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     *вɪѕмɪʟʟαнɪʀʀαнмαռɪʀʀαнɪм*
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*☝🏻_कार गुज़ारियां (दावत तबलीग ) _☝🏻*                      
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                  *✧_पोस्ट -01_✧*

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*❈_हज़रत मौलाना इलियास साहब रह. की फ़िक्र ए उम्मत -1,*

*★_ अल्लाह ताला ने मौलाना इलियास रह. के ज़रिए एक हज़ार साल से ज़्यादा तवील मुद्दत गुज़रने के बाद इज्तिमाई तौर पर दावत वाले काम को शुरू कराया, इसके सबूत सहाबा, ताबईन, तबा ताबईन और हारून रशीद तक ​​मिलते हैं, इनके बाद इंफ्रादी तौर पर औलिया अल्लाह आते रहे और दीन की खिदमत करते रहे _,"*

*★_ मौलाना इलियास रह. के बारे में किताबो में लिखा है कि पहले पहल मौलाना इलियास रह. ने दीन की तड़प की वजह से मदरसे की बुनियाद डाली, वहां ये नतीजा निकला कि बाद में हाफिज भी डाढियां मुंडवाते है, इस वाक़िए से मौलाना के सीने में जो उम्मत का दर्द व गम था वो और बढ़ गया, फिर मौलाना ने खानका़ह खोली लेकिन उससे भी एक मखसूस तबका़ फैज़ाब हुआ,*

*★_ मौलाना मुस्तक़िल इस फ़िक्र में लगे रहे कि किस तरह सारे जहां में दीन ए इस्लाम का बोलबाला हो जाए, अल्लाह ताला को मौलाना की ये फ़िक्र पसंद आई, चुनांचे जब आप मदीना मुनव्वरा पहुंचे तो ख्वाब में दौराने दुआ आपसे कहा गया, ऐ मोलवी इलियास! हम तुमसे (दीन का) काम लेंगे, चुनांचे मौलाना बड़े बड़े मुफ्तियों के पास गए, उन्होंने कहा जब आपसे कहा गया है कि हम आपसे काम लेंगे तो कहने वाला खुद ले लेगा, आपको फिक्र करने की ज़रूरत नहीं, चुनांचे अल्लाह ताला ने आपके ज़रिए जमातों को सहाबा की तरह दर दर फिरने की सुन्नत दोबारा ज़ारी करवाई _,"*

*★_ मौलाना इलियास रह. ने दावत का काम जो शुरू किया था उसको शुरू करने से पहले आपने मदीना मुनव्वरा में हज़रत सैय्यदा फातिमा बतूल रजियल्लाहु अन्हा के हुजरा मुबारक में इस्ताखरा फरमाया, तीन दिन तक हुजरे में रहे, वहीं रो रोकर दुवाएं की, तो हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ियारत हुई, आका़ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया - इलियास! जा कर मेवातियों में और गरीबों में काम कर, इंशा अल्लाह पूरी उम्मत इस काम में लग जाएगी, इलियास! तेरी ये मेहनत क़यामत तक जारी रहेगी _,"
                   
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                  *✧_पोस्ट -02_✧*

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*❈… मौलाना इलयास साहब रह. की फ़िक्र ए उम्मत-2,*

*★_ मौलाना इलियास रह. ने फरमाया - मैंने शुरू में मदरसा पढ़ाया (यानी मदरसे में दर्स दिया) तो तलबा का हुजूम हुआ, अच्छे अच्छे साहिबे इस्तेदाद तलबा कसरत से आने लगे, मैंने सोचा कि इनके साथ मेरी मेहनत का नतीजा इसके सिवा क्या होगा कि जो लोग आलिम बनने ही के लिए मदरसो में आते हैं, मुझसे पढ़ने के बाद भी मोलवी ही बन जाएंगे और फिर उनके मशागिल भी वही होंगे जो आजकल आम तौर से अख्तियार किए जाते हैं, कोई तिब पढ़ कर मुतलब करेगा, कोई यूनिवर्सिटी का इम्तेहान दे कर स्कूल कॉलेज में नोकरी करेगा, कोई मदरसे में बेठ कर पढ़ाता ही रहेगा, इससे ज़्यादा और कुछ न होगा, ये सोच कर मदरसे में पढ़ाने से मेरा दिल हट गया,*

*★_ इस्के बाद एक वक्त आया जब मेरे हज़रत ने मुझे इजाज़त दे दी थी तो मैंने तालिबीन को ज़िक्र की तलक़ीन शुरू की और इधर मेरी तवज्जो ज़्यादा हुई, अल्लाह का करना, आने वालों पर इतनी जल्दी कैफियत और अहवाल का वरुद शुरू हुआ और इतनी तेज़ी से हालात में तरकी हुई कि खुद मुझे हैरत ​​हुई और मैं सोचने लगा कि ये क्या हो रहा है और इस काम में लगे रहने का नतीजा क्या निकलेगा ? ज़्यादा से ज़्यादा यही कि कुछ असहाबे अहवाल और ज़ाकिर और शागिल लोग पैदा हो जाएंगे,*
 .
*★_ फिर लोगो में इनकी शोहरत हो जाएगी तो कोई मुकदमा जीतने की दुआ के लिए आए, कोई औलाद के लिए तावीज़ की दरख्वास्त करे, कोई तिजारत और करोबार में तरक्की की दुआ करेगा और ज़्यादा से ज़्यादा ये कि इनके जरिए भी आगे को चंद तालिबीन में ज़िक्र व तलक़ीन का सिलसिला चले,*

*★_ ये सोच कर इधर से भी मेरी तवज्जो हट गई और मैंने तैय किया कि अल्लाह ता'ला ने जाहिर व बातिन की जो कु़व्वते अता फरमाई है उनका सही मसरफ ये है कि इनको उस काम में लगाया जाए जिसमे हुजूर ﷺ ने अपनी कुव्वतें सर्फ फरमाई, और वो काम है अल्लाह के बंदो को और खास कर गाफिलों और बेतलबो को अल्लाह की तरफ लाना और अल्लाह की बातो को फरोग देने के लिए जान को बे क़ीमत करने का रिवाज देना _,"*

*★_ बस यही हमारी तहरीक है और यही हम सबसे कहते हैं ये काम अगर होने लगे तो अब से हज़ारों गुना ज़्यादा मदरसे और हज़ारों गुना ज़्यादा खानकाहे क़ा'यम हो जाएं बल्की हर मुसलमान मदरसा और ख़ानक़ाह हो जाए"**                      
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                  *✧_पोस्ट -03_✧*

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*❈__ सबसे पहले निकलने वाली जमात:-*

*★_ सबसे पहले 8 आदमियों ने बड़ी मुश्किल से 3 दिन या 8 दिन के लिए अपना नाम दिया और मौलाना मुहम्मद इलियास साहब खुद उसके अमीर और मुअल्लिम बने,।*

*★_ अपने साथ आपने एक क़ारी भी ले लिया और सारे रास्ते मौलाना अपने हमराहियों को आदाबे मस्जिद बतलाते हुए और कलमा ईमान की बातें सिखलाते हुए और 24 घंटे की ईमानी व इस्लामी ज़िंदगी समझाते हुए मस्जिद में ले गए,*

*★_ वहां आपने गश्त का अमल करवाया और बे नमाज़ियो को बड़ी खुशामद दर आमद और बड़ी मन्नत समाजत के साथ यहां तक ​​कि अपनी पगड़ियां उनके पांव में रख कर मस्जिद में ले कर आए*

*★_ इस तरह आपने ये दावत वाला काम शुरू किया _,"*

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                  *✧_पोस्ट -04_✧*

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*❈_ हजरत जी मौलाना युसूफ कांधलवी रह. की तबलीगी मेहनत:-*

*★_ हजरत जी मौलाना मुहम्मद युसूफ कांधलवी रह. के एक रफ़ीक़ ए खास बयान करते हैं कि हज़रत जी "भोपाल" तशरीफ़ लाए और आदात के मुताबिक़ इज्तिमा में तकरीरें भी फ़रमाईं, आपके ज़ख्म था जिसकी तकलीफ़ काफ़ी बढ़ गई थी,*

*★_ भोपाल से फारिग होने के बाद वहां से 40-50 मील के फासले पर एक और इज्तिमा तय था, हज़रत जी मौलाना वहां भी तशरीफ ले गए लेकिन तय ये हुआ कि मौलाना तक़रीर नहीं फरमायेंगे बल्की फलां साथी की तक़रीर होगी, मगर साथी की तक़रीर के बाद मौलाना को अहसास हुआ कि दावत क़ुव्वत के साथ नहीं दी जा सकी, लिहाज़ा अपने अंदरूनी जज़्बे से मगलूब हो कर खुद तक़रीर के लिए इसरार फरमाया,*

*★_ हालत ये थी कि बैठने के लायक़ भी नहीं थे, चुनांचे लेट कर बोलना शुरू किया, इधर ज़ख्म की ये हालत हुई कि उसमे से खून जारी हो गया, एक कपड़ा लगा दिया जाता जब वो बिलकुल तर हो जाता तो दूसरा कपड़ा लगा दिया जाता, इस तरह कई कपड़े खून से भर गए और मौलाना ने आदत के मुताबिक़ पूरी तक़रीर फरमाई _,"*

*★_ अंदाजा ये है कि उस तक़रीर के दौरान आधा सेर खून हजरत जी के जिस्म से निकल गया होगा मगर अल्लाह के उस बंदे को कुछ पता न था कि क्या हो रहा है _,"*

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                  *✧_पोस्ट -05_✧*

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*❈_ एक दूसरे भाई ने एक जलसे की रुएदाद इस तरह बयान की कि- बरसात का मौसम था, पंडाल बस्ती से बाहर लगा हुआ था, एक जोरदार झोका आया जिससे सारे शामयाने उखड़ कर रह गए, हजरत जी मौलाना युसूफ रह. की तक़रीर होने वाली थी और मजमा सुनने के लिए बेताब था, हज़रत जी मौलाना तशरीफ़ लाए और ख़ुतबा शूरू किया, यकायक एक तरफ़ से बादल उठा और ज़ोर से बारिश शुरू हो गई, बारिश तूफ़ान की तरह आई और तूफ़ान की तरह बरसी, लोगों का ठहरना मुश्किल हो गया,*

*★_ मगर मौलाना पहाड़ की तरह अपनी जगह पर जमे रहे और लोगों को पुकार पुकार कर बुलाते और अपने मखसूस अंदाज में फरमाते कि कागज़ के नहीं हो कि गल जाओगे और मिट्टी के नहीं हो कि पिघल जाओगे, हजरतजी इनामुल हसन साहब छतरी ले कर आए तो हज़रत जी मौलाना ने रोक दिया और फरमाया कि क्या हम अपने कामों के लिए रोज़ाना लाइनों में खड़े हो कर या खेतों में हल चलाते हुए नहीं भीगते हैं? अपने लिए नहीं भीग रहा हूं अल्लाह के लिए भीग रहा हूं, मेरा ये भीगना कल क़यामत में काम आएगा _,"*

*★_ हज़रत जी मौलाना का ये सब्र व इस्तक़लाल और दावत के लिए ये क़ुर्बानी देख कर मखलूक़े खुदा ढ़ाढ़े मार मार कर रोने लगी और आपस में लोग कहने लगे:- बताओ भाई इस शख्स को क्या लालच है? और मजमे का ये हाल था कि और चला आ रहा था, जिस्म और कपड़े बारिश से तर थे और आंखें आंसुओं से तर, मौलाना की ढाडी से पानी बह कर गिर रहा था और लोगो के कदमो से परनाले चल रहे थे,*

*★_ एक भी शख्स ऐसा नहीं था जो हज़रत जी को इस हाल में छोड़ कर अपने घर की राह लेता, लोग मौलाना की तक़रीर हमातन गोश हो कर सुन रहे थे और रोने की आवाज़ों से फिज़ा गूंज रही थी, बारिश बराबर तेज़ हो रही थी, मगर हज़रत जी मौलाना इस आलम में भी जोश वलवला और तसलसुल से तक़रीर फरमा रहे थे, काई घंटे की तक़रीर इसी तरह होती रही और मजमे ने सब्र व सुकून और ज़ोक व शोक से सुनी _,"*                   
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                  *✧_पोस्ट -06_✧*

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*❈…_ यही साथी एक और वाक़िआ सुनाते हैं: - गर्मी का मौसम था, मेवात के एक गांव में इज्तिमा था, धूप काफ़ी तेज़ थी, यूं भी मेवात की धूप दूसरे मक़ामात से ज़्यादा तेज़ होती है, हज़रत जी मौलाना का लोग शिद्दत से इंतज़ार कर रहे थे, दोपहर के वक्त मौलाना पहूंचे, ये 12 बजे का वक्त था, ईदगाह में मजमा इकट्ठा हो गया, मौलाना की तक़रीर शुरू हो गई,*

*★_ मौसम की तेज़ी और धूप की सख्ती की वजह से पसीना पानी की तरह बह रहा था, असल इज्तिमा गाह फासले पर थी, इसलिये मौलाना ने मजमे को देख कर ईदगाह ही में तक़रीर शुरू कर दी, मौलाना के एक रफीक़े खास छतरी ले कर आए और मौलाना के लगा दी, हज़रत जी मौलाना ने छतरी हटा दी और फरमाया बैठ कर बात सुनो, क़यामत की धूप इस धूप से कहीं ज़्यादा सख़्त होगी _,"*
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                  *✧_पोस्ट -07_✧*

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*❈…_तक़सीम ए हिंद के बाद मशरिक़ी पंजाब में कुर्ब व बाला से गुज़रने वाली जमा'त की अनोखी कारगुज़ारी :-1,*

*★_ अगस्त 1947 तक़सीमे हिन्द के बाद बहुत से मुसलमान मशरिकी़ पंजाब की रियासतो में मुर्तद हो गए थे, जब हजरत जी मौलाना मुहम्मद यूसुफ साहब को हालात का इल्म हुआ तो सख़्त सदमा हुआ, आप मार्च 1950 में तबलीगी मरकज़ निज़ामुद्दीन में लगातर 8 दिन तक इस मोजू पर बयान फरमाते रहे और तरगीब देते रहे कि मुझे चिल्ला तीन चिल्ला नहीं चाहिए बल्की ऐसे आदमियों की जरूरत है जो या तो मर जाएं (यानि अल्लाह के रास्ते में अपनी जान दे दें) या मशरिकी़ पंजाब के मुर्तदो को दोबारा इस्लाम में ले आए, अब जितना वक्त भी लग जाए .. वक्त की क़ैद नहीं,*

*★_ चुनांचे इस मुतालबे पर 22 आदमियों ने नाम पेश किए और आपका मुतालबा मंजूर कर लिया और वादा किया कि इंशा अल्लाह तआला हम आपके फरमान के मुताबिक़ जान दे देंगे या मशरिकी़ पंजाब के मुर्तदों को मेहनत करके दोबारा ईमान में ले आएंगे, चुनांचे इन 22 अहबाब की 2 जमाते 11-11 अफराद पर मुश्तमिल की गई, एक जमात के अमीर मुहम्मद इक़बाल साहब और दूसरी जमात के अमीर हाजी कमालुद्दीन साहब सहारनपुर वालों को बनाया,*

*★_हजरत जी मौलाना मुहम्मद युसूफ साहब रह. ने नंगे पांव मस्जिद से बाहर निकल कर खूब रो रो कर दुआ की और दोनो जमातो को रुखसत करते वक्त फरमाया कि जमातें पानीपत पहुंच कर मौलाना बकाउल्लाह साहब के मशवरे से काम शुरू करें,*

*★_ जब ये दोनो जमाते पानीपत मौलाना बका़उल्लाह साहब के पास पहुँची तो मौलाना जमातो को देख कर कहने लगे तुम यहाँ केसे आ गए ? तुम हमको मरवाओगे, जमात के अहबाब को बुरा भला कहा और मस्जिद के अंदर जमातो को ठहरने ना दिया और बाहर निकला दिया, जमात के साथी बा अम्र मजबूरी शहर से बाहर निकल गए और एक वीरान मस्जिद मे जो इमाम साहब की मस्जिद के नाम से मशहूर थी में ठहर गए,*

*★_ इन दोनों जमातों ने मशवारा करके प्रोग्राम बनाया कि यहां से दोनो जमाते अलग अलग रुख पर एक हफ्ता काम करके चिल्लापुर के मुका़म पर इकट्ठी हो जाएं, चुनाचे प्रोग्राम के मुताबिक ये जमाते काम करती हुई मुकर्रर वक्त पर चिल्लापुर पहुंच गई,*

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                  *✧_पोस्ट -08_✧*

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*❈_यहां पर 5 मस्जिदें थी और 12 घर मुसलमानो के थे जो सबके सब मुर्तद हो चुके थे, हमने उनसे बात की तरगीब दे कर उनको दोबारा ईमान लाने की दावत दी तो उनमे से एक आदमी बतौर रहबर के साथ हो गया और हमें दूसरे देहातों में ले गया,*

*★_ एक गाँव में 10-12 आदमी छुप कर नमाज़ पढ़ते थे बाक़ी सबके सब मुर्तद हो चुके थे, हमने उनको दावत दी, उनमे दो इमामे मस्जिद भी थे, जिन्होन डाढ़ियां मुंडवा ली थी, हमने उस इलाक़े में एक हफ्ता काम किया और यहां से हमारी जमाते रियासत जैद में चली गई, रियासत जैद में दस मस्जिदें थी और काफी तादाद मुसलमानों की थी, उनमे से अक्सर मुर्तद हो गए थे और बाक़ी छुप कर नमाज़ पढ़ते थे उनमे से पांच साथी हमारे साथ चले,*

*★_ उस जगह पर चार दिन काम किया बहुत से अहबाब ने अजा़न दे कर नमाज़ अदा करना शुरू कर दी, उस इलाक़े में ये बात मशहूर हुई, पुलिस को हमारी रिपोर्ट कर दी गई जिस पर पुलिस ने हमारे साथियो के साथ मार पीट की और अंबाला की जेल में डाल दिया,*

*★_ चोथे दिन हम तालीम कर रहे थे कि एक अफसर आया उसने हमें देखा तो दरियाफ्त किया कि तुम ये क्या कर रहे हो? हमने उसको अपनी तालीम का मक़सद समझाया मगर उसकी समझ में ना आया, उसने हमारे पास से तबलीगी निसाब की किताब ले ली, थोड़ी देर पढ़ता रहा और कहने लगा कि जब में इंक़लाब से पहले मुल्तान में था तो हमारे बच्चों को जब कोई तकलीफ हो जाती तो हम उनको मुसलमानों के पास ले जाते जो कि तुम्हारी तरह के थे, तुम भी उन्हीं में से मालूम होते हो, वो लोग अल्लाह का कलाम पढ़ कर दम कर दिया करते थे तो हमारे बच्चों को आराम आ जाता था, वो बहुत ही अच्छे लोग थे, मुझे उनसे मुहब्बत हो गई थी _,"*

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                  *✧_पोस्ट -09_✧*

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*❈_ अगर तुम्हें किसी क़िस्म की तकलीफ़ हो तो मैं तुम्हारी मदद करने को तैयार हूं, हमने कहा हमें तंग कोठरी में बंद किया हुआ है और हमसे कैदियों का पाखाना उठवाया जा रहा है जिससे हमारे कपड़े नापाक हो जाते है, नीज़ तीन दिन हमें फाका़ करते हो गए हैं, इस पर उसने जेल के जिम्मेदार अफसरों को बुलाया और हुक्म दिया कि फोरन इन्हें बड़ा कमरा दिया जाए और पाखाना वगेरा बिलकुल न उठवाया जाए और इनका राशन जारी किया जाए, आज के बाद इन्हें कोई तकलीफ ना दी जाए, ये हुक्म दे कर हम सबसे मुसाफा करके चला गया,*

*★_ अल्लाह पाक ने हमारी गैबी मदद फरमाई और इसके बाद जेल में हमें काफ़ी आसानी हो गई, हम अज़ान दे कर नमाज़ पढ़ने लगे, तलाश करने पर मालूम हुआ कि जेल में 250 मुसलमान क़ैदी और भी हैं, हमने उनको दावत दी तो उनमे से क़रीबन 80 आदमी हमारे साथ नमाज़ पढ़ने लग गए और तालीम में अक्सर उनमे से शामिल होने लगे, इसी तरह उस जेल के अंदर हमारे 18 दिन गुज़र गए फिर हमें जेल से रिहा कर दिया गया*

*★_ जेल से रिहा हो कर हम रियासत बुढिया में चले गए, उस जगह के हालात भी बहुत खराब थे जिसकी वजह से हमारे साथी मय दोनों जमातों के अमीर सहबान के छुप कर निकल गए, बाकी 11 साथी रह गए, जब हमें पता चला कि 11 साथी जा चुके हैं तो बाक़ी साथियो को बड़ा दुख हुआ, मगर अल्लाह पाक ने हमारी मदद की और वो वादा जो कि हजरत जी रह. के साथ किया था याद दिलाया जिसकी वजह से तमाम साथियों के हौसले बुलंद हो गए और काम करने का अहद किया,*

*★_ रियासत बुढिया में मौलाना अब्दुल करीम साहब थे, हम सब साथी उनके पास गए और उनकी खिदमत में अर्ज़ करके दरख्वास्त की कि आप हमारी कारगुज़ारी अपनी मार्फत निजामुद्दीन मरकज़ में हज़रत जी मौलाना मुहम्मद यूसुफ साहब रह. की खिदमत में रवाना फरमा दें, जिसमे हमने हज़रत जी की ख़िदमत में ये भी अर्ज़ किया था कि अब हम किसको अमीर बनाएं ? और आइंदा काम कैसे करें ? इस पर हज़रत जी ने जवाब में फरमाया कि अमीर मुहम्मद सुलेमान मेवाती को बनाया जाए और मुक़ामी अहबाब को ज़्यादा तादाद में साथ ना रखा जाए और क़याम हर हाल में मस्जिद में रखा जाए ख्वाह मस्जिद आबाद हो या गैर आबाद हो, जमात को आगे बढ़ाया जाये,*            
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                  *✧_पोस्ट -10_✧*

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*❈…_निजामुद्दीन मरकज़ से जब ये पैगाम पहुंचा तो हमने यहां से अपना सफर शुरू किया, दस दिन मुख्तलिफ मुक़ामात पर काम करते हुए हम अरूकी पहुंच गए, उस जगह एक बहुत बड़ी मस्जिद थी जो वीरान पड़ी थी, हम उसमें ठहर गए, उस जगह पर पाकिस्तान से आए हुए सिख अबाद थे, जब उनको हमारा पता चला तो ये सिख बंदूके और राइफले ले कर आ गए,*

*★"_ हमने नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी और नमाज़ के अंदर ही रो रहे थे और मालिक हक़ीक़ी से दुआ माँंग रहे थे कि उन लोगों ने नमाज़ की हालत में बंदूको से गोलियां बरसानी शुरू कर दी, हर साथी के जिस्म में गोलिया चीर कर पार हो गईं थी, अल्लाह की शान खुद बा खुद बंदूक चलना बंद हो गई, हमारे साथियो में से कुछ बेहोश और कुछ होश में थे,*

*★"_ जब उन्होंने देखा कि बंदूको से फायर बंद हो गये है तो वो हमारे पास आए और कहने लगे कि तुम ये क्या मन्तर पड़ रहे हो कि हमारी बंदूक खुद बा खुद बंद हो गई है, हम फायर करना चाहते हैं मगर बंदूके नहीं चलती, हमने कहा हम ना कोई मन्तर पढ़ रहे हैं और ना हम कोई मंतर जानते हैं, हम तो मालिक का कलाम पढ़ रहे हैं जिसके क़ब्ज़े में हमारी जान है, वही जान का मुहाफ़िज़ है, मौत और ज़िन्दगी उसके कब्ज़े में है, हम उसकी इबादत करते हैं और उससे दुआ माँगते हैं, वही हमारा खालिक है, ये सुन कर वो सबके सब चले गए,*

*★_ हम सब साथियो ने कपड़े जला कर अपने ज़ख्मो को भरा और तमाम रात इसी हालत में गुजारी, सुबह दिन निकले पर वो ही सिख आए और अपने साथ एक डॉक्टर को लाए, उसने हमारे ज़ख्मों पर मरहम पट्टी की और एक बाल्टी भी लाए जिसमे दूध था और हम सबको दूध पिलाया और कहने लगे कि हमसे गलती हुई है, एक सिख हमारी रहबरी के लिए हमारे साथ चला, जो मुसलमानो को बुलाता और हमसे मिलवाता, बात करवाता, वो 5 दिन हमारे साथ रहा और पंजाबी ज़ुबान में 6 नंबर लिखे और याद भी किए, कलमा नमाज़ के मुताल्लिक़ हमसे पूछता रहा, उसके जाने के बाद हम उस इलाक़े में 5 दिन काम करते रहे,*
                          
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                  *✧_पोस्ट -11_✧*

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*❈_ यहां से हमारी जमात हज़राबाद की जामा मस्जिद में पहुंच गई, उस मस्जिद के एक हिस्से में हुकुमत ने महकमा घर क़ायम किया हुआ था, उस महकमा वालों ने हमारे नाम लिख लिए और पुलिस को इत्तेला कर दी, उनकी रिपोर्ट पर पुलिस आ गई और हम सबको गिरफ्तार कर लिया और हज़राबाद से बाहर एक हवेली में रखा जिसकी चार दीवारी थी और उसके अंदर एक कुंवा था, चुनांचे हमें हवेली के अंदर बंद कर के दरवाजे में ताले लगा दिए गए,*

*★_ जिस वक़्त हमें प्यास ने सताया तो उस कुंवे के अंदर हमने पानी निकाले के लिए बाल्टी डाली तो बाल्टी में गला सड़ा बदबुदार पानी आया, हमने मजबूरी में उससे प्यास बुझाई, 6 दिन के बाद पुलिस वालों ने हवेली का दरवाज़ा खोला तो हमें ज़िंदा देख कर हैरान रह गए, क्योंकि उनका गुमान था कि ये भुखे प्यासे मर जाएंगे और फिर इनको भी उसी कुंवे में फैंक देंगे,*

*★_ पुलिस वालों ने इर्द गिर्द के रहने वालों से पूछा कि तुममें से किसी ने हवेली का दरवाज़ा तो नहीं खोला? मालूम हुआ कि किसी ने भी नहीं खोला, उसके बाद हमें हवेली के अंदर से निकाला और कहने लगे कि हुकुमत का हुक्म है इसलिए हमने तुम्हें यहां बंद कर दिया था, हमने तुम्हारे अंदर कोई बुराई की बात नहीं देखी, अब तुम यहां से पहाड़ी नाहान के इलाक़े में चले जाओ,*

*★_ हम यहां से इलाक़े नाहान में आ गए, इस इलाक़े में हमने 15 दिन काम किया और मुर्तदो को दोबारा ईमान में दाखिल किया, इस इलाक़े के मुर्तदो की हमारी बातों से बड़ी हौसला अफजाई हुई और काफी तादाद में मुसलमान दोबारा ईमान में दाखिल हो गए, मगर उनमे जो मुनाफिक़ क़िस्म के लोग थे उन्होंने पुलिस को शिकायत कर दी,*

*★_ इस रिपोर्ट पर पुलिस आ गई और हम सबको गिरफ्तार कर के दरिया जमना के पुल मुक़ाम ताजे वाला पर ले गए, रास्ते में हमें मारते पीटते और गालियां देते रहे, जब हम मुका़म ताजे वाला के पुल पर पहुंच गए तो पुलिस ने हमारी तलाशी ली और पैसे वगेरा सब छीन लिए और हमारे कपड़े वगेरा सब उतार लिए और एक एक करके सबको पुल से दरिया में फैंकना शुरू कर दिया,*

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                  *✧_पोस्ट -12_✧*

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*❈….उस वक्त दरिया में ज़बरदस्त तुगयानी आई हुई थी, जब हमको दरिया में फैंका जाता तो पानी में गोता खाकर ऊपर आते तो सिवाए पानी और आसमान के कुछ नज़र न आता, हमारे सब साथी बहोश हो गए, हम उसी बहोशी की हालत में बहते चले जा रहे थे कि अल्लाह पाक की शान दरिया के अंदर एक बहुत बड़ा कीकर का दरख़्त पड़ा हुआ था, हम तमाम साथी उस दरख़्त में जा कर उलझ गए,*

*★_ जिस वक़्त हम दरख़्त में उलझे हुए थे, तो एक आवाज़ सुनाई दी कि कोई कह रहा है कि मेरा सुब्हान खान रह गया, जब ये आवाज़ कान में पड़ी तो देखा कि तमाम दरख़्त में उलझे पड़े हैं और ये आवाज़ हमारे एक साथी की थी जो बेहोशी की हालत में अपने बेटे के लिए कह रहा था, मैंने (मियां जी सुलेमान अमीरे जमात से) कहा कि यह वक्त अहलो अयाल को याद करने का नहीं बल्की उस जा़त पाक को याद करने का है जिसने हमें अब तक इन हालात में बचाया और ज़िंदा रखा _,"*

*★_ अब इस बात की दुआ करो कि अल्लाह पाक मौत दे तो ईमान पर दे और इस्लाम पर क़ायम रखे, और अगर उस पाक जा़त ने हमसे अपने दीन का काम लेना है तो अल्लाह पाक हमको अपना ज़रिया बना कर मशरिकी पंजाब के तमाम मुर्तदो को दोबारा ईमान की दौलत से नवाज़ देगा, ये हमारा ईमान व यक़ीन है, अल्लाह पाक हमारे साथ है, जिस जा़त ने अब तक बचाया, वो ही हमसे अपने दीन का काम लेगा, अब तुम दरख़्त का सहारा छोड़ो और अल्लाह के भरोसे पर दरिया के किनारे की तरफ चलो_,"*

*★_ ये बात हो रही थी कि दरिया के अंदर ज़बरदस्त लहर आई जो हम सबको बहा कर ले गई और वो दरख़्त भी दरिया की लहरों में बह गया, फिर हमें किसी का कोई पता न चला, अल्लाह पाक बेहतर जानते हैं कि उस जा़त ने किस तरह बचाया और हम सबको दरिया से निकाल कर खुश्क ज़मीन पर फैंक दिया,*

 *★_ हालात ये थे कि जिस जगह हम रेत पर पड़े थे वहां से दरिया का रुख दो तरफ को हो जाता है, यानी दरिया की एक शाख कहदरबाद की तरफ और दूसरी बिजनौर की तरफ जाती है, दर्मियान में खुश्क रेत है, इस जगह से आगे अब्दुल्लापुर के मुक़ाम पर एक पुल है, उस पुल के नीचे लोहे की जाली हुई है और यहां पुलिस की चौकी भी है और एक हॉस्पिटल भी है, अगर कोई लाश वगेरा बह कर आए तो उन जालियों से अटक जाए तो उसे निकाल लिया जाए और अगर कोई जिंदा बच जाए तो उसको हॉस्पिटल में दाखिल कर दिया जाए, चुनांचे जिस पुलिस ने हमें दरिया में फैंका था उसने अब्दुल्लापुर के मुकाम पर पुलिस को इत्तेला दे दी थी के हमने 11 मुसलमानों को दरिया के सुपुर्द कर दिया है उनकी लाशों को मत निकालना बल्कि आगे दरिया में बहा दिया जाए,* 

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                  *✧_पोस्ट -13_✧*

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*❈_ अल्लाह की शान कि हमें दरिया से निकाल कर पहले ही रेत पर डाल दिया था, दरिया के किनारे मछली पकड़ने वाले और धोबी कपडे धोने वाले मौजूद थे जो कि हमें देख कर दूर हट गए, जब सूरज की गर्मी से हमारे जिस्म गरम हुए तो होश आया, देखा कि हमारे आंख कान नाक में मिट्टी भरी हुई थी और हमारे तमाम साथियों के जिस्म अक्सर नंगे थे, हमने अपनी उंगलियों से अपने कान नाक और आंखों से मिट्टी निकाली और एक जगह सब इकट्ठे हो गए क्योंकि हम सब साथी एक मुरब्बा ज़मीन के फ़ासले से जगह जगह पड़े हुए थे,*

*★_ उस वक्त दिन के 12 बज चुके थे और जुमा का दिन था, हमें दरिया में जुमेरात को 12 बजे फेंका गया था गोया 24 घंटे हम पानी में रहे और हमारे जिस्मों पर ज़ख्मों के जो निशान थे वो पानी की वजह से सफेद हो गए थे, अल्लाह पाक ने गैबी मदद फरमाई कि हमारे एक साथी ने अपने कपड़ों की गठरी अपनी कमर से बांध रखी थी, खुदा की शान उसे पुलिस वालों ने कपडो की गठरी समेट दरिया में फैंक दिया था और गठरी बादस्तूर उसकी कमर पर बंधी हुई थी उसमें दो चादरे एक कुर्ता और एक पगड़ी थी,*

*★_ हम सब साथियों ने उन कपड़ो को फाड़ फाड़ कर अपने सतर ढांके और यहां से हज़राबाद की जामा मस्जिद में पहुंच गए, जुमा का दिन था उस मस्जिद में देहात के लोग जुमा की नमाज पढ़ने के लिए आए हुए थे, ये लोग हमें देख कर घबरा गए और मस्जिद के अंदर दाखिल न होने दिया,*

*★_ कहने लगे:- तुम कौन लोग हो? मगर हम ज़बरदस्ती मस्जिद में दाखिल हो गए और मस्जिद के अंदर एक कोने में बे्ठ कर ज़िक्र व अज़कार में मशगूल हो गए, उन लोगों ने उस पुलिस को इत्तेला दी जिसने हमें ताजे वाला मुक़ाम पर पुल से दरिया में फैंका था कि इस क़िस्म के 11 आदमी हैं और जामा माजिद हज़राबाद में मौजूद है,* 
                
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                  *✧_पोस्ट -14_✧*

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*❈_ थोड़ी देर के बाद पुलिस आ गई, उन्‍होंने मस्जिद में दाखिल हो कर तमाम मजमे को एक जगह इकट्ठा कर लिया, उनमे हम भी शामिल थे, इंस्‍पेक्‍टर करतार सिंह ने सबके सामने तमाम हालात बयान किये कि किस तरह हमको दरिया में डाला गया, कहने लगा कि हमने इनके साथ बड़े जुल्म किए थे, इन सबको नंगा करके दरिया में डाल दिया था ताकि ये खत्म हो जाएं और दरिया में डूब कर मर जाएं,*

*★_ अजीब माजरा है कि ये केसे बच गए? मालूम होता है कि इनके साथ कोई ज़बरदस्त ताक़त है जो इनको हर हाल में बचा रही है, आज हम भी उसी गैबी ताक़त पर जो इनकी मुहाफिज़ व निगाहबान है, ईमान लाते हैं और इस्लाम में दाखिल होते हैं, हमने इस मज़हब के अंदर खुली गैबी मदद देख ली है,*

*★_ हमने उनसे कहा कि हम सब अनपढ़ लोग हैं, हम खुद दीन सीखने के लिए निकले हैं, उस मजमे में पानीपत के इमाम मस्जिद और इलाक़े के ज़िम्मेदार मुहम्मद तकी़ साहब थे उन्होंने उनको गुस्ल दिलाकर कलमा पढ़ाया, उन्होंने हमसे कहा कि अब तुम बिल्कुल आज़ाद हो तुम पर आज से कोई पाबंदी नहीं है _,"*

*★_ उनके लिए हमारे लिए कपड़े मंगवाए और दूध मिठाई और खाना वगेरा खूब खिलाया, जिस वक्त हम खाने पर बेठे उस वक्त 6 बज चुके थे गोया 30 घंटे बाद अल्लाह तआला ने हमें खाना खिलाया और अपनी कुदरत से ये 30 घंटे का वक्त अपनी हिफाज़त में रख कर पूरा फरमाया, और हमारा ये अशरा बड़े एजाज व इकराम में गुज़रा, दूर दराज से मुस्लिम और गैर मुस्लिम हमारी जियारत को आते थे और दुआएं कराते थे, बहुत से मुर्तद खुद बा खुद ईमान में दाखिल हो गए, यहां से हमने अपनी कारगुज़ारी मरकज़ को रवाना की,*

*★_हजरत जी मौलाना मुहम्मद युसूफ साहब रह. ने मियां जी दीन मुहम्मद मर्चूनी साहब को रक़म वगेरा दे कर हमारे पास भेजा और फरमाया कि मियां जी के हमराह वापस निजामुद्दीन आ जाएं, चुनांचे साढे 6 माह का कमो बेश अरसा गुज़ार कर हम मियां जी के साथ मरकज निजामुद्दीन हजरत जी की खिदमत में पहुंच गए, हजरत जी ने तफसील से हमारी कारगुज़ारी सूनी और खूब दुआएं दी.''*

 *★_ नोट --(मज़कूरा बाला कारगुज़ारी जनाब मियां जी मुहम्मद सुलेमान साहब सायपनकी वाले जो उस वक्त इस मुजाहिद जमात के अमीर थे की बयान फरमूदा है और मुहतरम अलहाज लाड़ खान साहब की ज़ब्त व तहरीर है)*

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                  *✧_पोस्ट -15_✧*

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*❈…1951 में मशरिक़ी पंजाब में जाने वाली जमात की कारगुज़ारी:-*

*★_1951 में हजरत जी मौलाना मुहम्मद युसूफ रह. ने एक जमात देहली से सहारनपुर भेजी, इस जमात में बहुत से पुराने ज़िम्मेदार हज़रात भी शामिल थे, पहले ये जमात रायपुर को गई और हजरत मौलाना अब्दुल का़दिर रायपुरी रह. की खिदमत में हाजिर हुई,*

*★_हजरत रायपुरी रह. के खुद्दाम और मुतवल्लीन चुंकी मशरिकी़ व मगरिबी पंजाब में फेले हुए थे और सब पर मशरिकी पंजाब की तबाही का बड़ा असर था और ये मुतास्सिरीन हजरत रायपुरी की खिदमत में बराबर आते जाते रहते थे, इसलिये हजरत की मजलिस में तज़किरा होता रहता था ,*

*★_ जब ये जमात वहा पहुंची तो एक ऐसे साहब से मुलाक़ात हुई जो मशरिक़ी पंजाब के फ़साद के ज़ख्म खोरदा थे, उन्होन मशरिकी पंजाब का हाल सुनाया और बड़े दर्द से बोले कि लोग मुर्तद हो गए, ये सुनकर पूरी जमात इंतेहाई मुतास्सिर हुई, उस वक्त जमात में 27 आदमी शामिल थे,*.

*★_ हज़रत शेख़ुल हदीस मौलाना मुहम्मद ज़कारिया रह. की खिदमत में ये जमात हाज़िर हुई और मशरिकी पंजाब में जाने का मशवरा किया, हजरत शेखुल हदीस रह. ने फरमाया- अगर चंद शरईत पर अमल किया जाए तो अल्लाह का नाम ले कर जाया जा सकता है:-*
*"_ सलातुल हाजात का पूरी तरह अहतमाम किया जाए, इज्तिमाई दुआ का अहतमाम किया जाए, रात के पिछले पहर नमाजे़ तहज्जुद का अहतमाम किया जाए, तो जिस खुदा ने सहाबा किराम रजियल्लाहु तआला अन्हुम अजमईन की मदद की वो तुम्हारी भी मदद करेगा _,"*

        ✦─┄┅━═══ ✦═══━┅┄─    
   
                  *✧_पोस्ट -16_✧*

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*❈_ जमात में मशवारा हुआ, 28 आदमियों में से सिर्फ 7 आदमियों ने उस आतिश फशां इलाक़े में दाख़िल होने पर हिम्मत के साथ आमादगी ज़ाहिर की, हालात बहुत नाज़ुक वे, मौत मुंह फ़ैलाये सामने खड़ी थी, जिंदा बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, अक्सर लोग "अपने हाथ अपने आपको हलाक़त में मत डालो" (आयत) पढ़ कर जाने से मना करते थे, मगर इन 7 आदमियों ने हिम्मत कर ही ली,*

*★"_ इसकी इत्तेला हजरत जी मौलाना मुहम्मद युसूफ साहब को दी, मौलाना ने इन हज़रात की हिम्मत अफजा़ई की और इनके लिए दुआएं खुसुसन सूरह यासीन और उसके बाद खुसूसी दुवाओं का अहतमाम किया, एक साहब जो इस जमात के साथी थे अपने तास्सुरात इस तरह ज़ाहिर करते हैं _,"*

*★_ हमारी जमात 18 मार्च 1951 को जुमा की नमाज़ पढ़ कर रायपुर से रवाना हुई, रायपुर वालों ने अश्क बार आंखों और दुवाओं के साथ रुखसत किया, जमात खुदा का जिक्र करते हुए रवाना हुई और जमना के शाही रास्ते से मशरिकी पंजाब में दाखिल हो गई और खिजराबाद में पहला पड़ाव किया,*

*★_ सिक्खों ने इस अजीब व गरीब जमात को देखा तो हैरत ​​में पड़ गए और गैज़ व गज़ब में आ गए, जिस मस्जिद में हमने क़याम किया था उसे चारों तरफ से घेर लिया और शोर व हंगामा करने लगे, इस सूरते हाल को देख कर खुदा के नहीफ व नज़ार ( कमज़ोर) बंदे खुदा पर यक़ीन और ऐतमाद के पेकर बन गए और अपनी शहादत के इंतजार में घड़ियां गिनने लगे, अमीरे जमात ने खुदा का नाम ले कर उन लोगों को मुखातब कर के तक़रीर करनी शुरू कर दी, जमात के बाक़ी लोग सलातुल हाजात पढ़ कर ज़िक्र व दुआ में मशगूल हो गए,*.

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                  *✧_पोस्ट -17_✧*

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*❈_ खुदा ने अपने बेसरो सामान बंदो की दुआ को सुन लिया, अमीरे जमात की तक़रीर जो हक़ीक़त में दर्द व असर में डूबी हुई और इखलास व लिल्लाहियत से मामूर थी सुनने वालों के दिलो में घर करने लगी, मुक़ल्लिबुल कु़लूब ने दिलों को पलट दिया_,"*

*★_ जो आंखें सुर्ख और खूनी थीं देखते ही देखते आंसुओं से तर हो गईं, उठे हाथ गिर गए, जो लोग मारो मारो की सदाएं लगा रहे थे खुद अपनी जु़बानो से कहने लगे कि ये मौलवी तो बहुत अच्छी अच्छी बातें करते हैं, वाक़ई हमारे अंदर हैवानियत आ गई थी_,"*

*★_ अमीर साहब ने आधे घंटे के बाद बात खत्म की तो एक लहीम शहीम आदमी खड़ा हो गया और उसने ऐलान किया कि ये लोग दिल्ली से आए हैं, आपस में अमन व सुलह की दावत देते हैं, जुल्म व अदावत और इंसान कशी के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं, हर शख्स इनकी बात सुने, अगर किसी ने इनको तक़लीफ दी तो मैं सबसे पहले इनके साथ मरने के लिए तैयार हूं_,"*

*★_ आठ रोज़ तक जमात का क़याम रहा, खुदा ने हर शख्स के दिल में मुहब्बत व उल्फत डाल दी, हर मुका़म पर पुलिस और उस शख्स ने साथ दिया, मजमे में सब गैर मुस्लिम होते और बाद में खुद जमात को उन मुसलमानों के पास ले जाते जो मुर्तद हो चुके थे और कहते इनको भी अपने जेसा बना लीजिए _,"*

*★_ जमात अपने साथ इन लोगो को देवबंद, सहारनपुर और दिल्ली लाई, सारे अकाबिर हज़रात जिनमे हजरत रायपुरी रह. हजरत शेखुल हदीस रह. हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी रह. और क़ारी मुहम्मद तैय्यब साहब रह. वगेरा इनका अहवाल सुन कर और साथ आए हुए मुसलमानों को देख कर बहुत खुश हुए, उनको लिपटा लिया और दुआएं दी, मौलाना मुहम्मद यूसुफ साहब रह. की खुशी तो बयान से बाहर थी, आज उनको अपना ख्वाब पूरा होता नज़र आया, खुशी और मसर्रत से उनकी आंखें नम थीं,*

*★_ इस जमात के जाने से मशरिकी पंजाब में काम की बुनियाद पड़ गई, उन अहले अज़ीमत ने अपनी ज़िंदगी को खतरों में डाल कर काम का एक वसी मैदान पैदा कर लिया, दूसरों की हिम्मत बंधी और पहले जाने वालों को साबिक़ून अव्वलीन मे शुमार किया जाने लगा _,"*
 *(माखूज़ अज़ सवानेह मौलाना मुहम्मद युसुफ़ रह.)*

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                  *✧_पोस्ट -18_✧*

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*❈_ मेरी हिदायत का ज़रिया एक दुकानदार बना:-*

*★_ हजरत मौलाना तारिक़ जमील साहब दा. ब. मुबल्लिगे इस्लाम फरमाते हैं कि मुझे जिसने मेडिकल कॉलेज छोड़ने की तरगीब दी वो एक दुकानदार था, उसने मुझसे तार्रूफ हासिल किया कि तुम कौन हो? क्या करते हो? मैंने बताया कि भाई मैंने मेडिकल में जाना है, बाप जमींदार है और ये हमारा इलाक़ा है _,"*

*★_ उसने कहा - तुम क्यों डॉक्टरी पढ़ते हो ? तुम तो कुछ भी न करो तब भी सारी जिंदगी आसूदगी से रोटी खा सकते हो, तुम इल्मे दीन हासिल करो, मैं उसे ये कहता खुद तो आलिम है नहीं मुझे किस बात की तबलीग करता है, जो आज का मफहूम है और आज के मफहूम के मुताबिक़ उसने बहुत बड़ा गुनाह किया है कि खुद तो आलिम है नहीं मुझे कहता है इल्मे दीन पढो_,"*

*★_ मैने कॉलेज छोड़ा, 8 महीने मां बाप की मार खाईं पिटाई खाईं, रिश्तेदारों की बड़ों की छोटों की लान तान ओए तू मोलवी बनना है ! कितनी आंखों पर पट्टी बंधी हुई थी वो देख रहे थे कि ये एक आसूदा हाल घर का बच्चा है अगर ये कुछ भी ना करे तो भी विरासत में इतनी ज़मीन है कि ये बा इज्ज़त रोटी खा सकते हैं, फिर भी मुझे कह रहे हैं - तू मोलवी बनना है तू भूखा मरना है _,"*

*★_ और मैंने उसकी बात मान ली और अल्लाह ने मुझे तोफीक़ दे दी तो फिर आखिरी स्टेज क्या आई? मैं सुबह नाश्ता कर रहा था, मेरे वालिद ने मुझे फरमाया कि निकल जा मेरे घर से अगर तू मोलवी बनना है, मैं रायवंड आ गया, मैंने कहा वालिद ने निकाल दिया है अब आप दाखिल भी ना करो तो मैं कहीं का नहीं_,"*

*★_ मैं रायवंद में दाखिल हो गया, 8 साल पढ़ा, उसके बाद तबलीग में 6 बर्रे आज़म में अल्लाह ने सफर कराया, मेरे 15 साल से हर साल में दो सफर तीन सफर बेरून मुल्क के हो रहे हैं और ये सारा सवाब मेरा इंदल्लाह कुबूल ना भी हो कि मै रियाकार भी हो सकता हूं, मैं मुतकब्बीर भी हो सकता हूं, मेरे अंदर ऐब भी आ सकता है, बड़ाई भी आ सकती है, सब कुछ हो सकता है लेकिन जो कुछ भी मुझसे अमल हो रहा है उन सबका सवाब उस दुकानदार को जा रहा है जिसका नाम कौसर है _,"*

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                  *✧_पोस्ट -19_✧*

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*❈_ रहबरी करने वाले को अमल करने वाले का सवाब होता है:-*

*★_ इस उम्मत को अल्लाह ने चुना है दुनिया मे अपना पैगाम पहुंचाने के लिए और आवाज़ लगाने के लिए, अगर हम अल्लाह की आवाज़ नहीं लगाएंगे तो शैतान की लगाना और सुनना पड़ेगी, घरो में उसकी आवाज़ और नाच देखना पड़ेगा, उनकी फहाशी के निज़ाम में अपनी औलाद को ज़हर निगलते देख कर भी आप चू नहीं कर पाएंगे,*

*★_ अगर अल्लाह की तरफ ना बुलाया तो ये सब कुछ होगा, आपकी औलादे वो ना करेंगी जो आप चाहते हैं, बल्कि वो करेंगे जो यहूदी और ईसाई चाहते हैं, हमारी बेटियां फातिमा अज़जो़हरा के पीछे नहीं चलेंगी, हमारी बेटियां फाहिशा औरतों और अदाकारों के पीछे चलेंगी_,"*

*★_ हमारे नौजवान हजरत अबू बकर की जिंदगी को दुनिया के सामने नहीं रखेंगे वो फासिको़ बदमाशों फाजिरों को सामने रखेंगे, ये हक़ीक़त कोई झुठला नहीं सकता_,"*

*★_ जिसके लिए रात की नींदें खराब की, जिसके पेशाब व पाखाना धोते रहे लेकिन जब जवान हुए तो वाल्देन को आंखें निकालते हैं, इन नाफरमान औलाद के लिए हम अल्लाह की नाफरमानी क्यों करें?*

*★_ हम अपनी औलाद की खैर ख्वाही चाहते हैं कि ये भी जन्नत में जाने वाले बने और पूरी दुनिया के इंसान ताइब हो कर अल्लाह से जुड जाएं, तो तबलीग कोई तबलीगी जमात का काम नहीं है ये अल्लाह का अम्र है, अल्लाह का हुक्म है, ये हमारी मेहरूमी है कि ज़माना हुआ हम इस बात को भूल गए,*

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                  *✧_पोस्ट -20_✧*

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*❈_दीन के लिए कुर्बानी देने वाली मिसाली बीवी :-*

*"★_ एक आदमी की साल भर की तशकील हुई वो तैयार हो गया, बीवी से जा कर मशवारा किया, बीवी बड़ी दीनदार थी, उसने कहा तुम अल्लाह के रास्ते में जाओ बच्चो की तरबियत और उनकी देखभल में करती रहूंगी, इस तरीक़े से अल्लाह के रास्ते में जाना मेरे लिए तो मुश्किल है, तुम अल्लाह के दीन का काम करोगे तो अल्लाह पाक मुझे भी सवाब देगा_,"*

*★_ शोहर अल्लाह के रास्ते में चले गए और बीवी अपने बच्चों की खैर खबर लेती रही, ईद का दिन आया तो मोहल्ले के बच्चे उस मुबल्लिग के बच्चों को चिडा़ने लगे और कहने लगे कि तुम्हारे अब्बा तो जमात में गए और हमारे अब्बा हमारे पास हैं, हमारी तो ईद है और देखो कैसे अच्छे अच्छे कपडे और देखो कैसा अच्छा अच्छा खाना, हम तो घूमेंगे फिरने जाएंगे, तुम्हें कौन ले जाएगा?*

*★_ ये छोटे बच्चे थे रोने लगे, हिचकियां मार मार कर रोते हुए मां के पास आए, जिंदगी में ये पहली ईद थी कि बच्चों के अब्बा जमात में चले गए, अब ये बच्चे मां को लिपट गए और लिपट कर खूब रोए, मां भी रोई _,"*

*★_ जब रोने से फारिग हो गए तो मां ने बच्चों को बिठाया, यूं कहा- देखो बच्चो! मोहल्ले के बच्चों की ईद आज है और कल बासी परसो खत्म, और हमारी ईद जो जन्नत में आएगी वो हमेशा ताज़ी रहेगी और बढ़ती रहेगी, और जन्नत में जा कर क्या मिलेगा वो सारी आयतें पढ़ कर सुनाई, जन्नत के अंगूर केसे? जन्नत की खजूर केसी ? जन्नत का दूध केसा? वहां का शहद केसा? ये सारी बातें सुनाई, बच्चे हंस पड़े और बच्चों ने कहा - बस अम्मा हमारा तो काम बन गया, हमारी तो ऐसी ईद है जो कभी बासी होगी ही नहीं _,"*

*★_ ये बच्चे बाहर गए, फिर वो बच्चे आए इनको चिड़ाया, इन बच्चों ने कहा- बेठो ! सारे बच्चे बेठ गए, बच्चे भी दीन के दाई, उन्होने यूं कहा कि देखो तुम्हारी ईद तो कल बासी परसो खत्म और हमने अपनी मां से सुना है कि हमको जन्नत की ईद मिलेगी वो बासी नहीं होगी हमेशा ताज़ा रहेगी और फिर जन्नत की सारी नियामतें उन बच्चों ने गिनानी शुरू की तो वो सारे बच्चे खामोशी से बेठ कर सुनते रहे _,"*

*★_ एक तरफ शोहर दाई, बीवी भी दाई और बच्चे भी दावत दे रहे, ये मंज़र हमें पूरे आलम के अंदर क़ायम करना है, करने वाला अल्लाह है हमे तो हाथ पैर मारने हैं, कोशिश करनी है, तो तबलीग कोई तब्लीगी जमात का काम नहीं है, ये अल्लाह का अम्र है अल्लाह का हुक्म है, ये हमारी मेहरूमी है कि ज़माना हुआ हम इस बात को भूल गए _,"*

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                  *✧_पोस्ट -21_✧*

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*❈…_एक डाकू की तौबा और चरस से निजात :-1*

*★_ एक दोस्त ने बताया कि मै एक मस्जिद में नमाज़ के लिए गया वहा जमात आई हुई थी, नमाज़ के बाद उन्होंने तालीम करवाई, तालीम के बाद मैंने सभी साथियो से मुलाक़ात की, एक भाई के चेहरे पर ज़ख्म का निशान था, बहुत इसरार के बाद उन्होंने बताया कि मैं गुजरांवाला का डाकू था, मुक़ाबला के दौरान चाकू लग गया था _,"*

*★_ किस तरह उनका अंधेरो से उजालो की तरफ सफर का आगाज़ हुआ? उन्होंने बताया कि मैं डाका डालता, जगह जगह टैक्स लेता, वहां एक ढाड़ी वाला आदमी था जो मुझे दावत इलल्लाह देता और चाय भी पिलाता और बिस्किट भी खिलाता, पहले मैं उसका मज़ाक उड़ाता था, बाद में उसकी बात मुझ पर असर करने लग गई और मैं उसके पास अक्सर जाता, ये बात उसके वालिद साहब को पसंद ना आई और उसने मुझे वहां आने से रोक दिया लेकिन उसने मुझे चार माह अल्लाह पाक के रास्ते में लगाने की दावत दी और मशवरा दिया कि हलाल माल से चार माह लगाओ_,"*

*★_ मेरे पास 80 रुपये डाकू बनने से पहले मजदूरी के पड़े थे, वो रुपये और कुछ सामान ले कर अपनी मां से इजाज़त मांगी तो वो रोने लगी, मैंने कहा जब साल दो साल के लिए जेल जाता था उस वक्त तुम रोती नहीं थी, अब क्यों रो रही हो, इजाज़त के बाद मैं गुजरांवाला मरकज़ चला गया,*

*★_ जब मैं मस्जिद में दाखिल होने लगा तो ख्याल आया कि ये अल्लाह पाक का घर है इसमें चरस नहीं ले जाना चाहिए, लिहाज़ा मैंने उसे फैंक दिया, मैं दो हजार रूपया उधार ले कर रायवंड चला गया, पहली तशकील में मुझे चरस की तलब हुई मैंने अमीर साहब को सारी बात बताई और वापस जाने की इजाज़त चाही, लेकिन अमीर साहब ने फरमाया - बेटा गर्मी से गुस्ल कर लो, अमीर साहब ने सारी जमात से कहा कि भाई के लिए दुआ करो, एक साथी को 24 घंटे ज़िक्र के लिए बिठा दिया, मैं तक़रीबन हर घंटे बाद नहाता, कुछ दिनों के बाद अल्लाह पाक ने मुझे सेहत दे दी और चरस छूट गई,*

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                  *✧_पोस्ट -22_✧*

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*❈_दो माह के बाद रायवंड मरकज़ में मेरी खिदमत लगी, मैं झाड़ू दे रहा था कि एक भाई आया उसने मुझे कहा कि तुमने डाढ़ी क्यूं नहीं रखी, मैंने उसे ना मुनासिब बातें कहीं जिस पर उस भाई को गुस्सा आया कि तुमने डाढ़ी की तोहीन की है, उसने मुझे मारा, इस पर मैंने भी उसे मारा, लोगों ने हमें छुड़ाया,*

*★_ मैं एक सुतून के साथ सो गया और वो दूसरे सुतून के साथ सो गया, मैंने ख्वाब में देखा कि मैं एक मैदान में चल रहा हूं, चलते चलते अंधेरा बढ़ता चला गया यहां तक ​​कि मेरा हाथ नज़र नहीं आता था, अचानक एक रोशनी नमुदार हुई, उधर देखता हूं कि एक मोती का महल है और उसमें हसीन व जमील लड़की नजर आती है, इतनी खूबसूरत कि जिंदगी भर ना देखी,*

*★_ उठ कर मैंने साथ वाले को बताया, हम दोनो मौलाना जमशेद साहब के पास चले गए, उन्होंने बताया कि गलत रास्ते से सही रास्ते पर आने का इनाम अल्लाह पाक ने दिखाया है, उसके बाद मैंने डाढ़ी रख ली, चार माह लगा कर वापस आया तो मेरे डाकू साथी खुद बा खुद दूर हो गए, मैंने मजदूरी शुरू कर दी लेकिन मेरी मां कहती रही इससे क्या होता है, एक दिन मैंने शबे जुमा में मरकज़ के अमीर साहब से कहा कि मेरी मां ये कहती है। उन्होंने फरमाया कि आज मैं दुआ करूंगा तुम भी अल्लाह से मांगो_,"*

*★_ सुबह के बयान के बाद बेठा हुआ था कि एक बुजुर्ग आए और कहने लगे आज मेरी बेटी के साथ तुम्हारी शादी है, सुन्नत के मुताबिक़ मेरी शादी हो गई, मैंने यूनिफॉर्म की दुकान खोल ली, अब अल्हम्दुलिल्लाह मेरी वालिदा नमाज़ी है और अपनी पहली ज़िंदगी पर नादिम है, मेरे लिए और अपने लिए रोज़ाना तौबा करती है, हमारा घराना दीनदार है, मेरा एक बेटा भी है, मेरी दुकान पर आज 12 मुलाज़िम काम करते हैं, अल्हम्दुलिल्लाह ये सब दावत इलल्लाह की बरकत से हुआ, अल्लाह ता'ला सारी उम्मत को अपना मक़सद दावत इलल्लाह बनाने की तौफीक़ मरहमत फरमाये _,"*

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                  *✧_पोस्ट -23_✧*

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*❈_ हुजूर ﷺ ने ख्वाब में नुसरत का हुक्म दिया:-*

*★_ हमारे एक दोस्त जिन्होंने अभी अभी अंदरूनी मुल्क पैदल जमात के साथ एक साल का सफर किया, मुहतरम बड़े ज़िम्मेदार फाल और नेक सीरत साथी हैं, मेहमान जमातों की नुसरत और मका़मी तोर पर लोगों को तबलीग के लिए तैयार करना ये उनका मिशन है, वो अपने सफर की कारगुज़ारी सुनाते हुए फरमाते हैं कि हमारी जमात 10 आदमियों पर मुश्तमिल थी जो कि एक ही इलाक़े के साथी थे,*

*★_ तक़रीबन 600 मील के पैदल सफर से तक़रीबन 650 अफराद अल्हम्दुलिल्लाह अल्लाह के रास्ते में दावत इलल्लाह के लिए निकले, उस सफर का वो अपना एक अजीब और सच्चा वाक़िआ बयान करते हैं कि हमारी जमात एक जगह ठहरी हुई थी और वहां के चंद मका़मी हज़रात हमारी नुसरत के लिए आए हुए थे,*

*★_ उनमें से एक साथी ने हमारा खुसूसी इकराम किया कि मुझे ख्वाब में नबी करीम ﷺ की जियारत हुई तो हुजूर पुरनूर ﷺ ने फरमाया कि तुम्हारे इलाक़े में मेरी जमात के साथी आए हुए हैं और तुमने अभी तक उनकी नुसरत नहीं कि और उनका इकराम नहीं किया _,"*

*★_ इसके बाद कहने लगे कि मुझे तीन दिन बाद आपकी जमात मिली है और आपकी जमात के सारे साथियों को मैंने ख्वाब में देखा है, इसके बाद वो शख्स हमें दोबारा गाड़ी में बिठा कर अपने मुका़म पर छोड़ कर चला गया ,*

*★_ उन्होंने कहा कि हमारी अंदरूनी मुल्क एक साल पैदल जमात के साथ होने वाला ये अजीब और सच्चा वाक़िआ है, इस वाक़िए के सुनने के बाद हमें पुख्ता और मुकम्मल व अकमल यक़ीन था कि जो शख्स दावत इलल्लाह में लग जाता है तो रब करीम उसकी गैब के खज़ानो से मदद व नुसरत फरमाते हैं _,"*

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                  *✧_पोस्ट -24_✧*

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*❈…अल्लाह ताला की गैबी मदद का वक़िया:-*

*★_ कुछ लोग दावत इलल्लाह के सिलसिले में एक साल के लिए अल्लाह के रास्ते में गिलगित के पहाड़ो में बस्ती बस्ती लोगो को मिलते हुए उनको दीन और दीन की मेहनत की तरफ मुतवज्जा कर रहे थे कि एक अजीब बात पेश आई_,"*
 .
*★_ वो हज़रात एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर जा रहे थे, पहाड़ी रास्ता इंतेहाई दुशवार गुज़रा था, नीचे बहुत तेज़ दरिया बह रहा था, जिसकी खौफनाक तंद व तेज़ लहरों में गिर कर किसी का जिंदा बचना इंतेहाई मुश्किल है, चलते चलते अचानक एक साथी का पांव फिसला और वो नीचे दरिया में जा गिरा _,"*

*★_ साथी इतनी गेहराई में गिरते हुए और लहरों में बहते हुए अपने साथी को बेबसी से देखते रह गए और वो उनकी आंखों से ओझल हो गया, आगे उसके साथ क्या बीती? वो बहते बहते एक बड़ी चट्टान के साथ चिमट कर अटक गया और हैरान व परेशान हो गया कि क्या करूं और कैसे निकलु ? इसी असना में उसने देखा एक बहुत बड़ा अज़दहा (सांप) मुंह खोले उसके सामने आ गया और उसका मुंह इतना बड़ा कि पूरी गाय भी निगल सके,*

*★_अब तो उसने मौत का यक़ीन कर लिया और खोफ के मारे आंखें भींच ली और कलमा पढ़ा लिया लेकिन वो क्या देखता है कि वो अज़दहा उसके क़रीब पीठ कर के सामने खड़ा़ हो गया और जुबान हाल से अपने ऊपर सवार होने की दावत देने लगा,*

*★_ उसके दिल में भी अल्लाह ने डाल दिया और ये कूद कर उस पर सवार हो गया, वो तो बहुत नरम व मुलायम था, अज़दहा ने बाहर की तरफ रेंगना शुरू कर दिया, रेंगते रेगते उसे वो एक चटियल मैदान में ले आया, यहां ला कर उसने उसे उतार दिया और वहां से चला गया,*

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                  *✧_पोस्ट -25_✧*

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*❈_अल्लाह का प्यारा बंदा इस अजीब व गरीब कश्मकश में था कि उसने देखा एक जीप वहां आई, जीप में सवार लोगों ने उसे भी अपने साथ सवार किया और शहर के तब्लीगी मरकज़ में छोड़ कर चले गए, जहां पर उसके पहाड़ से गिर कर अल्लाह को प्यारे हो जाने की इत्तेला पहुंच चुकी थी, जब उन्होने उसे ज़िंदा सलामत देखा तो बहुत हैरान हुए,*

*★_ ये वाक़िया अजीब व गरीब तो ज़रूर है लेकिन ना का़बिले यक़ीन नहीं है, इससे भी ज़्यादा अजीब व गरीब वाक़ियात अल्लाह तआला के प्यारों के साथ पेश आते रहे हैं और आते रहते हैं और आते रहेंगे लेकिन ऐसे वाक़िआत के बाद मुत्मइन हो जाना चाहिए या नहीं? हरगिज नहीं,*

*★_ हज़रात सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम के साथ तो इससे भी बड़े बड़े अल्लाह की मदद के वाक़ियात पेश आए, वो फिर भी अल्लाह से डरते रहे और नेकियों में आगे बढ़ते रहे, जहाँ खाने की ज़रुरत पेश आई अल्लाह की तरफ से लगे लगाए दस्तरखान उतर आना, सवारी की ज़रूरत पेश आई गैबी सवारी का मुहय्या हो जाना, खाना कम हुआ बरकत पैदा हो जाना, जमात रास्ता भूल गई परिन्दो के गोल का आना और फिर उनका इंसान बन कर रास्ते की निशानदही करके गायब हो जाना_,"*

*★_ इस क़िस्म के सैंकड़ों वाक़ियात ये सब अल्लाह तआला की मेहरबानी और उसका फ़ज़ल व अहसान है लेकिन ये हमें मतलूब नहीं होना चाहिए, बल्की हमारा मतलूब तो अल्लाह की मदद का वो दर्जा है जो सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम को मतलूब था, अल्लाह ताला की मदद का आला दर्जा कि अल्लाह के बंदे अल्लाह के दीन में फौज दर फौज दाखिल होने लगे_,"*

*★_ ऐ काश ! जल्दी वो वक्त़ आ जाए कि जिन आंखों से दीन मिटते देखा उन्हीं आंखों से मरने से पहले पहले दीन को चमकते भी देख लें, अल्लाह हक को पूरे आलम में गालिब कर दे_,"*

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                  *✧_पोस्ट -26_✧*

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*❈…तबलीग की बरकत से चोरी छूट गई :-*

*★_ एक तबलीगी साथी ने ये वाक़िआ सुनाया कि जब मैं सर्विस में था तो एक सरकारी मीटिंग हुई जिसमें मैं शरीक़ हुआ, वहां के चीफ से मुलाक़ात हुई तो उसने दीन की मेहनत की बरकात बताई, उसने बताया कि उसके पास वहां का सबसे बड़ा तेल का ज़ख़ीरा (डिपो) है जिसका वो इंचार्ज है, चौकीदार उसकी रखवाली करते हैं और रात को चोरों के साथ मिल कर तेल चोरी करवाते हैं, उसने पुलिस की मदद ली मगर चोरी कंट्रोल ना हुई,*

*★_ चौकीदारों में से एक की चार माह की तश्कील हुई, अल्लाह ने उसके दिल में बात डाली और वो छुट्टी ले कर जमात में चला गया, जब वो चार माह का वक्त़ पूरा कर के आया तो मुझे इत्तेला मिली कि ये चौकीदार अब चोरों से नहीं मिलता और चोथाई चोरी खत्म हो गई है,*

*★_ चुनांचे मैंने उस चौकीदार को जो चार माह लगा कर आया था अपने दफ्तर में बुलाया और उससे पूछा कि तुमने तीन चिल्लो में क्या किया? उसने बताया कि चार माह तक हम अल्लाह तआला और उसके रसूल ﷺ की बात सुनते और सुनाते रहे, जिससे हमारा अल्लाह ताला की ज़ात पर यक़ीन मज़बूत हुआ और हुज़ूर अक़दस ﷺ के नूरानी तरीक़ो पर चल कर दोनो जहाँनो की कामयाबी का यक़ीन आया _,"*

*★_ अब अल्लाह का खौफ हर वक्त़ दिल में रहता है, इसलिए चोरों की बात नहीं मानता बल्की उनको भी चार माह की दावत देता हूं, उस ऑफिसर ने उस चौकीदार को कहा कि बारी बारी तमाम चौकीदारों को अल्लाह के रास्ते में निकालो ,*

*★_ अल्लाह की शान ! अब चारों चौकीदार वक्त़ लगा चुके है और चोरी भी खत्म है जो बरसों से हमारे लिए मसला बनी हुई थी, इसकी वजह माहौल है क्योंकि उन चौकीदारों ने उस माहौल में जान माल और वक्त़ लगा कर कु़र्बानी कर के वक्त़ लगाया तो उनके ईमान व यक़ीन में तरक्की हो गई और चोरी जैसी बुरी आदत से निजात पाई _,"*

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                  *✧_पोस्ट -27_✧*

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*❈…तीन अरब रुपये कहां से आए ?*

*★_ तक़रीबन तीन सौ जमाते बाहर मुल्क़ में जाने के लिए तैयार होती हैं, तीन सौ जमातों का मतलब है कि तक़रीबन तीन हज़ार आदमी और हर जमात वाले कुछ ज़्यादा खर्च करते हैं कुछ कम खर्च करते हैं, मगर एक आदमी का एक लाख का रुपया आसानी से खर्च होता है, तो तीन सौ जमातों का खर्च तक़रीबन तीन अरब रुपये बन जाता है,*

*★_ किसी भी मरकज से इनको तीन पैसे भी नहीं मिलते ये सारे क्यों खर्च कर के जा रहे हैं? ये लोग तबलीग को किसी मरकज़ से नहीं जोड़ रहे या तबलीगी जमात से नहीं जोड़ रहे, तबलीग के काम को ईमान से जोड़ते हैं, खत्मे नबुवत से जोड़ते हैं कि हमारे नबी ﷺ आखिरी नबी हैं, आप ﷺ के बाद कोई नबी नहीं,*

*★_ फिर इस काम के लिए आलिम होना शर्त नहीं, एक बात भी आती है तो उसकी तबलीग करनी शुरू करो, इतना तो पता है कि अल्लाह को मानने में निजात है तो इसकी दावत दो, सीखे बगैर गाड़ी आगे नहीं चलती तो सीखने के लिए कहते हैं ! निकलो तो सही सीखो से सही, कहो भी और सिखाओ भी और पहुंचाओ भी,*

*★_ये सारे काम एक ही वक्त में होते हैं, ये नहीं कि सीख लो फिर करो, जो आदमी तैरना सीखता है क्या वो भी ये कहता है कि पहले तैरना सीख लो फिर तैरुंगा, वो तैरना और सीखना एक ही वक्त में करता है_,"*

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                  *✧_पोस्ट -28_✧*

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*❈_अल्लाह के रास्ते में खर्च करने का शोक़ पैदा करो :-*

*★"_ आज के लोग कमाते कमाते जब बाल सफेद हो जाते हैं तो ऊंचे ऊंचे बंगले खड़े कर के अपनी सारी दौलत को बरबाद करके दिखाते हैं कि हम बड़े बन गए, अल्लाह ताला जिसके माल को बरबाद करने का इरादा करता है और जिसके माल को मर्दूद करने का इरादा करता है उसके माल से बंगले बनवाता है, बड़े बड़े महल बनवाता है,*
*"हदीस में आया है कि अल्लाह जिसके माल को ठुकराता है उसे गारे मिट्टी में लगा कर महल्लात बनवाता है _,"*

*★"_ अल्लाह के लिए लगाओ, गारे मिट्टी के मकानों में लगाओगे तो ये दुनिया में रह कर भी मिट्टी ही कहलाएंगे और मरने के बाद कोई काम नहीं देंगे, अगर अल्लाह के लिए लगाओगे तो ये लगाना तुम्हारी क़ब्र को रोशन करेगा, तुम्हें आखिरत में बड़े बड़े महल्लात दिलवाएगा,*

*★_ ज़रा उन महल्लात का तसव्वुर तो करो जिनका शौक अल्लाह दिलाता है, क्या तुम्हें ऐसे महल नहीं चाहिए जिनके नीचे नेहरे जारी हों, सत्तर हज़ार खुद्दाम तुम्हारे आगे पीछे खिदमत के लिए तैयार हों, हर ऐश व इशरत का सामान उसमे तुम्हारे लिए मयस्सर हो,*

*★"_ क्या तुम्हें दुनिया से कई गुना बड़े ये महल्लात नहीं चाहिए, अगर इन महलों का शौक रखते हो तो फिर अल्लाह के लिए खर्च करो,*

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                  *✧_पोस्ट -29_✧*

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*❈_मौलाना सईद अहमद खान रह. की नसीहत:-*

*★_ हजरत मौलाना तारिक़ जमील साहब फरमाते हैं कि 1984 में हम इंगलैंड गए, मैं वहीं बीमार हो गया जमात वापस आ गई, मैं दो महीने वहां रहा, बहुत सी चीज़ें सामने आईं, फिर वापसी में हमें इजाज़त थी उमरे की तो मेरे साथी उमरा करते हुए वापस आए, मैं अकेला गया, मौलाना सईद अहमद खान साहब रह. से मुलाक़ात हुई, बड़ी शफ़क़त फ़रमाते थे, बड़ी मुहब्बत फ़रमाते थे,*

*★_ मैंने कहा - मैं इंग्लिशतान की आपको कारगुज़ारी सुनाना चाहता हूं वहा काम बहुत खराब हो रहा है, फरमाने लगे - मैं नहीं सुना करता मैं नहीं सुना करता, मैंने कहा - नहीं मैने आपको ज़रूर सुनाना है, फरमाया- बेटा मैं नहीं सुना करता, तुझे सुनाने का शोक़ ही है तो हज़रत जी को खत लिख दे, मैं नहीं सुना करता,*

*★_ खैर ! हमने तो कभी ये रुख देखा ही नहीं था, हमारा मामला तो ये था कि ये हो रहा है जाके फौरन बताया, ये ज़हन में होता था कि काम का नुक़सान हो रहा है, तो जब मैं पाकिस्तान पहुंच गया तो मुझे खत लिखा जो हर्फ बा हर्फ सुनाने लगा हूं_,"*

*★_ बंदा बरस हा बरस की ठोकर खाने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा है कि अपने साथियों की कमियां अपने बड़ों को ना सुनाई जाए, आज कल के बड़े इतने बड़े नहीं हैं कि किसी साथी की कमी को सुनने के बाद भी उससे वही सुलुक रखे जो पहले रखा करते थे, इस लिए मैंने साथियो का नुक़सान होते देखा है नफा इस रुख पर नहीं देखा, मेरी तुम्हें नसीहत है कि होंठ सी ले _,"*

*★"_ 1984 से आज तक कितने साल हो गए हैं, मेरे होंठ बंद हैं, मैंने कभी अपने साथियों की बुराइयों को नहीं उछाला कभी किसी बड़े को जा कर नहीं बताया, कभी अपना दिफा नहीं किया और इसमें बड़ी हलावत पाई_,"*

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                  *✧_पोस्ट -30_✧*

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*❈_ गरीबों में मेहनत करते रहो अल्लाह मदद करेगा :-*

*★_ एक दफा हमारी जमात एक शहर में गई, रमज़ान शरीफ का महिना था, एक नेक आदमी था, उसने हमारी अफतारी की दावत कर दी, उसके घर के दालान में एक तरफ शहर के ताजिर वगेरा बेठे हुए थे और दूसरी तरफ हम मिस्कीनो की तरह बेठे हुए थे और वो हमें देख कर मज़ाक उड़ाए और हंसे _,"*

*★_ अब मुझे गुस्सा भी चढ़े कि उन्होंने क्या समझा है हमें फ़क़ीर समझते हैं ? और हिम्मत भी ना हो कि उनसे बात कर सकूं, तो मैंने अपने अमीर साहब से कहा - अमीर साहब! कभी ऐसा भी दिन आएगा कि इन लोगों को भी हम दावत दे सकेंगे?*.

*★_ अमीर साहब मुझसे कहने लगे - बेटा ! गरीबों में काम करते रहो यहीं से आवाज़ अल्लाह तआला हर घर में पहुँचा देगा, अल्लाह के फ़ज़ल व करम से आज अदना से ले कर आला तक को अल्लाह ने इस मेहनत पर उठा दिया है _,"* 

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                  *✧_पोस्ट -31_✧*

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*❈_इस्लाम में ख्वातीन का किरदार :-*

*★_ दुनिया में औरतें ज़्यादा है मर्द थोड़े है और औरतों का काम तो मर्दों से भी ज़्यादा है, हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु अन्हा ने 1/4 हिस्सा इस्लाम का उम्मत को अता फरमाया है, सारे इस्लाम के चार हिस्से करो तो तीन हिस्से एक लाख चोबीस हज़ार सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम से मिला और एक चौथाई हिस्सा हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु अन्हा से मिला है,*

*★_ हमारे चार खुल्फा ए राशिदीन में से अबू बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु और अली रज़ियल्लाहु अन्हु को हुज़ूर ﷺ ने मुसलमान किया, उमर रज़ियल्लाहु अन्हु को उनकी बहन फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा ने मुसलमान किया और उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु को उनकी फूफी सौदा बिनते कुरेज़ा रज़ियल्लाहु अन्हा ने मुसलमान किया,*

*★_ चार खुलफा में से दो औरतों के हाथो मुसलमान हुए, सारी दुनिया के इंसान अल्लाह के हुक्मों पर आएं, हुजूर ﷺ के तरीक़े पर आएं, दुनिया में औरतें ज़्यादा है मर्द कम हैं, इसलिए औरतों में ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत है,*

*★_ एक बुज़ुर्ग का कौ़ल है कि जब हाल बिगड़ते हैं तो एक बड़ा तबका यूं कहता है कि भाई अब कुछ नहीं हो सकता, जैसे हालात चल रहे हैं उसी धारा में तुम भी चलो, एक छोटा सा तबका़ कहता है कि कुछ टक्कर तो मारो, कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है, तो ये छोटा सा तबका़ दीवानगी में और पागलपन में मजनून बन कर हाल से टक्कर लेता है तो आगे चल कर बड़े बड़े इंक़लाबत को वजूद देता है,*

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                  *✧_पोस्ट -32_✧*

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*❈_हकी़की़ इंक़लाब है दिल का बदल जाना, दिल का पलट जाना, ये असल इंकलाब है, जब दिल अल्लाह की तरफ फिर जाता है तो खुद बा खुद इंक़लाब आ जाता है और जब दावत चलती है और तबलीग का काम चलता है तो इस तरह अल्लाह ताला दिलों की ज़मीन को नरम करता है _,"*

*★_ हम तबलीग के काम की गहराई को समझें, अल्लाह ने इस उम्मत को बड़ा अजीमुश् शान काम दिया है, अपनी गुज़ार कर तो हर कोई तो चला ही जाएगा क्यों न ऐसे गुज़ारें कि आने वाली नस्लों पर हम अहसान कर के जाएं और हमारे लिए सवाब के सिलसिले चलते रहे, इसमें अपने ईमान की भी हिफाज़त है,*

*★_ आप खुद अपने तोर पर मस्जिद में आएं ये ठीक है, अगर खत्मे नबुवत से मुनासबत है तो ये सोचें कि और कितनों को मस्जिद में लाना है, अपनी गली में सोचें कितने लोग हैं कि जो मस्जिद में आते हैं कितने नहीं आते, जो नहीं आते उनको दावत देना*

*★_ अपनी अपनी गली में आप देखें, हमारे घर में कितने नमाज़ पढ़ते हैं कितने नहीं पढ़ते, उनको नमाज़ पर लाओ, मेरी गली में कितने हैं जो नमाज़ नहीं पढ़ते ये नहीं कि पहले अपने घर वालों को दावत देना है बाद में औरो को, ये ज़रूरी नहीं अपने घरों में भी हो, साथ वालों पर भी हो, बराबर वालों पर भी हो, यही सुन्नत है,*

*★_ इस वक्त पूरी दुनिया के मुसलमान क़ाबिले रहम हैं, बातिल मेहनत कर रहा है कि इनकी नस्ल को खराब कर दो, इसलिए सबकी ज़िम्मेदारी है, मर्दों की भी औरतों की भी, खुद भी दीन पर चले' और इस दीन को ले कर हर कच्चे पक्के घर में इसकी आवाज़ लगायें _,"*

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                  *✧_पोस्ट -33_✧*

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*❈_साबका़ चोर की तहज्जुद की हालत में सजदे में मौत :-*

*★_ एक मेवाती चोर था, एक अल्लाह वाले वहां जमात में गए, उस चोर की मन्नत समाजत कर के उसे तीन दिन के लिए तैयार किया, वो तीन दिन के लिए तैयार हो गया लेकिन शैतान तो बड़ा ज़ालिम है, उसने सोचा अगर ये तबलीग में लग गया और अल्लाह वाला बन गया तो मेरी तो बरसों की मेहनत बेकार हो जाएगी, चुनांचे शैतान ने उसे वरगलाने की कोशिश की और उसमें कामयाब भी हो गया,*

*★_ जब ये चोर को ले कर अल्लाह के रास्ते में गए तो जमात की तशकील करीब ही एक मस्जिद में हुई, पता चला कि वो चोर वापस चला गया है, खैर उसको दोबारा ढूंढ कर वापस जमात वालों के पास लाए, इस तरह उसने तीन दिन लगाए, फिर वो जमात में वक्त़ लगाता रहा, इस तरह उसके दिल में हिदायत की शमा रोशन होती चली गई _,"*

*★_ इसके ये समरात हुए कि उस चोर ने लोगो से माफ़ी भी मांग ली, जिसका माल वापस कर सकता था उसका माल भी वापस कर दिया, फिर उस चोर को अल्लाह ने कई लोगों की हिदायत का ज़रिया बनाया हत्ताकी एक वक्त ऐसा आया कि जब उसका इंतेकाल हुआ तो उस वक्त तहज्जुद की नमाज़ पड़ रहा था और सजदे की हालत में था _,(सुबहानल्लाह)*

*★_ मेरे दोस्तों ! ऐसे लाखों नमूने इस दुनिया में मोजूद है, ज़मीन तैयार है लेकिन हल चलाने वाला कोई नहीं, हजरत मौलाना मुफ्ती महमूद अलहसन गंगोई रह. ने फरमाया जो बशारते सहाबा किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम को हासिल थी वेसी ही बशारते तबलीग में भी मौजूद है _,"*
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                  *✧_पोस्ट -34_✧*

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*❈_जमात में जाने वाले के घर की हिफाज़त कैसे हुई:-*

*★_ एक बुजुर्ग ने अपनी ईमान अफ़रोज़ कारगुज़ारी सुनाई कि मैंने चिल्ले के लिए जाना था, घर में कोई आदमी भी नहीं था जो घर की देख भाल कर सकता, मैंने अपनी बीवी बच्चों को अल्लाह के सुपुर्द किया और अपने दोस्त से बात की कि घर के लिए सौदा सलफ ला दिया करना, उसने हामी भर ली, लिहाज़ा मैं पहली फुर्सत में अल्लाह के रास्ते में निकल गया,*

*★_ अल्लाह पाक ने खैरो आफियात से वक्त पूरा कर दिया, मैं घर आया और थोड़ी देर बाद दोस्त से मिलने गया, वो कुछ उलझा सा था, थोड़ी देर उसके पास बैठा फिर घर वापस आ गया, अगले दिन फिर उससे मुलाक़ात हुई तो वो मुझसे कहने लगा कि तुम चौकीदार रख कर गए और मुझे इत्तेला भी ना कि, मैंने कहा मैं तो कोई चौकीदार नहीं रख कर गया, वो कुछ परेशान सा हो गया, मैंने कहा क्या बात है? तुम कुछ परेशान से हो गए हो? तो मुझे टाल गया,*

*★_ मैंने थोडा सा इसरार किया तो वो कहने लगा, मुझे अपने किए पर शर्म आती है किस मुंह से बात करूं, मैंने कहा क्या बात हुई तुम बताओ तो सही? हिचकते हुए कहने लगा तुम्हारे जाने के बाद मेरी नियत खराब हो गई और मैं चोरी के इरादे से तुम्हारे घर गया, दरवाज़े के सुराख से देखा कि कोई जाग तो नहीं रहा, मैं क्या देखता हूं कि दरवाज़े के साथ ही कुर्सी पर एक नोजवान बेटा हुआ है और उसके कंधे पर बंदूक लटकी हुई है, वो दरवाज़े की तरफ़ देख रहा था, मैं वापस आ गया,*

*★_ थोड़े दिन के बाद मैं फिर गया तो फिर वही माजरा देखा, तुम्हारे आने तक मैं इसी तरह जाता रहा, वो नोजवान उसी तरह बैठा होता और दरवाज़े की तरफ देख रहा होता, तुम कहते हो कि मैंने कोई चौकीदार नहीं रखा, मैने उससे कहा कि हदीस पाक का मफहूम है कि जो आदमी अल्लाह के रास्ते में जाता है तो अल्लाह अपने फरिश्तों को उस बंदे के घर की हिफाज़त पर मामूर फरमा देता है, मैं जाते हुए अपनी बीवी बच्चो को अल्लाह की हिफाज़त में दे कर गया था, अल्लाह पाक ने मेरे घर की हिफाज़त की _," (सुबहानल्लाह)*

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                  *✧_पोस्ट -35_✧*

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*❈_ हराम की लाखो की नोकरी ठुकरा दी_,"*

*★_ एक नोजवान बैंक की नोकरी करता और एक लाख तनख्वाह लेता था, उसकी तीन दिन की तशकील हुई और उसने तीन दिन जमात में लगाये, चिल्ला भी पूरा ना लगाया था, अभी सिर्फ तीन दिन लगे थे, वापस गया तो जाते ही इस्तिफा दे दिया कि सूद हराम है, मैं बैंक की नोकरी नहीं करूंगा,*

*★_ जब उसने अचानक इस्तिफा दिया, बैंक ने उस पर हरजाने का दावा दायर कर दिया कि इतने लाख हमें हर्जाना के दे दो तब इस्तिफा कुबूल है या अपनी सर्विस दो तब तुझे छोड़ेंगे, उसने कहा मुझसे हरजाना ले लो मैं नोकरी नहीं करूँगा _,"*

*★_ हरजाना देने में क्या कुर्बानी देनी पड़ी, घर बिक गया जायदाद बिक गई, जो बनाया था सब बिक गया, शहर से बाहर एक कच्चे से घर में गुज़र बसर करने लगा, नोकरी छोड़ी देहात में गया, वहां से बकरीयां खरीद के लाया, शहर की मंडी में वही शख्स अब तिजारत कर रहा है, जो कल तक कीमती गाड़ियों में घूमता था, आगे पीछे नोकरों की क़तार थी,*

*★_ जब शहर में पहली बार मंडी में बकरियां बेची, 500 रुपये उसे नफा हुआ, घर ले कर आया खुशी से फूट फूट कर रो पड़ा, बीवी भी रो रही है मियां भी रो रहा है कि आज पहला दिन है हलाल पैसा घर में आया है, ये दुनिया भी अजीब जगह है, यहां खुशी में भी लोग रोते हैं, गम में भी रोते हैं, जिस जहां की खुशी भी रो कर हो वो खुशियों का जहान कैसे हो सकता है?*

*★_ मेरे दोस्तो मुझे बताओ! क्या ये गुस्ताखे रसूल बना ? ये पहले भी तो जानता था कि सूद हराम है, फिर ये क्यों सूद खाता था, फिर अल्लाह की राह में निकला फिर तबलीग में आया फिर उसने सूद छोड़ा, अगर तबलीग वाले इसे गुस्ताखे रसूल बनाते तो पहले से ज्यादा सूद में फंसाते ! इतनी बड़ी कुर्बानी पर वो कैसे आया? कहां एक लाख और कहां 500 रुपये, ज़रा सोचो तो सही?*

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                  *✧_पोस्ट -36_✧*

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*❈_ सुन्नत तरीक़े पर खाता देख कर अमेरिकन हब्शी मुसलमान हो गया:-*

*★_ एक जमात काफी अरसा पहले अमेरिका गई थी, साथियों ने काम से फारिग हो कर खाना खाने के लिए दस्तर ख्वान लगाया, उसी वक्त एक अमेरिकन हब्शी आया, उसने अंग्रेजी में कहा कि मैं आपसे चंद सवालात करने आया हूं_,"*

*★_ जमात के साथियों ने खाने में शरीक किया और काफी इकराम किया, मीठा खिलाया, जब वो खाने से फारिग हुआ तो कहने लगा मुझे मुसलमान बना दें, जमात के साथियों ने कहा कि आप सवालात पूछने आए थे, उसने जवाब दिया कि जिस सादगी और मुहब्बत से आपने मुझे खाना खिलाया है आज तक मेरी मां ने भी नहीं खिलवाया,*

*★_ मेरे घर में हर एक की अलहिदा प्लेट अल्हिदा चमचा और ग्लास है, जिसको मैं ही हाथ लगता हूं और उसमें सिर्फ मैं ही खाता हूं, घर के तमाम अफराद हत्ताकी वाल्देन भी मेरी चीज़ों से दूर रहते हैं, यहां तो हम सबने एक ही थाली में खाया और एक ही ग्लास से पानी पिया, अगर इस्लाम यही है तो मुझे क़ुबूल है,*

*★_ चुनाचे उसने मुसलमान हो कर जमात के साथ कुछ वक्त़ लगाया और बहुत खुश था कि अल्लाह की जा़त ने नबी ﷺ की मिल बेठ कर खाने की सुन्नत की बरकत से ईमान की दौलत से नवाज़ा,*

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                  *✧_पोस्ट -37_✧*

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*❈_शरई लिबास की अज़मत :-*

*★_ तबलीगी जमात के कुछ लोग लंदन गए, वो अपने लंबे कुर्ते ऊंचे पांचे और गोल टोपी में बा ज़ाहिर वहां अजीब मालूम हो रहे थे मगर इसके बावजूद अंग्रेज उनका बहुत अदब करते थे,*

*★"_ एक बार उन लोगों ने किसी पार्क में नमाज़ पढ़ी, वो नमाज़ पढ कर बेठे हुए थे कि एक अंग्रेज आया और उनकी पीठ पर अपने दोनो हाथ फैर कर अपने हाथों को चूम लिया,*

*★_ एक शख्स ने पुछा :- तुम इन लोगों का इतना अहतराम क्यों करते हो ? उसने जवाब दिया:- ये लोग अपने इस हुलिये में हमको ईसा अलैहिस्सलाम और मूसा अलैहिस्सलाम की तरह दिखाई देते हैं _,"*
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                  *✧_पोस्ट -38_✧*

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*❈_फ्रांस में जमात की हैरत अंगेज कारगुज़ारी:-*

*★_ फ्रांस के अंदर एक जमात गई, पैदल सफर था, साथी काफी थके हुए थे, मशवारा हुआ कि थोड़ी देर आराम करना चाहिए, जमात एक पुल के नीचे बेठ गई और तालीम शुरू कर दी, एक फ्रांसीसी उम्र रशीदा आया और जमात के पास बेठ गया, थोड़े वक्त के बाद कहने लगा कि क्या आप अंबिया है? आपके चेहरे पर जो नूर मुझको नज़र आ रहा है ये नूर तो नबियों के चेहरे पर होता है,*

*★_ जमात के साथियो ने अर्ज़ किया - हम अम्बिया व रसूल नहीं हैं, हम तो खातीमुल अंबिया हज़रत मुहम्मद ﷺ के उम्मती हैं, हां इतनी बात ज़रूर है कि जो काम अंबिया अलैहिस्सलाम किया करते थे वो हम भी करते हैं _,"*

*★_ इस पर वो जमात के साथ चलने को तैयार हो गया और ये भी जमात के साथ पैदल चल रहा था, जब एक मुका़म पर ठहरे तो उसने कहा मैं भी आपकी तरह बनना चाहता हूं। जमात के साथियो ने उसे गुस्ल करवाया और कलमा पढ़ाया और कहा कि दो रकात निफ्ल पढ़ लो, अब जमात के साथियों ने निफलें शुरू कर दी तो उसने जमात वालों को देख कर दो निफलें पढ़ीं और बेठ गया,*

*★"_ कहने लगा मैं थक गया हूं आराम करना चाहता हूं, लेटा तो अल्लाह ने उसे हमेशा के लिए आराम की नींद सुला दिया और हमेशा हमेशा के लिए जन्नत का मुस्तहिक़ बन गया,* 

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                  *✧_पोस्ट -39_✧*

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*❈_क्लबों में जाने वाली अमेरिकन लड़की की शादी :-*

*★_ एक अरब नोजवान जिसका नाम फाज़िल था अमेरिका में रिहाइश पजीर था, उसके दिल में दीन के मिटने का एहसास पैदा हुआ और खत्मे नबूवत की ज़िम्मेदारी का एहसास हुआ, चुनांचे उसने चार महीने लगाये, जब वो चार महीने लगा कर आया तो उसका सारा वजूद सुन्नत के मुताबिक ढल चुका था,*

*★_ एक दिन सड़क पर सवारी के इंतजार में खड़ा हुआ था तो एक लड़की आई, उसने पूछा आप कौन हैं? लड़के ने कहा - मैं मुसलमान हूं, उसने कहा - आपका लिबास तो बहुत बा वका़र है, इस तरह दूसरे मुसलमान क्यों नहीं हैं? फिर उस नौजवान ने उस लड़की को पांच मिनट इस्लाम की दावत दी, वो वहीं खड़े खड़े ईमान ले आई,*

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*★_ अब आगे सुनो! कुछ दिन गुजरे फ़ाज़िल और चंद नौजवान अपने होटल के कमरे में बेठे हुए मशवारा कर रहे थे, अचानक एक लड़की का टेलीफ़ोन आया, उसने बड़े गुस्से से कहा कि मुझे फ़ाज़िल से बात करनी है, फ़ाज़िल ने टेलिफ़ोन कान से लगाया, वो लड़की कहने लगी तूने मेरी सहेली को बरबाद कर दिया, वो जो फला जगह तुमको मिली थी, तुमने इस्लाम की दावत दी थी, अब उसे पता नहीं क्या हो गया है, पहले वो मेरे साथ क्लबों में जाती थी और फला फला जगह जाती थी, अब वो घर से बाहर नहीं निकलती, ये कौनसी पाबंदियां हैं जो तुमने उस पर लगा दी है? ये तुम्हारा दीन है?*

*★_ फाज़िल ने कहा - अरी अल्लाह की बंदी अगर बहस करनी है तो मेरे पास वक्त नहीं है, समझना है तो आधे घंटे के बाद बात करना, उसने आधे घंटे बाद फोन किया, फाजिल ने उससे कुछ देर दीन की बात की तो वो भी ईमान ले आई, कुछ अरसे के बाद फाजिल की शादी की बात चली, उसके दोस्त ने बताया कि एक लड़की अभी हाल ही में मुसलमान हुई है, चुनांचे वहां बात चीत हुई और दोनो की शादी हो गई, अब दोनो मियां बीवी में तार्रुफ हुआ, लड़की से पूछा कि आप कैसे मुसलमान हुईं, उसने टेलीफोन वाला किस्सा सुनाया, फाजिल ने कहा आप जानती हैं कि वो कौन था? लड़की ने कहा - नहीं, फ़ाज़िल ने कहा वो आपसे मुखातिब है आपका खादिम (मैं हूं)* 

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                  *✧_पोस्ट -40_✧*

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*❈_ एक तुर्की लड़की की तुर्क वापसी:-*

*★_ अमेरिका में एक जमात गई, अरबी में बयान हुआ, मर्द भी बेठे थे और औरतें भी बेठी थीं, बयान के बाद एक तुर्की लड़की आई, कहने लगी- एक बात करती हूं आप लोग मुझसे नफ़रत ना करें, उन्होंने कहा - नहीं हम तो मुहब्बत सीखते हैं मुहब्बत फेलाते हैं,*

*★_ उस लड़की ने कहा - मैं तुर्की की हूं, मैंने बयान सुना है, मुझे कुछ समझ में नहीं आया क्यूंकि मैं अरबी नहीं जानती, लेकिन उस बयान में ईमान का लफ्ज़ बार बार आ रहा था, इस लफ़्ज़ ने मेरे दिल पर हथोडा़ मारा है और मेरे ईमान को ज़िंदा कर दिया है _,"*

*★_ मैं यहां एक यहूदी लड़के के साथ रहती हूं और बगैर निकाह के रहती हूं, इसलिए मैंने कहा था मुझसे नफरत ना करना, उस लड़के को बुलाओ मुसलमान हो जाए तो मेरा निकाह कर दो मुसलमान नहीं होता तो मैं तुम सबको गवाह बना कर कहती हूं कि मैं अपनी पिछली जिंदगी पर तौबा करती हूं और वापस तुर्की चली जाऊंगी _,"*

*★_ उस लड़के को बुलाया, तीन दिन तक उसे दावत देते रहे उसने मना कर दिया, उस लड़की को बुला कर कहा कि ये तो नहीं मानता, उसने पर्स में से टिकट निकाल कर दिखाया कि देखो मैं इस्तंबोल का टिकट ले कर आई हूं, एक लफ्ज़ ईमान ने उसकी जिंदगी का रुख बदल दिया, इस उम्मत पर मेहनत कब हुई है? किसने मेहनत की है कि ये बच्ची राबिया बसरी बने? किसने मेहनत की है कि ये बच्चा जुनैद बगदादी रह. का नमूना बने?*

*★_ गुनाहों के समंदर में उन्हें डाल दिया, चारों तरफ गाने बजाने की आवाज़ें हों, जब चारों तरफ ज़हर फैलाया जा रहा हो तो बचना भी चाहें तो नहीं बच सकते, मस्जिद में भी गानों की आवाज़ें आती हैं, ये इस उम्मत को मेहनत करनी है अब कोई नबी नहीं आएगा, अगर हम अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए दूर मुल्क भेज सकते हैं तो उनको अल्लाह के दीन के लिए भी भेजो, डॉक्टर बनके कब्र में फायदा नहीं पहुंचेगा, इंजीनियर बनके क़ब्र में क्या फ़ायदा पहुंचेगा, बाप का जनाज़ा सामने पड़ा है और उसे पता नहीं कि क्या पढ़ना है? गुस्ल कैसे देना है? निन्यानवे फीसद को आज नमाजे़ जनाजा़ नहीं आती गुस्ल तो दूर की बात है, तबलीग की मेहनत का ये खुलासा है कि हर मुसलमान दीन पर चले, हर मुसलमान इस मुबारक जिंदगी को सीखे इसको फैलायें, औरतें औरतों में काम करें मर्द मर्दो में काम करें,*
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                  *✧_पोस्ट -41_✧*

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*❈_इटली में एक अरब नौजवान की मेहनत:-*

*★_ इस दफ़ा में हज पर गया तो इटली से एक नौजवान आया हुआ था अरब, हज़रत हसन रज़ियल्लाहु अन्हु की औलाद में से था, मराकिश का रहने वाला था, मजबूरी की वजह से इटली में रहना पड़ गया, 22 साल की उम्र थी, उस अकेले लडके ने इटली में पूरे मुसलमानों को हरकत दे दी, वहां तीन सो मस्जिदें बन गईं जबकी एक मस्जिद भी ना थी और हज पर सत्तर नोजवानों को ले कर आया हुआ था,*

*★_ इतनी ताक़त अल्लाह ने मुसलमानो में रखी है, वो आलिम नहीं है कोई दुनियावी डिगरी थी, इकोनॉमिक्स या फिजिक्स की मुझे अच्छी तरह याद नहीं लेकिन उसने वहां जो इस मेहनत को जिंदा किया तो पूरे इटली में तीन सो मस्जिदों का ज़रिया बन गया और हज़ारों नोजवानो की तौबा का ज़रिया बन गया,*

*★_ इस तबलीग की मेहनत के ज़रिए से एक तो पूरा दीन सीखने की दावत दी जा रही है कि हम पहले पूरे दीन को सीखें और उस पर अमल करें, अगली बात के लिए ज़हन बनाया जा रहा है कि सारी दुनिया के इंसानों के पास अल्लाह का पैगाम ले कर जाना पड़े तो हमें जाना है,*

*★_ ये दावत इल्लल्लाह हमारी ज़िम्मेदारी है, इसी पर तो सारे मरातिब और फजा़इल है, इस वक्त़ इस्लाम में जो देर हो रही है हमारी वजह से हो रही है,*

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                  *✧_पोस्ट -42_✧*

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*❈_ उर्दुन में औरतों की जमात की कारगुज़ारी:-*

*★_ हम अपनी औरतों को ज़ाया ना करें, खाली रोटी पकाने में कपड़े धोने में, इसी में उनकी ज़िंदगी खत्म हो जाएंगी, उर्दुन में कोई पर्दे का रिवाज़ नहीं था, उर्दुन मै गया तो मुझे बुर्के नज़र आए और पूरे लिबास नज़र आए, औरतों के सर पर स्कार्फ यानी एक रुमाल बांधा होता था सिर्फ चेहरा नज़र आता,*

*★_ मैंने पूछा यह पर्दा या बुर्का यहां कहां से आया ? कहने लगे पूरे उर्दुन में एक औरत भी बुर्का नहीं पहनती थी बल्कि आधा लिबास होता था, औरतों की एक जमात आई थी, पठान औरतें अनपढ़, ना कोई आलीमा ना कोई फाज़िला ना कोई तक़रीर जाने 6 नंबर भी ना जाने बिल्कुल अनपढ़, 3 महीने उन्होंने वहां काम किया 70 औरतों को वहां बुर्का पहना कर आई,*

*★_ मैंने कहा जब वह अनपढ़ थीं उन्हें तक़रीर भी करना नहीं आता था तो फिर वह क्या करती थी ? कहा वह क्या करती थी जब हमारी औरतें अंदर आती (वहां स्कर्ट पहनते हैं यानी औरतों की सारी पिंडलियां नंगी होती थी और सारे बाज़ू भी नंगे) तो वह अपनी चादरें उनके ऊपर डाल देती और बैठ के रोना शुरु कर देती, कहतीं कि तुम तो सहाबा की नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बेटियां हो, इससे आगे उनको कुछ आता नहीं था,*

*★_ 70 औरतों ने बुर्का पहना उनकी बरकत से, उनके बाद बुर्के का रिवाज़ हो गया,*

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                  *✧_पोस्ट -43_✧*

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*❈_मलेशिया के एक नौजवान की मेहनत:-*

*★_ मलेशिया में एक नोजवान जिसका नाम हारून था 40 दिन लगाने आया था, जब वो वक़्त लगा कर अपने मोहल्ले में वापस पहुंचा तो उसे बड़ी फिक्र हुई कि मेरे मोहल्ले की अक्सरियत अल्लाह से रूठी हुई है, मैं किसी तरह ऐसी मेहनत करूं कि एक एक आदमी के दिल का ताल्लुक़ अल्लाह से जुड़ जाए,*

*★"_ इस फ़िक्र में दिन रात दर दर फिरता और हफ्ता में एक दिन मस्जिद में बयान के लिए खड़ा हो जाता लेकिन कोई उसके बयान में ना बेठता, आख़िरकार वो जगह जगह टोपीयां फ़ैला कर बयान करता, कई महीने तक ये सिलसिला जारी रहा मगर कोई भी उसके साथ नहीं जुड़ा,*

*★_ आखिर उसकी मेहनत रंग लाई, मजी़द चंद हफ़्ते गुज़रने के बाद 2 आदमी उसके हम ज़हन हुए, फिर वो भी उसके साथ दर दर फिरने लगे, फिर अल्लाह का करना ऐसा हुआ एक मोक़ा ऐसा आया कि उसी मस्जिद को अल्लाह ने पूरे मलेशिया का मरकज़ बना दिया, अभी हाल ही में मलेशिया में इज्तिमा हुआ तो लाखों आदमी जमा हुए और हज़ारों आदमी अल्लाह के रास्ते में निकले,*

*★_ अल्हम्दुलिल्लाह हर साल इज्तिमा होते हैं, सिर्फ वहां के एक शहर लीस्टर की मस्जिद से 25 जमाते अल्लाह के रास्ते में निकली, हत्ताकी वहां के वजी़रे आला ने भी तब्लीग में वक्त़ लगाया, इस कारगुज़ारी को सुनाने का मक़सद ये था कि उस नोजवान ने हुज़ूर ﷺ वाले काम को अपना काम समझा, फिर उसकी क़ुर्बानी व मेहनत क्या रंग लायी ये आपके सामने हैं, अब क़यामत तक जो लोग वहाँ से तब्लीग में वक़्त लगायेंगे तो उसके नामा आमाल में भी उसका अजर लिखा जाएगा क्योंकि वो उन सबके निकलने का ज़रिया बना,*

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                  *✧_पोस्ट -44_✧*

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*❈_रूस में दावत का काम :-*

*★_ मुत्तहिद अरब अमारात से 40 दिन की जमात रूस गई, जब वहां मस्जिद में पहुंची तो देखा कि मस्जिद में ताला लगा हुआ है, ताला खुलवाया तो देखा कि सारी मस्जिद गर्दो गुबार से अटी हुई है, मस्जिद को साफ किया, फिर जब अजा़न दी तो एक बूढ़ी औरत रोती हुई आई और कहने लगी मैंने 70 साल के बाद अजा़न की आवाज़ सुनी है,*

*★_ जमात वालों ने घर घर दुकान दुकान जा कर लोगों को आमाल ए सालिहा की दावत दी, फिर चंद हफ्तों की मेहनत के बाद पूरे इलाक़े में दीन की फिज़ा बन गई और मोहल्ले वालों ने जमात की दावत की और 500 गज़ लंबा कालीन बिछाया, उस दावत में जमात वालों ने मोहल्ले के लोगों को बताया कि हम तो सिर्फ 40 दिनों के लिए आए हैं और फलाँ तारीख को वापसी है,*

*★_ बस ये सुनना था कि लोगों ने धाड़े मार मार कर रोना शुरू कर दिया, मर्द कहने लगे तुम क्यों जा रहे हो? अगर तुम्हें यहां पर घर या दुकान चाहिए वो हम तुम्हें देंगे और औरतें कहने लगीं अगर तुम्हें बीवियां चाहिए तो हम अपनी लड़कियां निकाह के लिए देंगी लेकिन तुम हमें छोड़ कर मत जाओ हमें दीन सिखाओ_,"*

*★_ लेकिन जमात वालों ने उनको अपनी मजबूरी बताई और ये वादा किया कि हम वापस जाते ही दूसरी जमात भेजेंगे, इस पर उन्होंने जमात वालों को जाने की इजाज़त दी,*                      

        ✦─┄┅━═══ ✦═══━┅┄─            
                 *✧_पोस्ट -45_✧*

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*❈_अमेरिका में दीन की मेहनत:-*

 *"★_ अमेरिका में 52 सूबे हैं, अमेरिका वाले (मुसलमानों) ने मरकज़ तक़ाज़ा रखा कि हमें कम से कम हर सूबे के लिए एक जमात दे दी जाए जो वहां दर दर फिर कर दीन की मेहनत करे,*

*★_ अमेरिका में एक जमात गई, जिसके दो साथी एक जगह दावत देने गए, तो वहां पर एक शख्स ने तबलीगी साथियों का गिरेबान पकड़ लिया और फिर रोते हुए कहने लगा कि तुम्हारी वजह से मेरे बाप की कब्र में पिटाई (अज़ाब) हो रही होगी,*

*★_ जब उस शख्स का दिल ठंडा हो गया तो साथियों ने पूछा कि क्या मामला हुआ? कहने लगा कि मैं कुछ अरसा पहले ईमान लाया हूं और मेरे बाप का हाल ही में इंतक़ाल हुआ है, अगर तुम लोग पहले आ जाते तो मेरे मां बाप भी ईमान की हालत में मरते ( यहां तुम लोग से मुराद दूसरे तब्लीगी अहबाब हैं जो उस नोजवान के पास कुछ अरसा पहले दावत देने आए थे)*

*"★_ और उस नोजवान की ये कैफियत इस वजह से थी कि तुम लोगों को अल्लाह ने इतने बड़े कलमे की दौलत से नवाजा़ है लेकिन तुम हम तक पहुंचाने में सुस्ती करते हो,*

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                  *✧_पोस्ट -46_✧*

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            *❈_फ्रांस की कारगुज़ारी:-*

*"★_बांग्लादेश में इज्तिमा हुआ तो एक फ्रांसीसी अचानक मिम्बर पर आया और कहने लगा- ए लोगों हमने तुम तक छोटी से छोटी चीज़ भी पहुंचाई मगर इतना क़ीमती कलमा तुमने हम तक पहु'चाने में कंजूसी अख्त्यार की, इसका अल्लाह तुमसे ज़रूर सवाल करेगा _,"*

*★_ फ्रांस में एक वक्त था कि गिनती की मसाजिद थीं, अब फ्रांस में तबलीग की मेहनत की बरकत से कई सो मसाजिद हैं और कई लाख मुसलमान है,*

*★_ फिलीपाइन में चार सो साल पहले सो फीसद मुसलमान थे, जब दावत तबलीग की मेहनत छूटी तो इसका नुकसान ये हुआ कि मुसलमान दीन से दूर होते चले गए हत्ताकी मुर्तद हो गए, बाप मुसलमान बेटा इसाई ये हालात हो गए, फिर फिलीपाइन में मरकज़ से जमातें गईं तो वहां दीन की फिज़ा बनती चली गई,*

*★_ जब पहले पहल 1986 में जोड़ रखा गया से सात तो आदमी जमा हुए और 1993 के जोड़ में एक लाख आदमी जमा हुए,*

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                  *✧_पोस्ट -47_✧*

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*❈_दो मसाजिद से 1500 मसाजिद तक :-*

*★_ इंग्लैंड में 1952 में पहली जमात गई उस वक्त वहां सिर्फ 2 मस्जिद थी और जब दीन की मेहनत शुरू हुई तो उसकी बरकत से अल्हम्दुलिल्लाह आज इस वक्त 1500 मसाजिद है,*

*"★_ लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह दीन की मेहनत की कसरत की वजह से मसाजिद कम पड़ रही है, इस वजह से मुसलमानो ने सिनेमा घरो और मुख्तलिफ जगहों को खरीद कर मस्जिद बनाया,*

*★_ यूगोस्लाविया में पहली जमात गई तो वो होटल में ठहरी क्यूंकी मस्जिद बहुत कम थी और दूर दूर थी, अब अल्हम्दुलिल्लाह दावत तब्लीग की मेहनत की बरकत से (3500) साढ़े तीन हज़ार मसाजिद हैं,*

*★_ हॉलैंड का तबलीग का मरकज पहले पादरियों का मदरसा था, जहां पादरियों को दीनी तालीम दी जाती थी आज वो तबलीग का मरकज़ है, लंदन में जो तबलीग का मरकज़ है वो पहले इसाईयो का गिरजाघर था, आज वो तबलीग था का मरकज है, कनाडा में पादरियों का एक बहुत बड़ा मदरसा था आज वहां बुखारी व मुस्लिम पढ़ायी जाती है,*

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                  *✧_पोस्ट -48_✧*

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*❈…शराबी ने शराब खाना बंद कर दिया_,"*

*"★_ बेलजियम में जमात गई, जिस इलाक़े में जमात पहुंची वहां बेदीनी बहुत ज़्यादा थी और लोग तबलीग से मुता'रिफ भी नहीं थे, वहां लोगो से कहा कि गश्त कराओ पर कोई गश्त कराने के लिए तैयार न हुआ, फिर इमामे मस्जिद को तैयार किया वो गश्त कराए, वो वहां के शराब खाने में ले गए,*

*★_ शराब खाने में चार नौजवान बेठे हुए थे, इत्तेफाक से वो चारो मुसलमान थे, जमात ने उनसे दीन की और फिक्रे आखिरत व तबलीग की बात की, तो उनमे से एक लड़का जिसका नाम अब्दुल्लाह था वो मस्जिद में आने के लिए तैयार हो गया, उसको मस्जिद में लाए, नेहला धुला कर नमाज़ पढाई, फिर उसे अल्लाह के रास्ते में निकलने की बात की तो वो दस दिन के लिए तैयार हो गया,*

*★"_ जब वो अल्लाह के रास्ते में दस दिन लगा कर वापस आया तो उसके दिल में आखिरत की फिक्र और अल्लाह को राज़ी करने का जज़्बा पैदा हो चुका था, दस दिन लगाने की बरकत यह हुई कि उसने अपने मोहल्ले में दीन की मेहनत शुरू कर दी और शराब खाने का मालिक उसका दोस्त था, उसकी मेहनत से शराब खाने के मालिक ने तीन दिन अल्लाह के रास्ते में लगाए और वो भी दीनदार बन गया हत्ताकी उसने शराब खाना बंद कर दिया,*

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                  *✧_पोस्ट -49_✧*

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*❈_थाईलैंड, सोमालिया और श्रीलंका में दीन का काम :-*

*★_ आप अंदाज लगायें कि तबलीग का काम यहां से थाईलैंड गया है, वहां से सोमालिया जिसकी अस्सी फिसद अबादी मुसलमान है, वहां ये हाल है कि कोई मुसलमान बे नमाज़ी नहीं रहा, कोई औरत बे पर्दा नहीं रही, चोरी खत्म हो गई, ज़िना खत्म हो गया, शराब खत्म हो गई, लड़ाईयां खत्म हो गई, नमाज़ पर खुली दुकानें छोड़ कर मस्जिद में चले जाते हैं, बंद नहीं करते,*

*★_ श्रीलंका में तबलीग की मेहनत हो रही, दस लाख आबादी मुसलमान, चार लाख बालिग मुसलमान हैं, तीन लाख इज्तिमा में मौजूद थे, 600 जमाते निकली, सारी दुनिया की फिज़ा अल्लाह ता'ला ने बदल दी है, हवाई जहाज़ों में अज़ाने हो रही है, नमाज़ पढ़ी जा रही है, पहाड़ की चोटियों पर अज़ाने हो रही है,*

*★"_ सारी दुनिया में इंसान मेहनत कर रहे हैं, लेकिन मेहनत का रुख अलग है, आज सारी दुनिया में इंसान परेशान हैं, मुसलमान तो ज़्यादा परेशान हैं, इसकी वजह ये है कि अल्लाह के नबी ﷺ ने हमें खबर दी कि अल्लाह ताला ने फरमाया जो मस्जिदों को आबाद करेगा अल्लाह उनके घरों को आबाद करेगा _,"*

*"★_और जब हमने मस्जिदों को आबाद करना छोड़ा और सिर्फ जुमा वगेरा की नमाज़ में चले गए या कभी किसी और नमाज़ में आ गए और मस्जिद को आबाद करना छोड़ा तो अल्लाह ने क्या निज़ाम चलाया, जहां हमारी नज़र नहीं जाती, मस्जिदें खाली होना शुरू हुई तो अल्लाह ने अस्पतालों को आबाद कर दिया, अस्पताल भरने शुरू हो गए, बिमारियों की लाइन लगी हुई है,*

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                     *✧_पोस्ट -50_✧*

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*❈_हजरत मौलाना मुहम्मद इलियास साहब रह. का दर्दो गम :-*

*★"_ हजरत मौलाना इलियास साहब रह. के सीने में उम्मत का कितना दर्दो गम था उसके मुताल्लिक चंद बातें अर्ज़ ए खिदमत हैं, हजरत मौलाना इलियास साहब रह. का क़द 5 फिट और 6 इंच था, जुबान में लुक़नत थी और वज़न 30 किलो था, हत्ताकी उम्मत की फिक्र में घुलते घुलते आपके जिस्म की खाल हड्डियों से लग गई थी,*

*★"_ आपके बारे में सुना है कि आप तन्हाइयों में कसरत से रोते थे, उम्मत के लिए दुआएं करते, एक मरतबा किसी ने पूछा कि हज़रत आप इतना क्यों रोते हैं? फरमाया कोई कहता है कि मेरे जिम्मे दुकानदारी है कोई कहता है के मेरे ज़िम्मे करोबार है कोई कहता है कि मेरे ज़िम्मे खेती बाड़ी है, फिर अगर लोग यूं ही कहते और करते रहे तो इस दीन की मेहनत को कौन करेगा?*

*★_ इस पर एक अल्लाह वाले का मलहूज़ याद आ गया कि फरमाते थे- एक मोके़ पर आपने दुआ करते हुए इरशाद फरमाया- ऐ अल्लाह! अगर आपने अपने नाफ़रमनो के लिए जहन्नम को तय कर दिया है तो ए अल्लाह जहाँ ये बात लिखी है उसे मिटा दे_,"*

*★_ एक मोके़ पर फरमाया कि तबलीग में लाखों लोग लगे हुए हैं, असल में वो लगा हुआ है जिसे लगी हुई है और लगी हुई उसको है जो लोगों को लगाने में लगा हुआ है और लोगों को लगाने में वो शख्स लगा हुआ है जिसे हुजूर ﷺ वाला गम नसीब हो जाए और ये गम उसे नसीब होता है जो कुर्बानी के दर्जों में आगे से आगे बढ़ता है,*

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                  *✧_पोस्ट -51_✧*

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*❈_ मौलाना पर एक दिन ऐसा भी आया कि अहले इल्म कहने लगे कि मौलाना ने इल्म को ज़लील कर दिया, उस वक्त मौलाना इलियास साहब रह. ने फरमाया कि - हाय मेरा हबीब तो अबु जहल के पास बार बार जा कर दावत देता था फिर मैं मुसलमानो की मिन्नत कर के कैसे ज़लील हो सकता हूं,*

*"_ हज़रत मौलाना मुहम्मद इलियास साहब रह. दीन की तबलीग के सिलसिले में बहुत बैचेन रहते बाज़ औक़ात आप इस तरह तड़प कर फरमाते मेरे अल्लाह मै क्या करूं कुछ होता नहीं, कभी कभी दीन के इस दर्द और इस फ़िक्र में बिस्तर पर करवटे बदलते और बैचेनी बढ़ती तो उठ कर टहलने लगते,*

*"★_एक रात वालिदा मौलाना मुहम्मद युसूफ साहब कांधलवी ने पूछा की आखिर क्या बात है कि नींद नहीं आती? फरमाया- क्या बतलाऊं अगर तुमको वो बात मालूम हो जाए तो जागने वाला एक ना रहे दो हो जाएं,*

*★_ एक मर्तबा दौराने तबलीग हजरत मौलाना मुहम्मद इलियास साहब रह. ने एक शख्स के कांधे पर हाथ रख दिया, वो आग बबुला हो गया और कहने लगा कि अगर अब के तुमने हाथ रखा तो मैं लठ मारूंगा, मौलाना मुहम्मद इलियास साहब रह. ने फोरन उसके पाँव पकड़ लिए और फरमाया- पाँव पकड़ने पर मारने का तो नहीं कहा था, उसका गुस्सा काफूर हो गया और वो फोरन नरम पड़ गया,*

*★"_ हज़रत मौलाना के दौर में जमाते आपसे मुसाफ़ा कर के अल्लाह के रास्ते में निकल रही थी, तो एक मेवाती ने मौलाना के कानों में कहा- अरे मोलवी इलियास ! कल रात को मेरी बच्ची का इंतेक़ाल हो गया है, मैं तो अल्लाह के रास्ते में जा रहा हूं किसी को जनाज़े के लिए भेज दीजिएगा _,"*

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                  *✧_पोस्ट -52_✧*

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*❈_ अल्लाह अपने बंदे से मुहब्बत करता है, पूरी इंसानियत के सबसे बड़े मोहसिन हजरत मुहम्मद ﷺ है, क्यों? इसलिए कि उन्होंने इंसानों को उनकी ज़िंदगी का मक़सद बताया और कामयाबी की राह बताई और इस काम पर अपना सब कुछ लगा दिया, फिर उनके बाद फिर उनके बाद सबसे बड़ा मोहसिन वो है जो वो काम करे जो अल्लाह के नबी ﷺ कर के गए,*

*"★_ रोटी खिलाना किसी की वक्ती ज़रूरत को पूरा करना है, पानी पिलाना किसी का वक्ती ज़रूरत को पूरा करना है, कपड़ा पहनाना किसी की वक्ती ज़रूरत को पूरा करना है, इस पर भी अल्लाह ता'ला इतने खुश होते हैं, फरमाया कि ऐ मेरे बंदे ! मुझे रोटी की ज़रूरत थी तूने मुझे रोटी ना खिलाई, मेरा फलां बंदा जो तुम्हारे पास आया था अगर तुम उसे रोटी खिलाते तो इसका अजर तुम मुझसे ले लेते, ऐसे था जैसे मेरे ख़ज़ाने में जमा करा दिया,*

*★_ऐ मेरे बन्दे ! मैंने तुमसे पानी मांगा था तूने पानी न पिलाया, बंदा कहेगा या अल्लाह! आप तो रब्बुल आलमीन हैं, फरमाया- फलां बंदा जो प्यासा आया था उसे पानी पिलाता तो ऐसा था जेसे तूने मुझे पानी पिलाया,*

*★_ ऐ आदम के बेटे ! मैं बीमार हुआ था तूने मेरा हाल ही न पुछा, अल्लाहु अकबर! मुसलमान का हाल पूछना कितनी बड़ी बात है, वो कहेगा या अल्लाह आप तो हर ऐब से पाक है, अल्लाह फरमाएगा - फलां बंदा बीमार था अगर तू उसका हाल पूछ लेता तो ऐसा था जैसे तूने मेरा हाल पूछा,*

*"★_ये वक़्ती ज़रुरत पूरी करने पर अल्लाह इतने ख़ुश हो रहे हैं, ज़रा सोचो जब नबी ﷺ वाला काम करेंगे तो कितने खुश होंगे_,"*

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                  *✧_पोस्ट -53_✧*

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*❈_ फ्रांस में एक जमात पैदल चल रही थी तो एक गाड़ी रुकी और उसमें से दो लड़कियां निकली, उन्होंने जल्दी से पैसे निकाले कि जी आप नेक लोग लगते हैं, ये पैसे हैं, आप लोग सवार हो जाएं, सर्दी बहुत ज़्यादा है, वो पैदल चल रहे थे, पैदल चलती हैं यूरोप में जमाते,*

*"★_ उन्होंने कहा - बहन हमारे पास पैसे हैं, कहा फिर पैदल क्यों चल रहे हो इतनी ज़्यादा सर्दी में? कहा हम लोगों की खैर ख्वाही में और अल्लाह पाक को राज़ी करने के लिए चल रहे हैं, अल्लाह अपने बंदो से राज़ी हो जाए और उसके बंदे अल्लाह की मानने वाले बन जाएं, इसलिए हम चल रहे हैं और उनके लिए दुआएं करते हैं,*

*"★_ तो लड़की ने कहा- हमारे लिए भी दुआ करते हैं? कहा- हां आपके लिए भी दुआ करते हैं, उस लड़की ने कहा - मैं बताऊं आप कोन हैं? कहा - बताओ! कहने लगीं आप नबी हैं, उन्होंने कहा- आपको कैसे पता चला कि हम नबी हैं, कहा - हमारी किताब में लिखा है कि यह काम नबी किया करते हैं,*

*★_तो उन्होंने समझाया कि बहन हम नबी नहीं, उस नबी ﷺ के उम्मती हैं जो हमारे ज़िम्मे नबूवत वाली ज़िम्मेदारी लगा गए थे, अब मैं जा रहा हूं मेरा पैगाम आगे पहुंचाना तुम्हारा जिम्मे है, तो हम इस काम की अदायगी के लिए निकले हुए हैं, तो दोनों लड़कियां ईमान ले आईं, एक ने उनसे रूट पूछा कि फलां दिन कहां होंगे, एक हफ्ते के बाद आठ लड़कियों को ले कर आई और उनको भी ईमान मिला,*

*"★_ तो भाई ये उम्मत मुबल्लिग ए इस्लाम उम्मत है, भाई इस्लाम का फैलाना अल्लाह के नबी ﷺ ने आपके जिम्मे लगाया है, ये जो तबलीग का काम हो रहा है, ये तीन बातों की मेहनत है कि अल्लाह की माने, उसके नबी ﷺ की तर्ज़ पर माने, जिसमे एक पूरी ज़िंदगी है, और उसको ले कर पूरे आलम में फिरें,*

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      *★• 🔜 54. इंशा अल्लाह तआला*,
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*📃 एडमिन (हक़ का दाई) की डायरी_,*
 *☞_अल्लाह के पैगाम को दुनिया तक पहुंचाना और अपने पर मेहनत करना हमारे फ़राइज़ में शामिल है*
               *⚀_ तालिब ए दुआ _⚀*,
                 *✦_हक़ का दाई_✦*
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