई।


★__ आखिर वह सब बैतुल्लाह में जमा हो गए । उन लोगों में अबु उमैया बिन मुगीरा था उसका नाम हुज़ैफा था । क़ुरेश के पूरे कबीले में सबसे ज्यादा उम्र वाला था । यह उम्मुल मोमिनीन सैयदा उम्मे सलमा रजियल्लाहु अन्हा का बाप था । क़ुरेश के इंतेहाई शरीफ लोगों में से था। मुसाफिरों को सफरे सामान और खाना वगैरह देने के सिलसिले में बहुत मशहूर था । जब कभी सफर करता तो अपने साथियों के खाने-पीने का सामान खुद करता था।


★__ इस वक्त इस शदीद झगड़े को खत्म करने के लिए उसने एक हल पेश किया। उसने सब से कहा :- ऐ क़ुरेश के लोगों अपना झगड़ा खत्म करने के लिए तुम यूं करो कि हरम के सफा नामी दरवाजे से जो शख्स सबसे पहले दाखिल हो उससे फैसला करा लो, वह तुम्हारे दरमियान जो फैसला करें वह सब उसको मान लें । 

यह तजवीज़ सब ने मान ली । आज उस दरवाजे को बाबुल सलाम कहा जाता है । यह दरवाजा रुकने यमानी और रुकने अस्वद के दरमियानी हिस्से के सामने है।


★__ अल्लाह की कुदरत इस दरवाजे से सबसे पहले हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम तशरीफ लाए। क़ुरेश ने जैसे ही आपको देखा पुकार उठे :- यह तो अमीन है ,यह तो मोहम्मद है, हम इस पर राजी हैं ।"

 और उनके ऐसा कहने की वजह यह थी कि क़ुरेश अपने आपस के झगड़ों के फैसले आप ही से कराया करते थे आप किसी की बेजा हिमायत नहीं करते थे, ना बिला वजह किसी की मुखालफत करते थे।

★_ उन्होंने अपने झगड़े की तफसील आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को सुनाई, सारी तफसील सुनकर आपने फरमाया :- एक चादर ले आओ ।

वो लोग आए , आपने उस चादर को बिछाया और अपने दस्ते मुबारक से हजरे अस्वद को उठाकर उस चादर पर रख दिया। इसके बाद आप ने इरशाद फरमाया :-हर क़बीले के लोग इस चादर का एक किनारा पकड़ लें, फिर सब मिलकर इस को उठाएं _,"


★___ उन्होंने ऐसा ही किया, चादर को उठाते हुए वह उस मुका़म तक आ गए जहां हजरे अस्वद को रखना था । इसके बाद नबी अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने हजरे अस्वद को उठाकर उसकी जगह रखना चाहा लेकिन ऐन उसी वक्त एक नज़दी शख्स आगे बढ़ा और तेज आवाज में बोला :-  बड़े ताज्जुब की बात है कि आप लोगों ने एक कम उम्र नौजवान को अपना रहनुमा बना लिया इसकी इज्जत अफजा़ई में लग गए हो , याद रखो यह शख्स सबको गिरोहों में तक़सीम कर देगा तुम लोगों को पारा पारा कर देगा _,"

क़रीब था कि लोगों में उसकी बातों से एक बार फिर झगड़ा हो जाए ,लेकिन फिर खुद ही उन्होंने महसूस कर लिया कि हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने जो फैसला किया है वह लड़ाने वाला नहीं लड़ाई खत्म करने वाला है। चुनांचे हजरे अस्वद को नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने अपने मुबारक हाथों से उसकी जगह पर रख दिया _,"


★_ मोरखों ने लिखा है यह नजदी शख्स दरअसल इब्लीस था जो इस मौके पर इंसानी शक्ल में आया था ।


★_ जब काबे की तामीर मुकम्मल हो गई तो कुरेश ने अपने बुतों को फिर से उसमें सजा दिया ।

काबे की यह तामीर जो कुरैश ने की चौथी तामीर थी सबसे पहले काबे को फरिश्तों ने बनाया था बाज़ सहाबा ने फरमाया है कि जमीन व आसमान को पैदा करने से पहले अल्लाह ताला का अर्श पानी के ऊपर था जब अर्श को पानी पर होने की वजह से हरकत हुई तो उस पर यह कलमा लिखा गया :-

"_ ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह _,"

अल्लाह ता'ला के सिवा कोई माबूद नहीं मुहम्मद सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम अल्लाह ता'ला के रसूल हैं_,"


★__ इस कलमें के लिखे जाने के बाद अर्श साकिन हो गया ,फिर जब अल्लाह ता'ला ने आसमान और जमीन को पैदा करने का इरादा फरमाया तो उसने पानी पर हवा को भेजा उससे पानी में मौजे उठने लगी और बुखारात उठने लगे । अल्लाह ताला ने उन बुखारात यानी भाप से आसमान को पैदा फरमाया । फिर अल्लाह ता'ला ने काबे की जगह से पानी को हटा दिया जगह खुश्क हो गई, चुनांचे यही बेतुल्लाह की जगह सारी ज़मीन की असल है और इसका मरकज़ है। यही खुश्की बढ़ते बढ़ते 7 बर्रे आज़म बन गई , जब ज़मीन ज़ाहिर हो गई तो उस पर पहाड़ क़ायम किए गए। जमीन पर सबसे पहला पहाड़ अबू कैस है ।

★__ फिर अल्लाह ताला ने फरिश्तों को हुक्म फरमाया :-  ज़मीन पर मेरे नाम का एक घर बनाओ ताकि आदम की औलाद उस घर के ज़रिए मेरी पनाह मांगे, आसमान उस घर का तवाफ करें जिस तरह तुमने मेरे अर्श के गिर्द तवाफ किया है ,ताकि मैं उनसे राज़ी हो जाऊं _,"


★_फरिश्तों ने हुक्म की तामील की , फिर आदम अलैहिस्सलाम ने खाना काबा की तामीर शुरू की, उसके बाद हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने खाना काबा की तामीर की, इस तरह क़ुरेश के हाथों यह तामीर चौथी बार हुई थी।


★_हुजूर अकरम सल्लल्लाहो वाले वसल्लम की उम्र मुबारक 40 साल के करीब हुई तो वही के आसार शुरू हो गए ।इस सिलसिले में सबसे पहले आपको सच्चे ख्वाब दिखाई देने लगे ,आप जो ख्वाब देखते वह हक़ीक़त बन कर सामने आ जाता। अल्लाह ता'ला ने सच्चे ख्वाबों का सिलसिला इसलिए शुरू किया कि अचानक फरिश्ते की आमद से कहीं आप खौफज़दा ना हो जाएं , उन दिनों एक बार आपने सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा से फरमाया :-

"_ जब मैं तनहाई में जाकर बैठता हूं तो मुझे आवाज सुनाई देती है ....कोई कहता है.... ए मुहम्मद ए ....मुहम्मद...,"

एक बार आपने फरमाया :-

"_मुझे एक नूर नज़र आता है यह नूर जागने की हालत में नज़र आता है, मुझे डर है इसके नतीजे न कोई बात ना पेश आ जाए _,"

एक बार आपने यह भी फरमाया :-

"_ अल्लाह की क़सम ! जितनी नफरत इन बुतों से है उतनी किसी और से नहीं _,"


★_वहीं के लिए आपको ज़हनी तौर पर तैयार करने के लिए अल्लाह ता'ला ने फरिश्ते इसराफील को आपका हमदम बना दिया था। आप उनकी मौजूदगी को महसूस तो करते थे मगर उन्हें देख नहीं सकते थे ।इस तरह आपको नबूवत की खुशखबरियां दी जाती रही, आपको वही के लिए तैयार किया जाता रहा।

अल्लाह ता'ला ने आपके दिल में तनहाई का शौक पैदा फरमा दिया था । चुनांचे आपको तनहाई अज़ीज़ हो गई । आप गारे हिरा में चले जाते और वहां वक्त गुजा़रते, उस पहाड़ से आपको एक बार आवाज भी सुनाई दी थी :- "_ मेरी तरफ तशरीफ़ लाइए ऐ अल्लाह के रसूल _,"


★_ उस गार में आप मुस्तकिल कई कई रातें गुजा़रते, अल्लाह की इबादत करते ,कभी आप तीन रातों तक वहां ठहरे रहे , कभी सात रातों तक ,कभी पूरा महीना वहां गुजार देते । आप जो खाना साथ ले जाते थे जब खत्म हो जाता तो घर तशरीफ़ ले जाते,  खाना आमतौर पर जैतून का तेल और खुश्क रोटी होता था ,कभी खाने में गोश्त भी होता था। गारे हिरा में क़याम के दौरान कुछ लोग वहां से गुज़रते और उनमें कुछ मिस्कीन लोग होते तो आप उन्हें खाना खिलाते ।

गारे हिरा में आप इबादत किस तरह करते थे रिवायत में इसकी वजाहत नहीं मिलती, उल्मा किराम ने अपना अपना ख्याल ज़रूर जा़हिर किया है, उनमें से एक ख्याल यह है कि आप कायनात की हक़ीक़त पर गौरो  फिक्र करते थे और यह गौरो फिक्र लोगों से अलग रहकर ही हो सकता था ।


★_फिर आखिरकार वो रात आ गई जब अल्लाह ता'ला ने आपको नबुवत और रिसालत अता फरमा दी ,आपकी नबूवत के ज़रिए अपने बंदों पर अजीब एहसान फरमाया। वह रबी उल अव्वल का महीना था और तारीख 17 थी , बाज़ उलमा ने लिखा है कि वह रमज़ान का महीना था क्योंकि क़ुरान रमज़ान में नाजि़ल होना शुरू हुआ था । आठवीं और तीसरी तारीख भी रिवायत में आई है और यह पहला मौका था जब जिब्राइल अलैहिस्सलाम वही लेकर आप की खिदमत में हाजिर हुए इससे पहले वह आपके पास नहीं आए थे । जिस सुबह  जिब्राइल अलैहिस्सलाम वही लेकर आए वह पीर की सुबह थी और पीर की सुबह ही आप इस दुनिया में तशरीफ़ लाए थे ।आप फरमाया करते थे :- 

"_ पीर के दिन का रोज़ा रखो क्यूंकि मैं पीर के दिन पैदा हुआ ,पीर के दिन ही मुझे नबूवत मिली _,"



बहरहाल इस बारे में रिवायत मुख्तलिफ हैं ,यह बात तैय है कि उस वक्त आपकी उम्र मुबारक का 40 वा साल था, आप उस वक्त नींद में थे कि जिब्राइल अलैहिस्सलाम तशरीफ ले आए, उनके हाथ में एक रेशमी कपड़ा था और उस कपड़े में एक किताब थी।

*💕ʀєαd, ғσʟʟσɯ αɳd ғσʀɯαʀd 💕,*

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*┱✿___ पहली वही _,"*

★__ उन्होंने आते ही कहा :- "इक़रा " यानी पढ़िए ।

आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फरमाया:- मैं नहीं पढ़ सकता (यानी मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं)

इस पर जिब्राइल अलैहिस्सलाम ने आपको सीने से लगाकर भींचा। आप फरमाते हैं उन्होंने मुझे इस जोर से भींचा कि मुझे मौत का गुमान हुवा ।इसके बाद उन्होंने मुझे छोड़ दिया ,फिर कहा :- पढ़िए , यानी जो मैं कहूं वह पढ़िए , इस पर आप ने फरमाया:- मैं क्या पढ़ूं ?

★_ तब जिब्राइल अलैहिस्सलाम ने सूरह अल अ़लक़ की यह आयात पढ़ी :-

( तर्जुमा ) ए पैगंबर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ! आप (पर जो क़ुरान नाजिल हुआ करेगा ) अपने रब का नाम लेकर पढ़ा कीजिए( यानी जब पढ़ें बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम कहकर पढ़ा कीजिए ) जिसने मखलुका़त को पैदा किया जिसमें इंसान को खून के लो थोथड़े से पैदा किया, आप क़ुरान पढ़ा कीजिए और आपका रब बड़ा करीम है ( जो चाहता है अता करता है और ऐसा है) जिसने लिखे पढ़ों को क़लम से तालीम दी ( और आलम तौर पर)  इंसानों को (दूसरे ज़रियों से) उन चीजों की तालीम दी जिनको वह नहीं जानता था ।

★__आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं :- मैंने इन आयतों को उसी तरह पढ़ दिया, जिसके बाद वह फरिश्ता मेरे पास से चला गया , ऐसा लगता था गोया मेरे दिल में एक तहरीर लिख दी गई हो , यानी यह कलमात मुझे जुबानी याद हो गए,

इसके बाद आप घर तशरीफ़ लाएं _,

बाज़ रिवायात में आता है कि जिब्राइल अलैहिस्सलाम जब गार में आए तो पहले उन्होंने यह अल्फाज़ कहे थे :-

"_ ऐ मोहम्मद ! आप अल्लाह के रसूल हैं और मैं जिब्राइल हूं ।

★__ आपके घर तशरीफ़ आवरी  से पहले सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा हू  ने हस्बे मामूल आपके लिए खाना तैयार करके एक शख्स के हाथ आपके पास भिजवा दिया था मगर उस शख्स को आप गार में नज़र ना आए उस शख्स ने वापस आकर यह बात सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा को बताई, उन्होंने आप की तलाश में आपके अजी़जो़ अक़ारिब के घर आदमी भेजे मगर आप वहां भी ना मिले। इसलिए सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा परेशान हो गई वह अभी इसी परेशानी में थी कि आप तशरीफ ले आए ।आपने जो कुछ देखा और सुना था कि तफसील सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा से बयान फरमाई, हजरत जिब्राइल का यह जुमला भी बताया कि - "_ए मुहम्मद ! आप अल्लाह के रसूल हैं_,"

★_ यह सुनकर सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने कहा- आपको खुशखबरी हो ...आप यकीन कीजिए ! क़सम है उस जा़त की जिसके क़ब्जे में मेरी जान है आप इस उम्मत के नबी होंगे ।

★__ फिर सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा आपको  अपने चाचा जाद भाई वरक़ा बिन नोफिल के पास ले गई । गार वाला सारा वाकि़या उन्हें सुनाया,  वरक़ा बिन नोफिल पुरानी किताबों के आलिम थे । सारी बात सुनकर वह पुकार उठे :-

क़ुद्दूस...क़ुद्दूस... क़सम है उस जा़त की जिसके क़ब्जे में मेरी जान है , खदीजा अगर तुम सच कह रही हो तो इसमें शक नहीं इनके पास वही नामूसे अकबर यानी जिब्राइल आए थे जो मूसा अलैहिस्सलाम के पास आया करते थे। मुहम्मद इस उम्मत के नबी हैं । ये इस बात पर यकीन कर लें।

क़ुद्दूस का मतलब है, वह जा़त जो हर ऐब से पाक हो ।यह लफ्ज़ ताज्जुब के वक्त बोला जाता है जैसे हम कह देते हैं ,अल्लाह.. अल्लाह _,

★_ वरका़ बिन नोफिल को जिब्राइल का नाम सुनकर हैरत इसलिए हुई थी कि अरब के दूसरे शहरों में लोगों ने यह नाम सुना भी नहीं था । यह भी कहा जाता है कि वरक़ा बिन नोफिल ने आपके सर को बोसा दिया था और फिर कहा था :-

काश मैं उस वक्त तक जिंदा रहता जब आप लोगों को अल्लाह ताला की तरफ दावत देंगे, मैं आपकी मदद करता ,इस अजी़म काम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता , काश मैं उस वक्त तक जिंदा रहूं जब आपकी कौम आपको झुठलाएगी, आपको तकालीफ पहुंचाएगी , आपके साथ जंगे लड़ी जाएंगी और आपको यहां से निकाल दिया जाएगा। अगर मैं उस वक्त तक जिंदा रहा तो आपका साथ दूंगा ,अल्लाह के दीन की हिमायत करूंगा ।

आप यह सुनकर हैरान हुए और फरमाया :- मेरी कौम मुझे वतन से निकाल देगी ?

जवाब में वरक़ा ने कहा -हां ! इसलिए जो चीज़ आप लेकर आए हैं उसे लेकर जो भी आया उस पर जुल्म ढाए गए ...अगर मैंने वह जमाना पाया तो मैं ज़रूर आपकी पूरी मदद करूंगा _,"

वरक़ा ने हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा से यह भी कहा :- तुम्हारे खाविंद बेशक सच्चे हैं , दर हक़ीक़त यह बातें नबूवत की इब्तिदा है ...यह इस उम्मत के नबी है ।

★_ लेकिन इसके कुछ ही मुद्दत बाद वरक़ा बिन् नोफिल का इंतकाल हो गया , उन्हें हुजून के मुकाम पर दफन किया गया । चूंकि उन्होंने आपकी तसदीक़ की थी इसलिए नबी अकरम सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने उनके बारे में फरमाया है :-

मैंने वरक़ा  को जन्नत में देखा है उनके जिस्म पर सुर्ख लिबास था।"

★__ वरका़ से मुलाकात के बाद आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम घर तशरीफ ले आए , उसके बाद एक मुद्दत तक जिब्राइल अलैहिस्सलाम आपके सामने नहीं आए ।दरमियान में जो वक़फा डाला गया इसमें अल्लाह ताला की यह हिकमत थी कि आपके मुबारक दिल पर जिब्राइल अलैहिस्सलाम को देखकर जो खौफ पैदा हो गया था उसका असर जाइल हो जाए और उनके ना आने की वजह से आपके दिल में वही का शौक पैदा हो जाए । चुंनाचे ऐसा ही हुआ जिब्राइल अलैहिस्सलाम की आमद के बाद सिलसिला रुक जाने के बाद आपको सदमा हुआ । कई बार आप पहाड़ों की चोटियों पर चढ़ गए ताकि खुद को वहां से गिरा कर खत्म कर दें लेकिन जब भी आप ऐसा करने की कोशिश करते  जिब्राइल अलैहिस्सलाम आपको पुकारते:- "_ ए मुहम्मद ! आप हक़ीक़त में अल्लाह ता'ला के रसूल हैं।"

★__ यह कलिमात सुनकर आप सुकून महसूस करते लेकिन जब फिर वही का वक़फा कुछ और गुज़र जाता तो आप बेक़रार हो जाते ,रंज महसूस करते हैं और उसी तरह पहाड़ की चोटी पर चढ़ जाते , चुनांचे फिर जिब्राइल अलैहिस्सलाम आ जाते और आप को तसल्ली देते ,आखिर दोबारा वही हुई , सूरह मुदस्सिर की पहेली तीन आयात उतरी :-

"_ तर्जुमा ए कपड़े में लेटने वाले उठो ! ( यानी अपनी जगह से उठो और तैयार हो जाओ) फिर काफिरों को डराओ और फिर अपने रब की बढ़ाईयां बयान करो और अपने कपड़े पाक रखो _,"

★__ इसी तरह आपको नबूवत के साथ तबलीग का हुक्म दिया गया। इब्ने इसहाक़ लिखते हैं :-

"_ सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा पहली खातून है जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाईं और अल्लाह की तरफ से जो कुछ आप हजरत  लेकर आए उसकी तस्दीक़ की। मुशरिकीन की तरफ से आपको जब भी तकलीफ पहुंची, सदमा पहुंचा, सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने आपको दिलासा दिया ।

★_सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के बाद दूसरे आदमी हजरत अबू बकर रजियल्लाहु अन्हु हैं, जो आपके पुराने दोस्त थे, उन्होंने आपकी जु़बान से नबूवत मिलने का जिक्र सुनते ही फौरन आपकी तसदीक़ की और ईमान ले आए । बच्चों में सैयदना अली रजियल्लाहु अन्हु हैं जो आप पर पहले ईमान लाए और उनके ईमान लाने का वाकि़या कुछ इस तरह है :-

★__ एक दिन आप हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के पास तशरीफ लाए उस वक्त सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा भी आपके साथ थी और आप उनके साथ छुपकर नमाज पढ़ रहे थे । उन्होंने यह नई बात देखकर पूछा:-  यह आप क्या कर रहे हैं ?

नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया:- "_यह वह दीन है जिसको अल्लाह ताला ने अपने लिए पसंद फरमाया है और इसके लिए अल्लाह ताला ने अपने पैगंबर भेजे हैं मैं तुम्हें भी अल्लाह की तरह बुलाता हूं लात और उज्जा़ की इबादत से रोकता हूं _,"

हजरत अली ने यह सुनकर अर्ज़ किया :- यह एक नई बात है इसके बारे में मैंने आज से पहले कभी नहीं सुना इसलिए मैं अपने बारे में अभी कुछ नहीं कह सकता, मैं अपने वालिद से मशवरा कर लूं _,"

उनका जवाब सुनकर आपने इरशाद फरमाया :- अली अगर तुम मुसलमान नहीं होते तो भी इस बात को छुपाए रखना _,"

उन्होंने वादा किया और इसका ज़िक्र किसी से ना किया। रात भर सोचते रहे । आखिर अल्लाह ता'ला ने उन्हें हिदायत अता फरमाई। सवेरे आप की खिदमत में हाज़िर हुए और मुसलमान हो गए।

उल्मा ने लिखा है उस वक्त हजरत अली की उमर 8 साल के क़रीब थी , इससे पहले भी उन्होंने कभी बुतों की इबादत नहीं की थी ,वह बचपन ही से नबी अकरम सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के साथ रहते थे।

★__ लेकिन एहतियात के बावजूद हजरत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के वालिद को उनके क़ुबूले  इस्लाम का इल्म हो गया तो उन्होंने हजरत अली रजियल्लाहु अन्हु से इसके मुताल्लिक इस्तफ्सार किया ।

अपने वालिद का सवाल सुनकर हजरत अली रजियल्लाहु अन्हु ने फरमाया :-अब्बा जान ! मैं अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान ला चुका हूं और जो कुछ अल्लाह के रसूल लेकर आए हैं उसकी तस्दीक़ कर चुका हूं लिहाज़ा उनके दीन में दाखिल हो गया हूं और उनकी पैरवी अख्तियार कर चुका हूं _,"

यह सुनकर अबू तालिब ने कहा:-  जहां तक उनकी बात है (यानी मुहम्मद सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की ) तो वह तुम्हें भलाई के सिवा किसी दूसरे रास्ते पर नहीं लगाएंगे लिहाज़ा उनका साथ ना छोड़ना ।

★_अबू तालिब अक्सर यह कहा करते थे :- मैं जानता हूं मेरा भतीजा जो कहता है हक़ है ,अगर मुझे यह डर ना होता कि कुरैश की औरतें मुझे शर्म दिलाएंगी तो मैं ज़रूर उनकी पैरवी क़ुबूल कर लेता _,"

★_अफीफ कंदी रजियल्लाहु अन्हु एक ताजिर थे, उनका बयान है :- इस्लाम लाने से पहले मैं एक मर्तबा हज के लिए आया, तिजारत का कुछ माल खरीदने के लिए मैं अब्बास इब्ने अब्दुल मुत्तलिब के पास गया वह मेरे दोस्त थे और यमन से अक्सर अतर् खरीद कर लाते थे फिर हज के मौसम में मक्का में फरोख्त करते थे । मैं उनके साथ मीना में बैठा था । एक नौजवान आया, उसने गुरूब होते सूरज की तरफ गौर से देखा जब उसने देख लिया कि सूरज गुरुब हो चुका, तो उसने बहुत अहतमाम से वज़ु किया, फिर नमाज पढ़ने लगा यानी काबा की तरफ मुंह करके ..फिर एक लड़का आया जो बालिग होने के क़रीब था उसने वजू किया और उस नौजवान के बराबर खड़े होकर नमाज पढ़ने लगा, फिर एक औरत खैमे से निकली और उनके पीछे नमाज़ की नियत बांधकर खड़ी हो गई, इसके बाद उस नौजवान ने रुकू किया तो उस लड़के और औरत में भी रुकू किया, नौजवान  सजदे में गया तो वह दोनों भी सजदे में चले गए। यह मंजर देख कर मैंने अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब से पूछा :-

"_ अब्बास यह क्या हो रहा है ?"

उन्होंने बताया :- यह मेरे भाई अब्दुल्लाह के बेटे का दीन है, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दावा है कि अल्लाह ताला ने उसे पैगंबर बनाकर भेजा है, यह लड़का मेरा भतीजा अली इब्ने अबु तालिब है और यह औरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम की बीवी खदीजा है _,"

★_यह अफीफ कंदी रजियल्लाहु अन्हु मुसलमान हो गए तो कहा करते थे :- काश उस वक्त उन में चौथा आदमी में होता।

इस वाक्य के वक्त गालिबन हज़रत ज़ैद बिन हारिसा और हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु वहां मौजूद नहीं थे अगरचे उस वक्त तक दोनों मुसलमान हो चुके थे।

★__ हजरत ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु गुलामों में सबसे पहले ईमान लाए थे, यह हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के आज़ाद करदा गुलाम थे ,पहले यह हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के गुलाम थे, शादी के बाद उन्होंने ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु को आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की गुलामी में दे दिया था ।

★_यह गुलाम किस तरह बने ? यह भी सुन लें। जाहिलियत के ज़माने में इनकी वालीदा इन्हें लिए अपने मां-बाप के यहां जा रही थी कि काफ़िले को लूट लिया गया, डाकू इनके बेटे जै़द बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु को भी ले गए,  फिर इन्हें उकाज़ के मेले में बेचने के लिए लाया गया । इधर सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा ने हकीम बिन हुज़ाम रजियल्लाहु अन्हु को मेले में भेजा ,वह एक गुलाम खरीदना चाहती थी, आप हकीम बिन हुज़ाम रजियल्लाहु अन्हु  की फूफी थी । हकीम बिन हुज़ाम रजियल्लाहु अन्हु मेले में आए तो वहां इन्होंने ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु को बिकते देखा ,उस वक्त उनकी उम्र 8 साल थी । हकीम बिन हुज़ाम रजियल्लाहु अन्हु को यह अच्छे लगे चुनांचे इन्होंने सैयदा खदीजा रजियल्लाहु अन्हा के लिए इन्हें खरीद लिया ।हजरत खदीजा रजियल्लाहु अन्हा को भी यह पसंद आए और उन्होंने इन्हें अपनी गुलामी में ले लिया , फिर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को हदिया कर दिया ।इस तरह हजरत ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के गुलाम बने।

★_फिर जब आपने इस्लाम की दावत दी तो फौरन आप ईमान ले आए । बाद में हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इन्हें आज़ाद कर दिया था मगर यह उम्र भर हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की खिदमत में रहे । इनके वालिद एक मुद्दत से इनकी तलाश में थे किसी ने उन्हें बताया कि जैद मक्का में देखे गए हैं ,इनके वालिद और चाचा इन्हें लेने फौरन मक्का मुअज़्ज़मा की तरफ चल पड़े, मक्का पहुंचकर यह आप सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की खिदमत में हाजिर हुए और आपको बताया कि जैद इनके बेटे हैं ।

सारी बात सुनकर आपने इरशाद फरमाया :- तुम ज़ैद से पूछ लो, अगर यह तुम्हारे साथ जाना चाहे तो मुझे कोई एतराज़ नहीं और यहां मेरे पास रहना चाहे तो इनकी मर्जी।

ज़ैद रजियल्लाहु अन्हु से पूछा गया तो इन्होंने नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के साथ रहना पसंद किया।

★_इस पर बाप ने कहा:-  तेरा बुरा हो ज़ैद... तू आजादी के मुक़ाबले में गुलामी को पसंद करता है _,"

जवाब में हजरत ज़ैद रजियल्लाहु अन्हु ने कहा :- हां इनके (हुजूर सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के)  मुक़ाबले में मैं किसी और को हरगिज़ नहीं चुन सकता _,"

आपने हजरत ज़ैद रजियल्लाहु अन्हु की यह बात सुनी तो आपको फौरन हजरे अस्वाद के पास ले गए और ऐलान फरमाया :-  आज से ज़ैद मेरा बेटा है ।

इनके वालिद और चाचा मायूस हो गए। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन्हें इजाज़त दे दी कि वह जब चाहे ज़ैद से मिलने आ सकते हैं चुनांचे वह मिलने के लिए आते रहे।

★_तो यह थे हज़रत ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हु जो गुलामों में सबसे पहले ईमान लाए,  हजरत ज़ैद वाहिद सहाबी हैं जिनका क़ुरआने करीम में नाम लेकर जि़क्र किया गया है।

★_मर्दों में सबसे पहले सैयदना अबु बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ईमान लाए,  आप नबी अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के पहले ही दोस्त थे, हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम अक्सर उनके घर आते और उनसे बातें किया करते थे। एक दिन हजरत हकीम बिन हुज़ाम रजियल्लाहु अन्हु के पास बैठे थे कि उनकी एक बांदी वहां आई और कहने लगी -आज आपकी फूफी खदीजा ने यह दावा किया है कि उनके शौहर अल्लाह ताला की तरफ से भेजे हुए पैगंबर है जैसा कि मूसा अलैहिस्सलाम थे।

★_ हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने जूंही हकीम रजियल्लाहु अन्हु की बांदी की यह बात सुनी चुपके से वहां से उठे और नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के पास आ गए और आपसे इस बारे में पूछा, इस पर आप ने हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु को वही आने का पूरा वाक़या सुनाया और बताया कि आपको तबलीग का हुक्म दिया गया है यह सुनते ही अबु बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया :-

मेरे मां-बाप आप पर कुर्बान आप बिल्कुल सच कहते हैं वाक़ई आप अल्लाह के रसूल हैं ।

आपके इस तरह फौरन तस्दीक़ करने की बिना पर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने आपको सिद्दीक का लक़ब आता फरमाया।

★_इस बारे में दूसरी रिवायत यह है कि सिद्दीक का लक़ब उस वक्त दिया था जब आप मैराज़ के सफर से वापस तशरीफ लाए थे मक्का के मुशरिकीन ने आपको झुठलाया था । हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने इस वाक्य को सुनते ही फौरी तौर पर आपकी तसदीक़ की थी और आपने उन्हें सिद्दीक का लक़ब अता फरमाया था ।

गर्ज़ अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने आपकी नबूवत की तस्दीक़ फौरी तौर पर कर दी थी।


★__ गर्ज़ इस्लाम में यह पहला लक़ब है जो किसी को मिला , कुरेश में हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु का मर्तबा बहुत बुलंद था आप बहुत खुश अखलाक थे कुरेश के सरदारों में से एक थे। शरीफ सखी और दौलतमंद थे ,रुपया पैसा बहुत फराख दिली से खर्च करते थे । इनकी क़ौम के लोग इन्हें बहुत चाहते थे । लोग इनकी मजलिस में बैठना पसंद करते थे। अपने जमाने में हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु  ख्वाब की ताबीर बताने में बहुत माहिर और मशहूर थे । चुनांचे अल्लामा इब्ने शिरीन रहमतुल्लाह कहते हैं:-

"_ नबी अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के बाद हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु इस उम्मत में सबसे बेहतरीन ताबीर बताने वाले आलिम है _,"

★__ अल्लामा इब्ने शिरीन रहमतुल्लाह ख्वाबों की ताबीर बताने में बहुत माहिर थे और इस सिलसिले में उनकी किताबें मौजूद हैं इन किताबों में ख्वाबों की हैरतअंगेज ताबीरे दर्ज हैं उनकी बताई हुई ताबीरे बिल्कुल दुरुस्त साबित होती रही । मतलब यह है कि इस मैदान के माहिर इस बारे में हजरत अबू बकर सिद्दीक रज़ियल्लाहु अन्हु को नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के बाद सबसे बेहतर ताबीर बताने वाले फरमा रहे हैं।

★_ अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु नसब नामा बयान करने में भी बहुत माहिर थे बल्कि कहा जाता है इस इल्म के सबसे बड़े आलिम थे हजरत जुबेर बिन मुत'अम भी इस इल्म के माहिर थे । वह फरमाते हैं :-

"_मैंने नसब नामों का फन और इल्म खासतौर पर कुरेश के नसब नामों का इल्म हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु से ही हासिल किया है इसलिए कि वह कुरेश के नसब नामों के सबसे बड़े आलिम थे।"

★__क़ुरेश के लोगों को कोई मुश्किल पेश आती तो हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु से राब्ता करते थे । अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु  के बारे में नबी अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम फरमाया करते थे:-

"_ मैंने जिसे भी इस्लाम की दावत दी उसने कुछ ना कुछ सोच विचार और किसी क़दर वक़फा  के बाद इस्लाम कुबूल किया सिवाय अबू बकर के वह बगैर हिचकिचाहट के फौरन मुसलमान हो गए , अबू बकर सबसे बेहतर राय देने वाले हैं मेरे पास जिब्राइल अलैहिस्सलाम आए और उन्होंने कहा कि अल्लाह ताला आपको हुक्म देता है अपने मामलात में अबू बकर से मशवरा किया करें_"

★__ नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के लिए हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु वज़ीर के दर्जे में थे ।आप हर मामले में उनसे मशवरा लिया करते थे। एक हदीस में आता है:- 

नबी अकरम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम फरमाते हैं -

"_अल्लाह ताला ने मेरी मदद के लिए चार वज़ीर मुकर्रर फरमाए हैं इनमें से दो आसमान वालों में से हैं यानी कि जिब्राइल और मिका़ईल (अलेहिमुस्सलाम ) और दो जमीन वालों में से एक अबू बकर और दूसरे उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुम)_,"

★__ इस्लाम लाने से पहले हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने एक ख्वाब देखा था , ख्वाब में आपने देखा चांद मक्का में उतर आया है और उसका एक एक हिस्सा मक्का के हर घर में दाखिल हो गया है और फिर सारा का सारा अबू बकर रजियल्लाहु अन्हु की गोद में आ गया । आपने यह ख्वाब एक ईसाई आलिम को सुनाया उसने इस ख्वाब की ताबीर बयान की कि तुम अपने पैगंबर की पैरवी करोगे जिसका दुनिया इंतजार कर रही है और जिसके ज़हूर का वक़्त करीब आ गया है और यह पेरूकारों में से सबसे ज्यादा खुशकिस्मत इंसान होंगे।

★_एक रिवायत के मुताबिक आलिम ने कहा था- अगर तुम अपना ख्वाब बयान करने में सच्चे हो तो बहुत जल्द तुम्हारे गांव में से एक नबी ज़ाहिर होंगे तुम उस नबी की जिंदगी में उसके वज़ीर बनोगे और उनकी वफात के बाद उनके खलीफा होंगे।

★_कुछ अरसे बाद अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु को यमन जाने का इत्तेफाक हुआ था। यमन में एक बूढ़े आदमी के घर ठहरे उसने आसमानी किताबें पढ़ रखी थी। अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु को देखकर उसने कहा:- मेरा ख्याल है तुम हरम के रहने वाले हो और मेरा ख्याल है तुम कुरैश हो और तैयमी खानदान से हो _,"

अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने जवाब में फरमाया:- हां ! तुमने बिल्कुल ठीक करना ।

अब उसने कहा :-मैं तुमसे एक बात और कहता हूं ...तुम ज़रा अपने पेट पर से कपड़ा हटा का दिखाओ ।

हजरत अबू बकर सिद्दीक उसकी बात सुनकर हैरान हुए और बोले :- ऐसा मैं उस वक्त तक नहीं करूंगा जब तक कि तुम इसकी वजह नहीं बता दोगे।

इस पर उसने कहा :-मैं अपने मज़बूत इल्म की बुनियाद पर कहता हूं कि हरम के इलाक़े में एक नबी का ज़हूर होने वाला है उनकी मदद करने वाला एक नौजवान होगा और एक पुख्ता उमर वाला होगा। जहां तक नौजवान का ताल्लुक़ है वो मुश्किलात में कूद जाने वाला होगा , जहां तक पुख्ता उम्र के आदमी का ताल्लुक है वह सफेद रंग का कमजोर जिस्म वाला होगा, उसके पेट पर एक बालदार निशान होगा ,हरम का रहने वाला तैयमी खानदान का होगा और अब यह ज़रूरी नहीं कि तुम मुझे अपना पेट दिखाओ क्योंकि बाक़ी सब अलामतें तुम में मौजूद है ।

★_उसकी इस बात पर हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने अपने पेट पर से कपड़ा हटाया ,वहां उनकी नाफ़ के ऊपर स्याह और सफेद बाल वाला निशान मौजूद था ,तब वह पुकार उठा :- परवरदिगार ए काबा की कसम ! तुम वही हो।

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★_ हज़रत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु की दावत_,"*

★__ हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु कहते हैं :- जब मैं यमन में अपनी खरीदारी और तिजारती  काम कर चुका तो रुखसत होने के वक्त उसके पास आया , उसने मुझसे कहा :- मेरी तरफ से चंद शेर सुन लो जो मैंने उस नबी की शान में कहे हैं ।

इस पर मैंने कहा- अच्छी बात है , सुनाओ ।

तब उसने मुझे वो शेर सुनाएं। उसके बाद जब मैं मक्का मुअज्ज़मा पहुंचा तो नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम अपनी नबूवत का ऐलान कर चुके थे । फौरन ही मेरे पास कुरेश के बड़े-बड़े सरदार आए उनमें ज्यादा अहम उक़्बा बिन अबी मुईत, शिबा, अबू जहल और अबुल बखतारी थे। उन लोगों ने मुझसे कहा :- अबू बकर ! अबू तालिब के यतीम ने दावा किया है कि वह नबी हैं अगर आपका इंतजार ना होता तो हम इस वक्त तक सब्र ना करते ,अब जबकि आप आ गए हैं उनसे निबटना आप ही का काम है_,"

★__ और यह बात उन्होंने इसलिए कही थी कि हजरत अबू बकर रजियल्लाहु अन्हु नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के क़रीबी दोस्त थे । अबू बकर रजियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि मैंने अच्छे अंदाज से उन लोगों को टाल दिया और खुद आपके घर पहुंच कर दरवाजे पर दस्तक दी । आप बाहर तशरीफ लाए, मुझे देखकर आपने इरशाद फरमाया - ए अबू बकर! मैं तुम्हारी और तमाम इंसानों की तरफ अल्लाह का रसूल बनाकर भेजा गया हूं , इसलिए अल्लाह ताला पर ईमान ले आओ _,"

आपकी बात सुनकर मैंने कहा:- आपके पास इस बात का सबूत है?

आपने मेरी बात सुनकर इरशाद फरमाया :- उस बूढ़े के वह शेर जो उसने आपको सुनाए थे।

यह सुनकर मैं हैरान रह गया और बोला :- मेरे दोस्त ! आपको उनके बारे में किसने बताया ?

आपने इरशाद फरमाया :-उस अज़ीम फरिश्ते ने जो मुझसे पहले भी तमाम नबियों के पास आता रहा है _,"

हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने अर्ज़ किया :- अपना हाथ लाइए , मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और यह कि आप अल्लाह के रसूल है _,"

★_आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम मेरे ईमान लाने पर बहुत खुश हुए ,मुझे सीने से लगाया। फिर कलमा पढ़कर मैं आपके पास से वापस आ गया।

मुसलमान होने के बाद हज़रत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने जो सबसे पहला काम किया वह था इस्लाम की तबलीग । उन्होंने अपने जानने वालों को इस्लाम का पैगाम दिया उन्हें अल्लाह और उसके रसूल की तरफ बुलाया चुनांचे उनकी तबलीग के नतीजे में हजरत उस्मान बिन अफ्फान रजियल्लाहु अन्हु मुसलमान हो गये । हजरत उस्मान रजियल्लाहु अन्हु के मुसलमान होने की खबर उनके चाचा हमक को हुई तो उसने उन्हें पकड़ लिया और कहा तू अपने बाप दादा के दीन  को छोड़कर मोहम्मद का दीन कुबूल करता है, अल्लाह की कसम मैं तुझे उस वक्त तक नहीं छोडूंगा जब तक कि तू इस दीन को नहीं छोड़ेगा ।

उसकी बात सुनकर हजरत उस्मान गनी रजियल्लाहु अन्हु ने फरमाया :- अल्लाह की कसम मैं इस दीन को कभी नहीं छोडूंगा ।

उनके चाचा ने जब उनकी पुख्तगी और साबित क़दमी देखी तो उन्हें धुंवें में खड़ा करके तकलीफ पहुंचाई , हज़रत उस्मान रजियल्लाहु अन्हु साबित क़दम रहे। उस्मान रजियल्लाहु अन्हु की फजी़लत में एक हदीस में आया है ,नबी करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम ने फरमाया :-

"_जन्नत में हर नबी का एक रफीक़ यानी साथी होता है और मेरे साथी वहां उस्मान बिन अफ्फान होंगे _,"

[

★__ हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने  इस्लाम की तबलीग ज़ारी रखी, आपकी कोशिश से हजरत उस्मान रजियल्लाहु अन्हु के बाद हजरत जु़बेर बिन आवाम रजियल्लाहु अन्हु भी मुसलमान हो गए उस वक्त उनकी उम्र 8 साल थी। इसी तरह हजरत अब्दुर्रहमान बिन औफ हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु की कोशिश से मुसलमान हुए , जाहिलियत के ज़माने में इनका नाम अब्दुल अल-का'बा था, नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने आपका नाम अब्दुर्रहमान रखा,  यह अब्दूर्रहमान बिन औफ रजियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि उमैया इब्ने खल्फ मेरा दोस्त था एक रोज़ उसने मुझसे कहा- तुमने उस नाम को छोड़ दिया जो तुम्हारे बाप ने रखा था ।

जवाब में मैंने कहा& हां छोड़ दिया ।

यह सुनकर वह बोला मैं रहमान को नहीं जानता इसलिए मैं तुम्हारा नाम अब्द इलाला रखता हूं ।चुनांचे मुशरिक उस रोज़ से मुझे अब्द इलाला कहकर पुकारने लगे।

★_ हजरत अब्दुर्रहमान बिन औफ रजियल्लाहु अन्हु अपने इस्लाम लाने का वाक़या इस तरह बयान करते हैं :-  मैं अक्सर यमन जाया करता था ,जब भी वहां जाता असकान बिन अवाकिफ हमीरी के मकान पर ठहरा करता था और जब भी उसके यहां जाता वह मुझसे पूछा करता था -क्या वह शख्स तुम लोगों ने ज़ाहिर हो गया है जिसकी शोहरत और चर्चे हैं ,क्या तुम्हारे दीन के मामले में किसी ने मुखालफत का ऐलान किया है ? मैं हमेशा यही कहा करता था कि नहीं , ऐसा कोई शख्स जा़हिर नहीं हुआ ।

यहां तक कि वह साल आ गया जिसमें नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम का ज़हूर हुआ , मैं उस साल यमन गया तो उसी के यहां ठहरा, उसने यही सवाल पूछा ,तब मैंने उसे बताया -हां उनका ज़हूर हो गया है उनकी मुखालफत भी हो रही है।

★_हजरत अब्दुर्रहमान बिन औफ के बारे में नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- तुम ज़मीन वालों में भी अमानत दार हो और आसमान वालों में भी ।"

★_हजरत अब्दुर्रहमान बिन औफ रजियल्लाहु अन्हु के बाद हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु ने हजरत साद बिन अबी वक़ास रजियल्लाहु अन्हु को भी इस्लाम की दावत दी, उन्होंने कोई हिचकिचाहट ज़ाहिर ना की फोरन हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के पास चले आए, आपसे आपके पैगाम के बारे में पूछा, आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने बताया तो यह उसी वक्त मुसलमान हो गए, उस वक्त उनकी उम्र 19 साल थी ।

यह बनी ज़ोहरा के खानदान से थे,  आपकी वाल्दा माजिदा आमना भी उस खानदान से थी इसलिए हजरत साद बिन अबी वका़स रजियल्लाहू अन्हु  हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलेही  वसल्लम के मामू कहलाते थे । आपने हजरत साद बिन वक़ास रजियल्लाहु अन्हु के लिए एक बार फरमाया :-

"_यह मेरे मामू हैं , हे कोई जिसके ऐसे मामू हो ! _,"

★__ हजरत साद बिन अबी वका़स रजियल्लाहु अन्हु जब इस्लाम लाएं और इनकी वाल्दा को इनके मुसलमान होने का पता चला तो यह बात उन्हें बहुत नागवार गुज़री । इधर यह अपनी वाल्दा के बहुत फरमाबरदार थे। वालदा ने इनसे कहा :-  क्या तुम यह नहीं समझते कि अल्लाह ताला ने तुम्हें अपने बड़ों की खातिरदारी और मां-बाप के साथ अच्छा मामला करने का हुक्म दिया है ।

हजरत साद रजियल्लाहु अन्हु ने जवाब दिया :-  हां बिल्कुल ऐसा ही है ।

यह जवाब सुनकर वाल्दा ने कहा:- बस तो खुदा की कसम मैं उस वक्त तक खाना नहीं खाऊंगी जब तक मुहम्मद के लाए हुए पैगाम को कुफ्र नहीं कहोगे और असाफ और नायला बुतों को जाकर छुओगे नहीं _,"

★_उस वक्त के मुशरिकीन का तरीक़ा यह था कि वह इन बुतों के खुले मुंह में खाना और शराब डाला करते थे । अब वालदा ने खाना पीना छोड़ दिया , हजरत साद रजियल्लाहु अन्हु ने अपनी वाल्दा से कहा :- खुदा की कसम मां तुम्हें नहीं मालूम अगर तुम्हारे पास 1000 जिंदगियां होती और वह सब एक-एक करके इस वजह से खत्म होती तब भी मैं नबी करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के दीन को हरगिज़ ना छोड़ता, इसलिए अब यह तुम्हारी मर्जी है खाओ या ना खाओ_,"

★_जब मां ने इनकी यह मजबूती देखी तो खाना शुरु कर दिया , ताहम उसने अब एक और काम किया दरवाज़े पर आ गई और चीख चीख कर कहने लगी :- क्या मुझे ऐसे मददगार नहीं मिल सकते जो साद के मामले में मेरी मदद करें ताकि मैं इसे घर में क़ैद कर दूं और क़ैद की हालत में यह मर जाए या अपने नए दीन को छोड़ दें ।

हजरत साद फरमाते हैं मैंने यह अल्फाज़ सुने तो मां से कहा- मैं तुम्हारे घर का रुख से भी नहीं करूंगा_"

★_इसके बाद हजरत साद रजियल्लाहु अन्हु कुछ दिन तक घर ना गए , वालदा तंग आ गई और उसने पैगाम भेजा- तुम घर आ जाओ दूसरों के मेहमान बन कर हमे शर्मिंदा ना करो।

चुनांचे यह घर चले आए अब घर वालों ने प्यार व मोहब्बत से समझाना शुरू किया,  वह इनके भाई आमिर की मिसाल देकर कहती :- देखो आमिर कितना अच्छा है उसने अपने बाप दादा का दीन नहीं छोड़ा ।

लेकिन फिर इनके भाई आमिर भी मुसलमान हो गए अब तो वालदा के गैज़ व गज़ब की इंतेहा ना रही ।

★__ मां ने दोनों भाइयों को बहुत तकालीफ पहुंचाई , आखिर आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु ने तंग आकर हबशा को हिजरत कर गए,  आमिर रज़ियल्लाहु अन्हू के हबशा हिजरत कर जाने से पहले एक रोज़ हजरत साद बिन अबी वका़स रजियल्लाहू अन्हु  घर आए तो देखा कि मां और आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु के चारों तरफ बहुत सारे लोग जमा हैं ।मैंने पूछा- लोग क्यों जमा है ?

लोगों ने बताया -यह देखो तुम्हारी मां ने तुम्हारे भाई को पकड़ रखा है और अल्लाह से अहद कर रही है कि जब तक आमिर बे-दीनी नहीं छोड़ेगा उस वक्त तक यह ना तो खजूर के साए में बैठेगी और खाना खाएगी और ना पानी पिएगी _,

हजरत साद बिन अबी वका़स रजियल्लाहू अन्हु ने यह सुनकर कहा:-  अल्लाह की क़सम !  तुम उस वक्त तक खजूर के साए में ना बैठो और उस वक्त तक कुछ ना खाओ पियो जब तक कि तुम जहन्नम का ईंधन ना बन जाओ ।"

★__ गर्ज़ उन्होने मां की कोई परवाह नहीं की और दीन पर डटे रहे । इसी तरह हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु की कोशिशों से हजरत तल्हा तयमी रज़ियल्लाहु अन्हु भी इस्लाम ले आए । हजरत अबू बकर सिद्दीक रजि अल्लाह इन्हें हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम की खिदमत में लाए , यह आपके हाथ पर मुसलमान हुए । इसके बाद हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु और हजरत तल्हा रजियल्लाहु अन्हु ने अपने इस्लाम लाने का खुल कर ऐलान कर दिया।  उनका एलान सुन कर नोफिल इब्ने उदविया ने इन्हें पकड़ लिया क्षय, उस शख्स को कुरेश का शेर कहा जाता था । उसने दोनों को एक ही रस्सी से बांध दिया, उसकी इस हरकत पर उनके कबीले बनू तमीम ने भी इन्हें ना बचाया । अब चुंकी नोफिल दोनों को एक ही रस्सी से बांधा था और दोनों के जिस्म आपस में बिल्कुल मिले हुए थे इसलिए इन्हें क़रीनीन कहा जाने लगा यानी मिले हुए ।

नोफिल बिन उदविया के जुल्म की वजह से नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम फरमाया करते थे - अल्लाह इब्ने उदविया के शर से हमें बचा _,"

★_हजरत तल्हा रजियल्लाहु अन्हु अपने इस्लाम कुबूल कर लेने का सबब इस तरह बयान करते हैं :-

"_  मैं एक मर्तबा बसरा के बाज़ार में गया , मैंने वहां एक राहिब को देखा , वह अपनी खानकाह में खड़ा था और लोगों से कह रहा था :- इस मर्तबा हज  से आने वालों से पूछो क्या इनमें कोई हरम का बाशिंदा भी है ।

मैंने आगे बढ़ कर कहा- मैं हूं हरम का रहने वाला ।

मेरा जुमला सुनकर उसने कहा- क्या अहमद का ज़हूर हो गया है?

मैंने पूछा -अहमद कौन?

तब उस राहिब ने कहा- अहमद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब... यह उसका महीना है, वह इस महीने में ज़ाहिर होगा ,वह आखरी नबी है , उसके ज़ाहिर होने की जगह हरम है और उसकी हिजरत की जगह वो इलाका़ है जहां बागात हैं सब्ज़ा जा़र है इसलिए तुम पर ज़रूरी है कि तुम उस नबी की तरफ बढ़ने में पहल करो _,"

उस राहिब की बात मेरे दिल में नक्श कर गई। मैं तेजी के साथ वहां से वापस रवाना हुआ और मक्का पहुंचा ।

★_यहां पहुंचकर मैंने लोगों से पूछा :- क्या कोई नया वाक़्या पेश आया है ?

लोगों ने बताया -हां मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह अमीन ने लोगों को अल्लाह की तरफ दावत देना शुरू की है,  अबू बकर ने उनकी पैरवी क़ुबूल कर ली है _,"

मैं यह सुनते ही घर से निकला और अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु के पास पहुंच गया। मैंने उन्हें राहिब की सारी बात सुना दी। सारी बात सुनकर हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम की खिदमत में गये और आपको यह पूरा वाक़या सुनाया । आप सुनकर बहुत खुश हुए, उसी वक्त में भी मुसलमान हो गया ।

यह हजरत तल्हा रजियल्लाहु अन्हु अशरा मुबश्शरा में से हैं यानी जिन सहाबा किराम रजियल्लाहु अन्हुम को नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने दुनिया ही में जन्नत की बशारत दी, उनमें से एक हैं।

 

★__ इसी तरह हजरत अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु की कोशिश से जिन सहाबा किराम रजियल्लाहु अन्हुम ने कलमा पढ़ा उनमें से पांच अशरा मुबश्शरा में शामिल हैं ।वह यह है -हजरत जु़बेर, हजरत उस्मान, हजरत तल्हा, हजरत अब्दुर्रहमान, हजरत साद बिन अबी वका़स रजियल्लाहू अन्हुम , बाज़ ने इनमें छठे सहाबी का भी इज़ाफ़ा किया है ,वह है -हजरत अबू उबैदा बिन जर्राह रज़ियल्लाहु अन्हु।

★_इन हजरत में हजरत अबू बकर, हजरत उस्मान, हजरत अब्दुर्रहमान और हजरत तल्हा रजियल्लाहु अन्हुम कपड़े के ताजिर थे । हजरत जु़बेर रजियल्लाहु अन्हु जानवर ज़िबह करते थे और हजरत साद रजियल्लाहु अन्हु तीर बनाने का काम करते थे।

★__ इनके बाद हजरत अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रज़ियल्लाहु अन्हु ईमान लाए, वह अपने इस्लाम लाने का वाकि़या यूं बयान करते हैं :- 

"_ मैं एक दिन उक़बा बिन अबी मुईत के खानदान की बकरियां चरा रहा था उस वक्त रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम वहां आ गए अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु भी आपके साथ थे । आपने पूछा- क्या तुम्हारे पास दूध है ?

मैंने कहा -जी हां , लेकिन मैं तो अमीन हूं ( यानी यह दूध तो अमानत है)

आपने फरमाया - क्या तुम्हारे पास कोई ऐसी बकरी है जिसने अभी कोई बच्चा ना दिया हो? 

मैंने कहा -जी हां , एक ऐसी बकरी है। 

मैं उस बकरे को आपके क़रीब ले आया उसके अभी थन पूरी तरह नहीं निकले थे । आपने उसके थन की जगह पर हाथ फैरा, उसी वक्त उस बकरी के थन दूध से भर गए _,"

"_ यह वाक्य दूसरी रिवायत में यूं बयान हुआ है कि उस बकरी के थन सूख चुके थे आपने उन पर हाथ फेरा तो वह दूध से भर गए।

★_ हजरत अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रजियल्लाहू अन्हू यह देखकर हैरान रह गए । वह आपको एक साफ पत्थर पर ले आए । वहां बैठकर आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने बकरी का दूध दोहा । आपने दूध अबू बकर सिद्दीक रजियल्लाहु अन्हु को पिलाया, फिर मुझे पिलाया और आखिर में आपने खुद पिया । फिर आपने बकरी के थन से फरमाया - सिमट जा _",

चुनांचे थन फौरन ही फिर वैसे हो गए जैसे पहले थे।

★__ हजरत अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रजियल्लाहू अन्हू फरमाते हैं -जब मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम का यह मोज्जा़ देखा तो आपसे अर्ज किया :- ऐ अल्लाह के रसूल ! मुझे इसकी हकीकत बताएं ।

आपने मेरी बात सुनकर मेरे सर पर हाथ फेरा और फरमाया :- अल्लाह तुम पर रहम फरमाए तुम तो जानकार हो ।

★_यह अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद बाप की बजाय मां की तरफ से ज्यादा मशहूर थे , इनकी मां का नाम उम्मेअब्द था । इनका क़द बहुत छोटा था, निहायत दुबले पतले थे । एक मर्तबा सहाबा इन पर हंसने लगे तो आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया :- 

"_ अब्दुल्लाह अपने मर्तबे के लिहाज़ से तराजू में सबसे भारी हैं।"

इन्हीं के बारे में नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया था :- 

"_अपनी उम्मत के लिए मैं भी उसी चीज़ पर राज़ी हो गया जिस पर इब्ने उम्मे अब्द यानी अब्दुल्लाह इब्ने मस'ऊद राज़ी हो गए और जिस चीज को अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद ने उम्मत के लिए नागवार समझा मैंने भी उसको नागवार समझा _,"

★_ आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम इनकी बहुत इज्ज़त करते थे , इन्हें अपने क़रीब बिठाया करते थे , इनसे किसी को छुपाया नहीं करते थे। इसीलिए यह आपके घर में आते जाते थे। यह नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के आगे आगे या साथ-साथ चला करते थे । आप जब गुस्ल फरमाते तो यही पर्दे के लिए चादर तान कर खड़े होते थे,  आप जब सो जाते तो यही आपको वक्त पर जगाया करते थे। इसी तरह जब आप कहीं  जाने के लिए खड़े होते थे तो हजरत अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रजियल्लाहू अन्हू आपको जूते पहनाते थे, फिर जब कहीं पहुंच कर बैठ जाते तो यह आपके जूते उठाकर अपने हाथ में ले लिया करते थे। इनकी इन्हीं बातों की वजह से बाज़ सहाबा किराम रजियल्लाहु अन्हुम मैं मशहूर था कि यह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के घराने वालों में से हैं। 

इन्हें आप सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम ने जन्नत की बशारत दी थी।

★_हजरत अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रजियल्लाहु अन्हु फरमाते थे :-  दुनिया तमाम की तमाम गमों की पूंजी है इसमें अगर कोई खुशी है तो वह सिर्फ वक्ति फायदे के तौर पर है।

★__ हजरत अब्दुल्लाह बिन मस'ऊद रजियल्लाहू अन्हू के बाद हजरत अबुज़र गफारी रज़ियल्लाहु अन्हु ईमान लाए, हजरत अबूज़र गफारी रज़ियल्लाहु अन्हु अपने इस्लाम लाने का वाक़या बयान करते हुए फरमाते हैं :- आन हज़रत सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम पर वही आने से 3 साल पहले से मैं अल्लाह ताला के लिए नमाज़ पढ़ा करता था और जिस तरफ अल्लाह ताला मेरा रूख कर देते मैं उसी तरफ चल पडता था, उसी ज़माने में हमें मालूम हुआ कि मक्का में एक शख्स जाहिर हुआ है उसका दावा है कि वह नबी है। यह सुनकर मैंने अपने भाई अनीस से कहा- तुम उस शख्स के पास जाओ उससे बातचीत करो और आकर मुझे उस बातचीत के बारे में बताओ।

★_चुनांचे अनीस ने नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से मुलाकात की । जब वह वापस आए तो मैंने उनसे आप सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम के बारे में पूछा उन्होंने बताया :-  अल्लाह की कसम मैं एक ऐसे शख्स के पास आ रहा हूं जो अच्छाइयों का हुक्म देता है और बुराइयों से रोकता है ।

और एक रिवायत में है कि मैंने तुम्हें उसी शख्स के दीन पर पाया है , उसका दावा है कि उसे अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है मैंने उस शख्स को देखा है कि वह नेकी और बुलंद अखलाक़ की तालीम देता है _,"

मैंने पूछा-  लोग उसके बारे में क्या कहते हैं ? 

अनीस ने बताया - लोग उसके बारे में कहते हैं कि यह काहिन और जादूगर है ,मगर अल्लाह की क़सम वह शख्स सच्चा है और वह लोग झूठे हैं ।

यह तमाम बातें सुनकर मैंने कहा- बस काफी है मैं खुद जाकर उनसे मिलता हूं _,"

अनीस ने फौरन कहा- ज़रूर जाकर मिलो मगर मक्का वालों से बच कर रहना_,"

★_चुनांचे मैंने अपने मोजे़ पहने लाठी हाथ में ली और रवाना हो गया । जब मैं मक्का पहुंचा तो मैंने लोगों के सामने ऐसा जाहिर किया जैसे मैं उस शख्स को जानता ही नहीं और उसके बारे में पूछना भी पसंद नहीं करता । मैं एक माह तक मस्जिद ए हराम में ठहरा रहा। मेरे पास सिवाय जमजम के खाने को कुछ नहीं था इसके बावजूद में जमजम की बरकत से मोटा हो गया,  मेरे पेट की सिलवटें खत्म हो गई ,मुझे भूख का बिल्कुल एहसास नहीं होता था।  एक रोज़ जब हरम में कोई तवाफ करने वाला नहीं था अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम एक साथी (अबू बकर रजियल्लाहु अन्हु ) के साथ वहां आए और बैतुल्लाह का तवाफ करने लगे । इसके बाद आपने और आपके साथी ने नमाज़ पढ़ी । जब आप नमाज से फारिग हो गए तब मैं आपके नज़दीक चला गया और बोला :-

"_  अस्सलामु अलैकुम या रसूलल्लाह , मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह ताला के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और यह कि मुहम्मद सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम अल्लाह के रसूल हैं।

 ★__ मैंने महसूस किया हुजूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलेही वसल्लम के चेहरे पर खुशी के आसार नमूदार हो गए फिर आपने मुझसे पूछा -तुम कौन हो?

 मैंने जवाब में कहा- जी मैं गफार कबीले का हूं ।  

आपने पूछा- यहां कब से आए हो? 

मैंने अर्ज़ किया -30 दिन और 30 रातों से यहां हूं। 

आपने पूछा- तुम्हें खाना कौन खिलाता है ?

मैंने अर्ज़ किया -मेरे पास सिवाय जमजम के कोई खाना नहीं इसको पी पीकर मोटा हो गया हूं यहां तक कि मेरे पेट की सिलवटें तक खत्म हो गई है और मुझे भूख का बिल्कुल एहसास नहीं ह